जयंती विशेष : क्रांतिकारी ‘राजगुरु’ को जब संघ ने दिया गुप्त आश्रय

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    24-Aug-2026
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जयन्‍ती विशेष : क्रांतिकारी ‘राजगुरु’ को जब संघ ने दिया गुप्त आश्रय 
 
 
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरीष्‍ठ पत्रकार 
 
 
शिवराम हरि राजगुरु का नाम आते ही भगत सिंह और सुखदेव के साथ उनका अमर बलिदान स्‍मरण हो आता है, पर उनके क्रांतिकारी जीवन का एक ऐसा अध्याय भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है। सॉन्डर्स वध के बाद जब ब्रिटिश सरकार राजगुरु को पकड़ने के लिए पूरे देश में जाल बिछा चुकी थी, तब नागपुर में उनके लिए सुरक्षित ठिकाने की व्यवस्था से जुड़ा प्रसंग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के संदर्भ में सामने आता है।
 
 
राजगुरु को उमरेड में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी भय्याजी दानी के कृषि फार्म पर छिपाने की व्यवस्था की गई थी। यह प्रसंग आज इसलिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ को अपना कार्य करते हुए एक ओर 100 वर्ष पूर्ण हुए हैं तो दूसरी ओर राजगुरु की आज देश भर में जयन्‍ती मनाई जा रही है।
 
 
24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेड़ में जन्मे शिवराम हरि राजगुरु का व्यक्तित्व बचपन से ही स्वाभिमान, साहस और राष्ट्रभक्ति से निर्मित हुआ। छत्रपति शिवाजी महाराज और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। संस्कृत और शास्त्रों के अध्ययन के लिए वे काशी पहुंचे, जहां अध्ययन के साथ उन्होंने अखाड़ों में शारीरिक प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।
 
 
काशी में उनका संपर्क चंद्रशेखर आजाद से हुआ। उन्‍होंने राजगुरु की प्रतिभा और निर्भीकता को पहचाना और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से उन्‍हें जोड़ा गया। संगठन में वे 'रघुनाथ' नाम से सक्रिय रहे और अपनी अचूक निशानेबाजी के लिए विशेष पहचान बनाई।
 
 
1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाहौर में लाला लाजपत राय पर हुए निर्मम लाठीचार्ज और उसके बाद उनकी मृत्यु ने क्रांतिकारी युवाओं को भीतर तक झकझोर दिया। राजगुरु, भगत सिंह, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद ने इसके प्रतिशोध की योजना बनाई। 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या कर दी गई। कार्रवाई में राजगुरु ने पहली गोली चलाई और भगत सिंह ने आगे की कार्रवाई पूरी की।
 
 
इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारियों की धरपकड़ के लिए व्यापक अभियान शुरू कर दिया। राजगुरु के लिए अब हर कदम जोखिम से भरा था। उन्हें लगातार ठिकाने बदलने पड़े। यही वह दौर था जब उनके जीवन का वह अध्याय सामने आता है, जो संघ और राजगुरु के संबंधों को लेकर आज भी विशेष चर्चा का विषय है।
 
 
सॉन्डर्स वध के बाद राजगुरु लाहौर से निकलते हुए अमरावती और वर्धा के रास्ते नागपुर पहुंचे। नागपुर में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से मिले। यह संपर्क उस समय के राजनीतिक वातावरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। डॉ. हेडगेवार स्वयं अपने युवा दिनों में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे थे, इसलिए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भूमिगत संघर्ष करने वाले युवाओं की मनोदशा और उनकी कठिनाइयों से परिचित थे। इस संबंध में पत्रकार नरेंद्र सहगल ने प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर बताया है कि कैसे संघ और राजगुरु के आपसी संबंध रहे ।
 
 
“भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता” पुस्तक में वे लिखते हैं कि राजगुरु संघ की मोहिते के बाड़े की शाखा के स्वयंसेवक थे। नागपुर के भोंसले वेदशाला के छात्र रहते हुए ही राजगुरु, संघ संस्थापक हेडगेवार के बेहद करीब आ गए थे। अब यह संदर्भ इसलिए भी प्रमाण है, क्‍योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार, कलकत्ता में अपने अध्ययनकाल से ही क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के अंतरंग समिति के सदस्य थे । उस समय विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों के क्रान्तिकारी, ब्रिटिश सरकार की पकड़ से दूर रहकर गुप्त प्रवास हेतु बुंदेलखंड, महाकौशल और नागपुर आते थे।
 
 
नागपुर उस समय मध्य प्रांत और बरार की राजधानी था, तथा भौगोलिक दृष्टि से गुप्त प्रवास के लिए अत्यंत सुरक्षित था और डॉ. हेडगेवार ने भी नागपुर आकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर ली थी, इसलिए क्रांतिकारियों का ब्रिटिश सरकार की पकड़ से दूर रहने के लिए डॉ. हेडगेवार के पास गुप्त प्रवास पर आना स्वाभाविक था। अब राजगुरु के भूमिगत जीवन में संघ से जुड़े सहयोग का यह प्रसंग दरअसल, इतिहास की एक ऐसी कड़ी है, जिस पर गंभीरता और संतुलन के साथ विमर्श होना आज की आवश्‍यकता है।
 
 
वापिस अपने विषय को क्रांतिकारी राजगुरु पर केंद्रित करते हैं। वस्‍तुत: राजगुरु का स्वभाव अत्यंत चंचल और साहसी था। परिवार से मिलने की इच्छा उन्हें पुणे ले गई, जहां 30 सितंबर 1929 को पुलिस ने उन्हें पहचान कर गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उन्हें लाहौर लाया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में मुकदमा चला। जेल में भी उन्होंने भगत सिंह और सुखदेव के साथ राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। ब्रिटिश सरकार ने सात अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मृत्युदंड सुनाया। 23 मार्च 1931 की शाम तीनों क्रांतिकारियों को निर्धारित तारीख से पहले फांसी दे दी गई।
 
 
इस तरह से मात्र 22 वर्ष की आयु में राजगुरु ने अपने प्राण मातृभूमि को अर्पित कर दिए। इसके साथ ही उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे मार्मिक घटनाओं में शामिल हो गया। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की त्रिमूर्ति आज भी युवाओं के लिए साहस और राष्ट्रनिष्ठा का प्रतीक है।
 
 
राजगुरु की जयंती पर आज देश उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उन्हें अंग्रेजी शासन के अन्याय और दमन के विरुद्ध अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति के साथ संघर्ष करने वाला महान क्रांतिकारी बताया। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि राजगुरु ने भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर क्रांति की ऐसी ज्वाला प्रज्वलित की जिसने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा और ऊर्जा दी। उन्होंने उनके 22 वर्ष की आयु में दिए गए सर्वोच्च बलिदान को युवाओं के लिए राष्ट्र प्रथम की प्रेरणा बताया।
 
 
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने उनके त्याग को राष्ट्रसेवा, कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण की प्रेरणा बताया है। जबकि भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने उन्हें अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक कहा है, इसी प्रकार से आज सपूर्ण देश उनके क्रातिकारी जीवन को याद कर रहा है, देश के लिए किए गए उनके सवोच्‍च बलिदान को नमन कर रहा है!