आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता
हमारे समाज में शिक्षा की परिकल्पना कभी केवल अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं रही। जिस समय विद्यालय, पाठ्यपुस्तकें और औपचारिक परीक्षाएं अस्तित्व में भी नहीं थीं, उस समय भी हर घर में एक जीवंत पाठशाला चलती थी। यह पाठशाला थी दादी नानी की कहानियों की, संध्या के समय आंगन में जलते दीये की रोशनी में बुनी जाने वाली लोककथाओं की।
इन लोककथाओं के माध्यम से बालक को नीति, धर्म, सामाजिक व्यवहार, प्रकृति के रहस्य और जीवन के व्यावहारिक सत्य सहज ही सिखाए जाते थे। यह प्रक्रिया इतनी स्वाभाविक थी कि बालक को कभी यह अनुभव ही नहीं होता था कि वह कुछ सीख रहा है, वह तो केवल आनंद ले रहा होता था। यही लोककथाओं की सबसे बड़ी शक्ति थी, आनंद के माध्यम से संस्कार का सृजन।
हमारी ज्ञान परंपरा मूलतः श्रुति परंपरा रही है। वेदों का ज्ञान भी गुरु से शिष्य तक मौखिक रूप से ही प्रवाहित होता था। यही परंपरा आगे चलकर पुराणों, इतिहासों और लोककथाओं के रूप में सामान्य जनमानस तक पहुंची। नैमिषारण्य में सूत जी द्वारा ऋषियों को पुराण कथाएं सुनाई जाना इसी परंपरा का प्रमाण है, जहां जटिल दार्शनिक सत्यों को भी कथा के सरल माध्यम से प्रस्तुत किया गया।
यह पद्धति इसलिए सफल रही क्योंकि कथा मस्तिष्क में केवल सूचना के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव और भावना के रूप में अंकित होती है। बालक जब हितोपदेश की सियार, कौवे और कछुए की कहानियां सुनता था, तब वह केवल मनोरंजन नहीं कर रहा होता था, अपितु मित्रता, विश्वासघात, बुद्धिमत्ता और सावधानी जैसे जीवन मूल्यों को अपने भीतर आत्मसात कर रहा होता था।
आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। कथा के अनुसार महिलारोप्य नगर के राजा अमरशक्ति के तीन मूर्ख पुत्रों को नीतिशास्त्र सिखाने के लिए आचार्य विष्णु शर्मा ने शास्त्रीय उपदेश के स्थान पर पशु पक्षियों की कथाओं का सहारा लिया। इसी ग्रंथ में एक प्रसिद्ध श्लोक आता है, जो जीवन जीने की कला को अत्यंत संक्षेप में प्रस्तुत करता है:
अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत्। गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्।।
अर्थात बुद्धिमान मनुष्य को विद्या और धन के अर्जन के प्रति ऐसे प्रयत्नशील रहना चाहिए मानो वह कभी बूढ़ा या मृत्यु को प्राप्त होने वाला ही नहीं है, परंतु धर्म का आचरण उसे ऐसे करना चाहिए मानो मृत्यु ने उसके बालों को पकड़ ही लिया हो। यह श्लोक बालक के मन में समय के महत्व और कर्तव्य की गंभीरता दोनों को एक साथ स्थापित करता है, वह भी बिना किसी उबाऊ उपदेश के, केवल एक रोचक कथा के माध्यम से।
नारायण पंडित द्वारा रचित हितोपदेश में भी बालकों के लिए नीति और ज्ञान का महत्व अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसका एक प्रसिद्ध श्लोक है:
न चौरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि। व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।।
अर्थात विद्या रूपी धन को न तो चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाई बांट सकते हैं और न ही यह किसी पर भार बनता है। इसके विपरीत, इसे जितना बांटा जाए यह उतना ही बढ़ता जाता है। इसलिए समस्त धनों में विद्या धन ही सर्वश्रेष्ठ है। इस प्रकार के श्लोकों को कथा के भीतर पिरोकर बालकों तक पहुंचाया जाता था, जिससे गहन दार्शनिक सत्य भी उनकी समझ में सहज रूप से उतर जाते थे।
