राखी के धागों में निहित है सामाजिक समरसता का संदेश

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    27-Aug-2026
Total Views |
राखी के धागों में निहित है सामाजिक समरसता का संदेश
 
 
 
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता
 
 
लोक पर्वों के भीतर समाज को जोड़ने, संबंधों को सींचने और जीवन-मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने की परंपरा निहित है, रक्षाबंधन भी ऐसा ही पर्व है। सामान्यतः इसे भाई-बहन के स्नेह और भाई द्वारा बहन की रक्षा के संकल्प से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसकी परंपरा को थोड़ा गहरे उतरकर देखें तो यह केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास, संरक्षण और सामाजिक समरसता का संस्कार दिखाई देता है।
 
 
रक्षाबंधन को श्रावणी पर्व भी कहा गया है। इसकी प्राचीन परंपरा शिक्षा, स्वाध्याय और उपाकर्म से जुड़ी रही है। श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर स्नान, नवीन यज्ञोपवीत धारण, ऋषि, देव और पितरों का तर्पण तथा रक्षा-सूत्र बांधने की परंपराओं का उल्लेख मिलता है। अर्थात् आरंभ से ही इस पर्व का अर्थ केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें व्यक्ति, समाज, प्रकृति और अपनी परंपरा के प्रति उत्तरदायित्व का भाव भी जुड़ा हुआ था।
 
 
समय के साथ पर्व का स्वरूप बदलता गया। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधने लगी और भाई उसकी रक्षा का वचन देने लगा। यह रूप इतना लोकप्रिय हुआ कि धीरे-धीरे रक्षाबंधन की पहचान ही भाई-बहन के पर्व के रूप में बन गई। किंतु भारतीय परंपरा में रक्षा का अर्थ इतना संकुचित कभी नहीं रहा। संकट के समय किसी की रक्षा के लिए, किसी के आरोग्य और दीर्घायु की कामना के लिए भी रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा रही है।
 
 
रक्षाबंधन की पौराणिक कथाओं में भी यही भाव दिखाई देता है। इंद्राणी द्वारा इंद्र के लिए रक्षा-विधान करने की कथा हो अथवा भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी से जुड़ी कथा, दोनों में रक्षा का भाव प्रमुख है। राजा बलि और देवी लक्ष्मी की कथा में भी राखी केवल भाई-बहन के रक्त संबंध का प्रतीक नहीं बनती, बल्कि विश्वास और वचन के रिश्ते का माध्यम बनती है।
 
 
यही बात रक्षाबंधन को भारतीय समाज की दृष्टि से विशेष बनाती है। भारतीय समाज सदियों से अनेक जातियों, भाषाओं, पंथों, क्षेत्रों और जीवन पद्धतियों में विभाजित दिखाई देता है, लेकिन इन विविधताओं के बीच एक अंतर्धारा ऐसी रही है, जिसने समाज को भीतर से जोड़े रखा। हमारे पर्व और संस्कार उसी अंतर्धारा के वाहक रहे हैं। रक्षाबंधन का सूत्र इसी सामाजिक एकता का एक सहज प्रतीक है।
 
 
सोचिए, एक छोटा-सा धागा आखिर करता क्या है? उसमें न कोई विशेष शक्ति दिखाई देती है, न वह किसी को बांधने के लिए पर्याप्त मजबूत होता है। फिर भी जब वह विश्वास और आत्मीयता के भाव से कलाई पर बंधता है तो उसका अर्थ बदल जाता है। वह धागा केवल धागा नहीं रह जाता, वह संकल्प बन जाता है। रक्षा का संकल्प, साथ खड़े रहने का संकल्प और संकट में अपनेपन का भरोसा देने का संकल्प।
 
 
यही भारतीय सामाजिक समरसता की मूल भावना है। समरसता का अर्थ यह नहीं कि समाज में सभी लोग एक जैसे हो जाएं। भारत की विशेषता तो उसकी विविधता में रही है। यहां अलग-अलग जातियां, समुदाय, भाषाएं और परंपराएं अपनी विशिष्टता के साथ जीवित रही हैं। समरसता का अर्थ है कि विविधता के बावजूद मन में परस्पर सम्मान और आत्मीयता बनी रहे। रक्षाबंधन का सूत्र इसी भाव को सहज भाषा में व्यक्त करता है।
 
