रक्षा पंड्या
दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान, भोपाल
रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसका मूल भाव केवल किसी एक व्यक्ति द्वारा दूसरे की रक्षा का वचन देना नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास, स्नेह, उत्तरदायित्व और मंगल की कामना करना है। “रक्षा” का अर्थ यहाँ केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है; यह धर्म, मर्यादा, सम्मान, संबंध और जीवन-मूल्यों की रक्षा का भी प्रतीक है। जब किसी की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा जाता है, तब उसके सुख, विजय, कल्याण और सदाचरण की कामना की जाती है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में यह पर्व केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गुरु-शिष्य, पुरोहित-राजा, मित्र, परिवार और समाज के अनेक संबंधों में भी समान श्रद्धा से निभाया गया है।
रक्षाबंधन को केवल “भाई द्वारा बहन की रक्षा” के सीमित अर्थ में देखना इसकी व्यापक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा को संकुचित कर देना है। भारतीय चिंतन में संबंध अधिकार पर नहीं, बल्कि कर्तव्य और आत्मीयता पर आधारित होते हैं। रक्षा-सूत्र किसी पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म, सम्मान, मर्यादा और परस्पर उत्तरदायित्व की रक्षा का संकल्प है।
पिछले कुछ वर्षों में लेखों, सोशल मीडिया मंचों और अकादमिक विमर्शों में रक्षाबंधन को पितृसत्तात्मक दृष्टि से देखने का कुत्सित प्रयास किया गया है-
2018 में AIB ने रक्षाबंधन की पारंपरिक अवधारणा को पितृसत्तात्मक (Patriarchal) बताया और यह कहा कि 'भाई द्वारा बहन की रक्षा' का विचार लैंगिक असमानता को बढ़ावा देता है।
The Times of India की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षाबंधन की परंपरा को पितृसत्ता से जोड़ते हुए ऐसे रक्षासूत्र बाँटे गए, जिन पर "Celebrate Rakhi Free from Patriarchy" जैसे संदेश लिखे थे।
द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख “Who said Raksha Bandhan was only about brothers protecting sisters?” में यह तर्क दिया गया कि आज रक्षाबंधन का अर्थ “सुरक्षा” से अधिक “साथ और स्नेह” होना चाहिए तथा इसके “patriarchal undertones” समय के साथ कम हो रहे हैं।
2022 के एक शोध-पत्र One More Thread of Promised Protection: Debriefing Raksha-Bandhan में यह विश्लेषण प्रस्तुत किया गया कि “रक्षा” की अवधारणा कभी-कभी महिलाओं को संरक्षण की आवश्यकता वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कर सकती है।
इन सभी तर्कों का आधार मुख्यतः रक्षाबंधन की आधुनिक और सीमित सामाजिक अभिव्यक्ति है, जबकि भारतीय परंपरा में यह पर्व कहीं अधिक व्यापक रहा है।
सबसे पहले भविष्य पुराण का प्रसंग देखिए। देवताओं और असुरों के युद्ध के समय देवगुरु बृहस्पति के निर्देश पर इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा। इस रक्षा-सूत्र ने इंद्र को अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़ रहने की प्रेरणा दी।
इसी प्रकार महाभारत में भगवान कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग अत्यंत प्रसिद्ध है। जब कृष्ण की उँगली से रक्त बहा, तब द्रौपदी ने तत्काल अपनी साड़ी का एक अंश फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। बाद में चीरहरण के समय कृष्ण ने द्रौपदी की लाज की रक्षा की। इस प्रसंग का संदेश यह नहीं कि कोई एक पक्ष सदैव रक्षक और दूसरा संरक्षित होता है, बल्कि यह कि सच्चे संबंधों में करुणा, विश्वास और कर्तव्य दोनों दिशाओं में प्रवाहित होते हैं।
