देश में लोकतंत्र या भीड़तंत्र?

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    02-Aug-2026
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डॉ भूपेंद्र करवन्दे
सहायक प्राध्यापक विधि
 
 
इस देश के कुछ तथाकथित राजनीतिक विचारक अपने वक्तव्य में कहते है की गणराज्य संसद में नहीं सड़कों पर बनते हैं l अगर वास्तव में गणराज्य सड़कों पर बनते तो फिर संविधान सभा का गठन क्यों किया गया था? तो संविधान सभा ने 2 वर्ष 11 में 18 दिन तक किस बात पर विमर्श किया? क्या वास्तव में गणराज्य सड़क से बना था? हमारे संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोग से शुरू होती है या हम सड़क पर एकत्रित लोग से? अगर सड़क ही गणराज्य बनाती तो देश में संसद की न्यायपालिका की और संविधान की आवश्यकता क्यों है? डॉ अंबेडकर ने कहा था यदि हम अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों को छोड़ देंगे तो इससे अराजकता फैलेगी हमें अराजकता बढ़ाने वाले आंदोलन को त्यागना होगा । क्या डॉक्टर अंबेडकर के इस कथन का कोई महत्व नहीं रह गया है?
 
 
 
CJP और NEET प्रोटेस्ट आज सभी और चर्चा का विषय है नीट पेपर लिखकर विरोध में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की स्थिति की मांग को लेकर सीपी पिछले मह भर से अधिक समय से धरने पर बैठी थी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने जिम्मेदारी लेते हुए अपना त्यागपत्र भी दे दिया । 15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक अनावश्यक याचिका को खारिज करते समय मुख्य न्यायाधीश की एक बेंच ने न्यायपालिका का समय खराब करने वाले और व्यवस्था के विरुद्ध बार-बार व्यर्थ याचिकाएं दायर करने वाले वकीलों पर टिप्पणी करते हुए ऐसे गैर जिम्मेदार तत्वों को कॉकरोच और पैरसाईट (परजीवी) कहा । इस टिप्पणी के तुरंत बाद बोस्टन अमेरिका में रहने वाले अभिजीत दीपक नामक एक व्यक्ति ने 16 में 2026 को अमेरिका में ही बैठे-बैठे ट्विटर पर कॉकरोच जनता पार्टी नाम से एक व्यंग्यात्मक अकाउंट बनाया और इसे आलसियों और बेरोजगारों की आवाज घोषित कर दिया । यानी गैर जिम्मेदार तत्वों के विरुद्ध की गई टिप्पणी के आधे हिस्से को प्रसारित कर इसे बेरोजगारों का अपमान बताया और इस आधार पर वातावरण निर्मित करने का प्रयास आरंभ किया गया । महज पांचवें दिन तक इंस्टाग्राम में संदेहास्पद तौर पर इसके 5 मिलियन फॉलोअर हो गए और 20 जुलाई 2026 को संसद के मानसून सत्र के पहले आयोजित सीजेपी के चलो संसद मार्च ने दिल्ली को एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील कर दिया ।
 
 
 
क्या यह विरोध प्रदर्शन वास्तव में NEET पेपर लीक के विरोध में किया गया था? वास्तव में इसका मुख्य एजेंडा सिस्टम के विरुद्ध लोगों में रोष उत्पन्न करना था। अगर वास्तव में यह विरोध प्रदर्शन पेपर लिक के लिए किया गया होता तो केवल धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ही नहीं बल्कि पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत बैस, कर्नाटक के शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा का इस्तीफा भी मांगा जाता क्योंकि उनके नाम भी पेपर लीक से जुड़े हुए हैं । शायद जंतर मंतर पर जमा युवाओं को उनके बारे में जानकारी नहीं होगी क्योंकि यह मुद्दा पेपर लिखा था ही नहीं यह मुद्दा केवल युवाओं की आड़ में राजनीतिक रोटी सेकने का था जिसको देश विरोधी ताकतो ने भी हवा दी । वास्तव में सारा विरोध नेपाल और बांग्लादेश की तरह सड़क आधारित सत्ता परिवर्तन के लिए था ।
अधिकार और कर्तव्य सदैव एक दूसरे के पूरक होते हैं । जितनी पुरजोर तरीके से अधिकारों की मांग की जा रही थी क्या उन युवाओं को राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का बोध था? आज वर्तमान में देश का युवा अपने कर्तव्य से विचलित हो चुका है वह केवल अधिकार की अनैतिक तरीके से मांग करना जानता है परन्तु राष्ट्र के प्रतिअपने कर्तव्य को भूल चुका है। हम केवल भारतीय संविधान में दिए गए मूल अधिकारों की मांग करना बेहतर तरीके से जानते हैं परंतु उसी संविधान में दिए गए मूल कर्तव्यों का भी हमें बोध होना आवश्यक है ।
 
 
 
यह तो स्पष्ट है कि जिसका दायित्व है उसे कठघरे में खड़ा तो होना होगा परंतु इसे केवल राजनीतिक चश्मे से ना देखा जाए निश्चित रूप से युवाओं पर लाठी चलाना कुछ हद तक अनुचित था l शांतिपूर्ण बिना आयुध के विरोध प्रदर्शन करना देश के संविधान में मूल अधिकार में समाहित है पर इस बात का ध्यान रखना भी नितांत आवश्यक है कि ऐसे प्रदर्शन से देश विरोधी ताकतों को हवा ना मिले । हमें यह बोध होना आवश्यकता है कि हमारे लिए राष्ट्र प्रथम है ।