 
रक्षाबंधन की एक विशेषता यह भी रही है कि इसकी परिधि केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। अनेक स्थानों पर पुरोहित अपने यजमान को रक्षा-सूत्र बांधते हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भी राखी बांधने की परंपराएं रही हैं। इस प्रकार रक्षा का संबंध केवल परिवार से नहीं, समाज से भी जुड़ता है।
 
 
इसी दृष्टि से रक्षाबंधन को सामाजिक समरसता से जोड़ने वाली वे परंपराएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं, जिनमें समाज के वंचित और उपेक्षित परिवारों के बीच जाकर रक्षासूत्र बांधा जाता है। वहां राखी किसी रिश्ते की औपचारिकता नहीं रहती, बल्कि यह संदेश बन जाती है कि समाज में कोई अकेला नहीं है। सामाजिक जीवन में किसी व्यक्ति की पीड़ा केवल उसकी निजी पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे समाज की चिंता है।
 
 
रक्षा केवल शरीर की नहीं होती। हमारी संस्कृति की रक्षा भी आवश्यक है, प्रकृति की रक्षा भी आवश्यक है, सामाजिक विश्वास की रक्षा भी आवश्यक है और मानवीय संवेदनाओं की रक्षा भी आवश्यक है। जिस समाज में व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के सम्मान और अधिकार की रक्षा के लिए खड़ा होता है, वही समाज वास्तव में मजबूत होता है।
 
 
रक्षाबंधन का यह व्यापक अर्थ भारतीय चिंतन में ‘परस्पर संरक्षण’ की भावना से जुड़ा हुआ है। समर्थ व्यक्ति कमजोर के साथ खड़ा हो, शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित को आगे बढ़ाए, संपन्न व्यक्ति जरूरतमंद की सहायता करे और समाज का प्रत्येक वर्ग दूसरे वर्ग के सुख-दुःख में सहभागी बने, तभी सामाजिक समरसता का वास्तविक स्वरूप सामने आएगा।
 
 
इसीलिए रक्षाबंधन को केवल बाजार में सजी रंग-बिरंगी राखियों और मिठाइयों के पर्व तक सीमित कर देना इसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को छोटा कर देना होगा। राखी की असली सुंदरता उस कलाई में नहीं, उस भावना में है जिसके साथ उसे बांधा जाता है।
 
 
भारतीय परंपरा में सूत्र का प्रतीक बहुत गहरा है। एक सूत्र अनेक मोतियों को जोड़ता है, लेकिन हर मोती अपनी अलग पहचान बनाए रखता है। यही भारत की सामाजिक संरचना का भी सुंदर रूपक है। यहां विविधता समाप्त करके एकता पैदा करने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि विविधताओं को एक सूत्र में जोड़कर एकता का निर्माण किया गया। रक्षाबंधन इसी भारतीय दृष्टि को जीवन में उतारने वाला पर्व है।
 
 
आज जब समाज में अनेक स्तरों पर दूरी और अविश्वास दिखाई देता है, तब रक्षाबंधन का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। हमें यह विचार करना होगा कि हम किसकी रक्षा का संकल्प ले रहे हैं और किसके साथ खड़े होने को तैयार हैं। यदि राखी की डोर कलाई से आगे बढ़कर हृदय तक पहुंच जाए, तो वह सचमुच समाज को जोड़ने वाली डोर बन सकती है।
 
 
रक्षाबंधन अंततः यही तो कहता है कि हम अलग-अलग होकर भी एक-दूसरे से जुड़े हैं। हमारी खुशियां एक-दूसरे से जुड़ी हैं और हमारी सुरक्षा भी एक-दूसरे से जुड़ी है। एक धागा अपने आप में कमजोर हो सकता है, लेकिन जब अनेक धागे मिलकर मजबूत बंधन बनाते हैं तो उसे तोड़ना कठिन होता है। इसी तरह व्यक्ति अकेला कमजोर हो सकता है, परंतु आत्मीयता, विश्वास और परस्पर सहयोग से जुड़ा समाज बहुत शक्तिशाली होता है।
 
 
रक्षासूत्र से वेदाध्ययन तक: श्रावणी पूर्णिमा का वैदिक स्वरूप
 
श्रावण पूर्णिमा का दिन केवल रक्षाबंधन के कारण महत्वपूर्ण नहीं है। इसकी एक दूसरी, अत्यंत प्राचीन और गंभीर पहचान वेदाध्ययन तथा उपाकर्म की परंपरा से जुड़ी है। प्राचीन वैदिक शिक्षा व्यवस्था में अध्ययन केवल पुस्तकीय प्रक्रिया नहीं था। गुरु के आश्रम में श्रुति को सुनना, उसके उच्चारण को ठीक उसी स्वर और क्रम में दोहराना तथा नियमित स्वाध्याय के द्वारा उसे सुरक्षित रखना शिक्षा का मूल स्वरूप था।
 
