रोहन गिरि
शोधार्थी
सन् 1921 में मालाबार के अनेक गाँवों से हजारों हिंदू परिवार अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भाग रहे थे। किसी ने अपनी गोद में छोटे बच्चे को उठा रखा था, तो कोई अपने कुलदेवता की मूर्ति और धर्मग्रंथ लेकर घर से निकला था। पीछे छूट गए थे खेत, घर, मंदिर और वर्षों की मेहनत से बसाया गया जीवन। उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनकी यह पीड़ा इतिहास के पन्नों में धुंधली पड़ जाएगी और आने वाली पीढ़ियाँ इस घटना का केवल एक पक्ष ही जान पाएगी।
उस समय मालाबार ब्रिटिश भारत के मद्रास प्रांत का एक बड़ा भाग था। आज यह क्षेत्र मुख्यतः केरल के उत्तरी जिलों, जैसे मलप्पुरम, कोझिकोड (कालीकट), कन्नूर और पलक्कड़ में आता है। इसी क्षेत्र में वर्ष 1921 में मोपला नरसंहीर हुआ था।
उस समय अंग्रेज़ी शासन के प्रति असंतोष था। जमींदारी व्यवस्था से भी अनेक लोग असंतुष्ट थे और खिलाफत आंदोलन का प्रभाव इस क्षेत्र तक पहुँच चुका था। किंतु कुछ ही समय में विद्रोह के अनेक भागों में उसका स्वरूप बदल गया। अनेक समकालीन विवरणों, सरकारी अभिलेखों और बाद के शोधों के अनुसार, विद्रोह में शामिल मोपला के मुस्लिम समूहों ने अनेक हिंदू गाँवों पर आक्रमण किए। बड़ी संख्या में हिंदुओं की हत्या की गई, अनेक लोगों पर जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव डाला गया, मंदिरों को क्षति पहुँचाई गई और हजारों परिवारों को अपना घर छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। इन घटनाओं ने पूरे मालाबार क्षेत्र को गहरे दुःख और भय से भर दिया।
इतिहास का दुर्भाग्य यह रहा कि लंबे समय तक इस घटना को केवल किसान विद्रोह या अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में ही प्रस्तुत किया गया। इससे उन हजारों पीड़ित परिवारों की पीड़ा पीछे छूट गई। यह सत्य है कि उस समय आर्थिक और राजनीतिक कारण भी थे, लेकिन यदि निर्दोष लोगों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण हिंसा का सामना करना पड़ा, तो उस सत्य को भी उतनी ही स्पष्टता से स्वीकार करना चाहिए। इतिहास तभी न्यायपूर्ण बनता है, जब वह सभी पक्षों को स्थान देता है।
मोपला नरसंहार हमें एक गहरी सीख भी देता है। कोई भी समाज तभी सुरक्षित रहता है, जब वह संगठित हो, अपने इतिहास से परिचित हो और अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूक रहे। जो समाज अपने अतीत के कटु अनुभवों को भूल जाता है, वह भविष्य की चुनौतियों के प्रति भी असावधान हो जाता है।
इतिहास पढ़ने का उद्देश्य किसी के प्रति वैर या घृणा उत्पन्न करना नहीं है। उसका उद्देश्य सत्य को जानना, पीड़ितों की स्मृति का सम्मान करना और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए समाज को जागृत करना है। मोपला नरसंहार केवल मालाबार की घटना नहीं, बल्कि यह स्मरण दिलाने वाला अध्याय है कि इतिहास को अधूरा नहीं, संपूर्ण रूप में पढ़ना और समझना कितना आवश्यक होता है।