वैदिक परंपरा में आचार्य अपने शिष्यों को रक्षा-सूत्र बाँधते थे। यज्ञों और राजसूय जैसे अनुष्ठानों में पुरोहित राजा की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधकर राष्ट्र, प्रजा और धर्म की रक्षा का संकल्प दिलाते थे। स्पष्ट है कि रक्षा-सूत्र का संबंध केवल पारिवारिक रिश्तों से नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और लोक कल्याण से भी रहा है।
आज “रक्षा” शब्द सुनते ही अधिकांश लोग शारीरिक सुरक्षा का अर्थ निकालते हैं जबकि भारतीय दर्शन में “रक्षा” का अर्थ किसी व्यक्ति को निर्बल मान लेना नहीं है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के “रक्षक” नहीं बनते, बल्कि वे उसे उसके कर्तव्य का बोध कराते हैं।
यदि फिर भी कोई कहता है कि रक्षाबंधन केवल "पुरुष द्वारा स्त्री की रक्षा" का पर्व है, तो यह मंत्र स्वयं उस धारणा का खंडन करता है-
"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम् अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥"
अर्थात जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र में तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा, हे रक्षा! तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना।
इस मंत्र में पुरोहित सामने वाले व्यक्ति से नहीं, बल्कि रक्षा-सूत्र से संवाद कर रहा है। वह कहता है- "हे रक्षा! तुम अपने संकल्प से विचलित मत होना।"
इसमें किसी स्त्री की रक्षा की बात नहीं है। इसमें किसी पुरुष को रक्षक नहीं कहा गया है। इसमें केवल रक्षा-संकल्प को स्थिर रखने की प्रार्थना है। रक्षा-सूत्र का उद्देश्य किसी पर अधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि स्वयं को उत्तरदायित्व से बाँधना है।
यदि आज भाई-बहन एक-दूसरे का संबल बनते हैं, मित्र एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होते हैं, गुरु और शिष्य एक-दूसरे के प्रति सम्मान रखते हैं, तो यह रक्षाबंधन की मूल भावना के ही अनुरूप है। समय के साथ सामाजिक अभिव्यक्तियाँ बदल सकती हैं, लेकिन परस्पर विश्वास, सहयोग और उत्तरदायित्व का मूल्य स्थायी रहता है।
भारतीय संस्कृति की विशेषता यह है कि वह संबंधों को प्रतिस्पर्धा नहीं, पूरकता के रूप में देखती है। इसलिए दीपावली को केवल श्रम, करवा चौथ को केवल नियंत्रण, या रक्षाबंधन को केवल वर्चस्व के प्रतीक के रूप में देखना भारतीय जीवन-दर्शन की बहुस्तरीयता को अनदेखा करना होगा। किसी भी परंपरा का मूल्यांकन उसके मूल ग्रंथों, ऐतिहासिक विकास और समाज में निभाई जाने वाली व्यापक भूमिका के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल चुनिंदा व्याख्याओं के आधार पर।
आज आवश्यकता इस बात की है कि रक्षाबंधन को समानता, आत्मीयता और सामाजिक एकता के पर्व के रूप में समझा जाए। यह किसी एक लिंग की श्रेष्ठता या दूसरे की निर्भरता का संदेश नहीं देता, बल्कि यह सिखाता है कि प्रत्येक संबंध विश्वास, संवेदना और साझा उत्तरदायित्व से मजबूत होता है। रक्षा-सूत्र हमें स्मरण कराता है कि समाज तभी सुदृढ़ बनता है जब उसके सदस्य एक-दूसरे के सम्मान, अधिकार, कर्तव्य और कल्याण के प्रति समान रूप से प्रतिबद्ध हों।
रक्षाबंधन का वास्तविक संदेश यह है कि संबंध अधिकार से नहीं, उत्तरदायित्व से चलते हैं; प्रेम नियंत्रण से नहीं, विश्वास से मजबूत होता है। यह पर्व किसी एक की शक्ति और दूसरे की निर्भरता का नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के बीच समान सम्मान, स्नेह, कर्तव्य और भाईचारे का उत्सव है। यही इसकी शाश्वत भारतीय दृष्टि है।