 
श्रावणी पूर्णिमा इस वार्षिक अनुशासन में एक विशेष पड़ाव के रूप में सामने आती है। विभिन्न वैदिक शाखाओं और गृह्यसूत्र परंपराओं में उपाकर्म की तिथि और विधि में अंतर मिलता है, फिर भी श्रावण काल में वेदाध्ययन के पुनः आरंभ से इसका संबंध स्पष्ट दिखाई देता है। उपाकर्म शब्द का अर्थ ही है किसी कार्य का आरंभ या पुनः आरंभ। याज्ञवल्क्य स्मृति में अध्यायोपाकर्म के संबंध में कहा गया है-
 
 
“अध्यायानामुपाकर्म श्रावण्यां श्रवणेन वा।
हस्तेनौषधिभावे वा पञ्चम्यां श्रावणस्य तु॥”
 
अर्थात वेदाध्ययन के उपाकर्म के लिए श्रावण मास में उपयुक्त काल निर्धारित किया गया है और विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार श्रवण नक्षत्र, हस्त नक्षत्र अथवा श्रावण की पंचमी का भी उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि उपाकर्म केवल एक लोकाचार नहीं था, बल्कि धर्मसूत्र और स्मृति परंपरा में व्यवस्थित संस्कार के रूप में विकसित हुआ। प्राचीन गृह्यसूत्रों में इसे वार्षिक वेदाध्ययन के आरंभ से जोड़ा गया है।
 
 
श्रावणी का यह संबंध उस शिक्षा पद्धति को समझने का अवसर देता है जिसमें ज्ञान का संरक्षण स्मृति और वाणी के अनुशासन से होता था। वेदों की रचना और उनका संरक्षण मूलतः श्रुति परंपरा में हुआ। तैत्तिरीय संहिता कृष्ण यजुर्वेद की प्रमुख संहिताओं में है और उसके साथ तैत्तिरीय ब्राह्मण, तैत्तिरीय आरण्यक तथा तैत्तिरीय उपनिषद की परंपरा जुड़ी है।
 
 
वैदिक विरासत के आधिकारिक अभिलेखन में तैत्तिरीय आरण्यक के संबंध में ब्रह्मयज्ञ, वेदपाठ, दैनिक प्रार्थना तथा पूर्वजों के प्रति कर्तव्य जैसी परंपराओं का उल्लेख मिलता है। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि वेदाध्ययन केवल मंत्र याद करने का अभ्यास नहीं था, बल्कि आचार, अनुष्ठान और उत्तरदायित्व से जुड़ी संपूर्ण जीवन पद्धति था। तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षावल्ली में गुरु द्वारा अध्ययन पूर्ण कर रहे शिष्य को दिए जाने वाले उपदेश में कहा गया है-
  
“सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।”

अर्थात सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो और स्वाध्याय में कभी प्रमाद मत करो।
 
 
श्रावणी उपाकर्म की आत्मा को समझने के लिए यह वाक्य विशेष अर्थ रखता है। ज्ञान प्राप्त कर लेना अंतिम लक्ष्य नहीं था। ज्ञान के निरंतर अभ्यास और उसके संरक्षण को भी उतना ही आवश्यक माना गया। यही कारण है कि वेदाध्ययन की परंपरा में वार्षिक पुनरारंभ का विधान केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अध्ययन के प्रति पुनः संकल्प लेने की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है।
 
 
उपाकर्म के साथ ऋषि स्मरण और ऋषि तर्पण की परंपरा भी जुड़ी रही है। यह भाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस ज्ञान का अध्ययन किया जा रहा है, उसके पीछे जिन ऋषियों, आचार्यों और परंपरागत शिक्षकों की स्मृति है, उन्हें विस्मृत न करना ज्ञान परंपरा का नैतिक पक्ष था। इसलिए श्रावणी पूर्णिमा को केवल व्यक्तिगत धार्मिक पुण्य से जोड़कर देखना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह दिन उस बौद्धिक ऋण की स्मृति भी है जिसे विद्यार्थी अपने गुरु, ऋषियों और ज्ञान परंपरा के प्रति स्वीकार करता था।
 