आधुनिक मनोविज्ञान भी अब इस प्राचीन पद्धति की वैज्ञानिकता को स्वीकार करने लगा है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ब्रूनो बेटलहाइम ने अपनी पुस्तक द यूजेज ऑफ एनचांटमेंट में विस्तार से बताया है कि परीकथाएं और लोककथाएं बालक के अवचेतन मन में उठने वाले भय, ईर्ष्या, असुरक्षा जैसे भावों को प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करने और उनसे उबरने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
इसी प्रकार शिक्षाशास्त्री जेरोम ब्रूनर ने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया कि मानव मस्तिष्क जानकारी को तार्किक विवरण की अपेक्षा कथा के रूप में कहीं अधिक प्रभावी ढंग से ग्रहण करता है, क्योंकि कथा में घटनाक्रम, पात्र और परिणाम होते हैं, जिनसे बालक स्वयं को जोड़ पाता है। यही कारण है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व की पंचतंत्र और जातक कथाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक प्रतीत होती हैं जितनी वे रची गई थीं।
बौद्ध परंपरा में भी जातक कथाओं के माध्यम से करुणा, त्याग और अहिंसा जैसे मूल्यों को बालकों तक पहुंचाया जाता रहा है। बुद्ध के पूर्व जन्मों की पांच सौ से अधिक कथाएं इस बात का प्रमाण हैं कि उच्चतम आध्यात्मिक सत्यों को भी सरल पशु पक्षी और मनुष्य पात्रों की कथाओं के माध्यम से जन जन तक पहुंचाया जा सकता है। इसी परंपरा में कथासरित्सागर जैसे ग्रंथ भी आते हैं, जहां कथा के भीतर कथा बुनकर मनोरंजन के साथ साथ जीवन दर्शन भी प्रस्तुत किया गया।
आज के समय में यह पारंपरिक पद्धति संकट में है। संयुक्त परिवारों के विघटन, दादा दादी के साथ बालकों के सीमित समय, और स्क्रीन आधारित मनोरंजन के प्रभुत्व ने इस मौखिक कथा परंपरा को कमजोर किया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में इस बात पर पुनः बल दिया गया है कि प्रारंभिक शिक्षा में कहानी सुनाने और खेल आधारित पद्धति को प्रमुखता दी जाए, क्योंकि विशेषज्ञ मानते हैं कि छोटे बालकों के लिए भाषा विकास, नैतिक समझ और भावनात्मक बुद्धि के विकास में कथा से बेहतर कोई माध्यम नहीं है। अनेक शिक्षाविद अब विद्यालयों में पुनः कहानी सुनाने के सत्र, कठपुतली नाट्य और लोककथा आधारित गतिविधियां आरंभ करने पर बल दे रहे हैं।
लोककथाएं केवल मनोरंजन का साधन कभी नहीं रहीं, वे हमारे समाज की वह अदृश्य पाठशाला रही हैं जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कार, नीति और जीवन मूल्यों का हस्तांतरण किया। पंचतंत्र और हितोपदेश के श्लोकों से लेकर जातक कथाओं तक, इन सबका उद्देश्य एक ही रहा है, बालक के कोमल मन में अच्छे और बुरे की पहचान, धैर्य, साहस और करुणा जैसे गुणों का सहज रोपण करना।
आधुनिक मनोविज्ञान और शिक्षाशास्त्र भी अब इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि जो शिक्षा कथा के माध्यम से मिलती है, वह पुस्तकीय उपदेश से कहीं अधिक गहरी और स्थायी होती है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि हम इस प्राचीन परंपरा को केवल नास्टेल्जिया के रूप में न देखें, बल्कि इसे आधुनिक शिक्षा पद्धति के साथ जोड़कर नई पीढ़ी तक पुनः पहुंचाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उसी संस्कारशीलता से लाभान्वित हो सकें जो कभी दादी नानी की कहानियों से हमें प्राप्त होती थी।