 
रक्षासूत्र की परंपरा इसी दिन के दूसरे महत्वपूर्ण आयाम को सामने लाती है। आज रक्षाबंधन मुख्यतः भाई और बहन के स्नेह तथा पारिवारिक संबंधों का पर्व है, पर रक्षासूत्र की अवधारणा इससे व्यापक है। रक्षा का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को संकट से बचाना नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य, संबंध और जीवन मूल्यों की रक्षा का संकल्प भी है। इस दृष्टि से श्रावणी पूर्णिमा के दोनों प्रमुख पक्ष एक दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं। एक ओर रक्षासूत्र सामाजिक और नैतिक संबंधों की रक्षा का प्रतीक है, दूसरी ओर उपाकर्म ज्ञान की रक्षा और उसके पुनरभ्यास का संकल्प। धागा और वेदपाठ दो अलग प्रतीक होते हुए भी संरक्षण की एक ही मूल भावना को व्यक्त करते हैं।
 
 
संस्कृत इस पूरी परंपरा की अभिव्यक्ति की प्रमुख भाषा रही। इसका महत्व केवल इसलिए नहीं था कि वेद संस्कृत में उपलब्ध हैं, बल्कि इसलिए भी कि उच्चारण, व्याकरण, छंद और शब्द की सूक्ष्मता को सुरक्षित रखने के लिए भाषा का अनुशासन आवश्यक था। वैदिक पाठ में स्वर का परिवर्तन भी अर्थ और पाठ की शुद्धता को प्रभावित कर सकता था। इसी कारण शिक्षा व्यवस्था में श्रवण, अनुच्चारण, पुनरावृत्ति और स्वाध्याय को अत्यंत महत्व मिला। संस्कृत की मौखिक परंपरा ने इस ज्ञान को पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वेदों का संरक्षण केवल ग्रंथों को सुरक्षित रखने से नहीं हुआ, बल्कि जीवित पाठ परंपराओं के माध्यम से हुआ।
 
 
श्रावणी पूर्णिमा इसलिए एक ऐसे सांस्कृतिक बिंदु के रूप में देखी जा सकती है जहां ऋतु, शिक्षा, गुरु, ऋषि और ज्ञान एक साथ आते हैं। वर्षा ऋतु में कृषि और सामाजिक जीवन के साथ आश्रम जीवन की अपनी लय थी। अध्ययन की नियमितता, अनुष्ठान का अनुशासन और गुरु के प्रति श्रद्धा इस व्यवस्था के अंग थे। उपाकर्म इस क्रम में अध्ययन के नए चरण का संकेत देता था। बाद की धर्मशास्त्रीय परंपराओं ने इसके लिए अनेक विधियां निर्धारित कीं, लेकिन उसके मूल में वेद के अध्ययन और उसके संरक्षण की भावना बनी रही।
 
 
आज श्रावणी पूर्णिमा का सबसे लोकप्रिय रूप रक्षाबंधन है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि पारिवारिक स्नेह की इसकी परंपरा अत्यंत व्यापक है। फिर भी इसके वैदिक और शैक्षिक आयाम को स्मरण करना हमारी सांस्कृतिक समझ को अधिक पूर्ण बनाता है। यह पर्व हमें बताता है कि किसी समाज की शक्ति केवल उसकी भौतिक समृद्धि में नहीं होती। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में भी होती है कि वह अपने ज्ञान को कितनी सावधानी से अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है। श्रावणी का उपाकर्म इसी उत्तरदायित्व का प्राचीन स्मरण है।
 
 
आज जब शिक्षा का अर्थ तेजी से परीक्षा, प्रमाणपत्र और रोजगार तक सीमित होता जा रहा है, श्रावणी की उपाकर्म परंपरा एक अलग दृष्टि देती है। यहां शिक्षा का अर्थ जीवन के साथ जुड़ा हुआ अनुशासन था। “स्वाध्यायान्मा प्रमदः” केवल विद्यार्थी के लिए दिया गया निर्देश नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति सभ्यता की जिम्मेदारी का वाक्य है। रक्षासूत्र हमें संबंधों की रक्षा का स्मरण कराता है और उपाकर्म ज्ञान की रक्षा का। दोनों को साथ रखकर देखें तो श्रावणी पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं रह जाती, बल्कि वह संस्कृति की उस मूल चेतना का पर्व बन जाती है जिसमें संबंध, संस्कार और ज्ञान एक दूसरे से अलग नहीं हैं।