डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार
भारत की संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा और वित्तीय शुचिता को मजबूत करने के उद्देश्य से लाया गया 'विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' संसद के पटल पर अभूतपूर्व राजनीतिक रस्साकशी का गवाह बना है। लोकतांत्रिक इतिहास में बहुत कम ऐसे अवसर आते हैं जब देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़े किसी अत्यंत महत्वपूर्ण मसौदे को सरकार संसद के दोनों सदनों से सीधे पारित कराने में असमर्थ साबित हो जाए और उसे विपक्ष के तीखे गतिरोध के आगे झुकते हुए इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने पर विवश होना पड़े।
वस्तुत: इस पूरे घटनाक्रम ने देश के सामने एक अत्यंत तार्किक और यक्ष प्रश्न खड़ा किया है कि जब देश में आने वाले कुल विदेशी चंदे का मात्र 15 प्रतिशत हिस्सा ही ईसाई मिशनरी संस्थानों के खाते में जाता है, तब फिर इस मामूली हिस्सेदारी को बचाने के लिए देश के भीतर चर्च, कांग्रेस और वामपंथी ताकतों का यह त्रिकोणीय सिंडिकेट इतनी आक्रामकता और सुसंगठित रूप से क्यों उठ खड़ा हुआ?
कहना होगा कि संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने हाल ही में संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस छद्म राजनीति की परतें खोलते हुए अकाट्य आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने सीधे तौर पर कहा है कि देशभर में एक सोची-समझी रणनीति के तहत यह झूठ फैलाया जा रहा है कि यह प्रस्तावित कानून अल्पसंख्यक या ईसाई मिशनरियों को निशाना बनाने के लिए गढ़ा गया है। रिजिजू ने सरकारी बही-खातों का हवाला देते हुए साफ किया कि कुल विदेशी पूंजी प्रवाह का लगभग 15 से 16 प्रतिशत हिस्सा ही ईसाई संगठनों के पास जाता है, जबकि शेष एक बड़ा हिस्सा हिंदू संगठनों, गैर-सरकारी कॉरपोरेट सामाजिक संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसियों को हस्तांतरित होता है।
वास्तव में यदि विरोध इसका करना ही चाहिए था तो वह बहुसंख्यक हिन्दू समाज की ओर से होता, किंतु ऐसा बिलकुल नहीं है। विरोध वे कर रहे हैं, जिनकी 100 फीसद में हिस्सेदारी 15 प्रतिशत की है! इससे यही नजर आ रहा है कि संसद के मानसून सत्र में जिस तरह से इस विधेयक के खिलाफ एक अभेद्य राजनीतिक दीवार खड़ी कर दी गई, उसने यह सिद्ध कर दिया कि भारत में विदेशी चंदे के बल पर फलने-फूलने वाले इस इकोसिस्टम का प्रभाव बहुत व्यापक और खतरनाक है। यह तंत्र भले ही संख्या बल में 15 फीसदी दिखता हो, किंतु इसकी योजनाबद्ध ताकत और राजनीतिक लॉबिंग की क्षमता सभी पर भारी पड़ती है!
वस्तुत: चर्च नेतृत्व और उनके राजनीतिक पैरोकार ये भली-भांति जानते हैं कि देश के सुदूर ग्रामीण, वनवासी, जनजाति और पूर्वोत्तर के संवेदनशील इलाकों में उन्होंने सेवा की आड़ में जो एक समानांतर साम्राज्य खड़ा किया है, उसकी चाबी एक झटके में उनके हाथों से छिन सकती है। कन्वर्जन की मनाही है, लेकिन विदेशी धन की आड़ में वे (ईसाई मिशनरी) यह सब देश भर में कर रही हैं। ऐसे में वह यही चाहते हैं कि जिस रूप में यह “एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026” आ रहा है, उसे नहीं आने दिया जाए। यही कारण है जो इस त्रिकोणीय गठजोड़ ने अपनी पूरी सांगठनिक और वैचारिक शक्ति झोंक दी। ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित कई बड़े वैश्विक संगठन, जैसे वर्ल्ड विजन इंडिया या मिशनरीज ऑफ चैरिटी जैसे अनेक संगठनों ने विरोध में मोर्चा खोल लिया।
समझने के लिए आप यह भी समझ सकते हैं कि चर्च, कांग्रेस और वामपंथ के इस गठजोड़ की जड़ें कितनी गहरी और सुविचारित हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाएं कि इन्होंने संसद के भीतर क्लॉज-दर-क्लॉज चर्चा होने ही नहीं दी। जैसे ही विधेयक चर्चा के लिए आया, विपक्षी सांसदों ने वेल में आकर नारेबाजी शुरू कर दी और यह नैरेटिव सेट करने का प्रयास किया कि सरकार तानाशाही रवैया अपनाकर अल्पसंख्यकों के संस्थानों को हड़पना चाहती है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सदन में खड़े होकर खुलेआम चुनौती दी कि विपक्ष इस पूरे मसौदे में एक भी ऐसा शब्द या क्लॉज खोज कर दिखाए जो किसी वैध और नियमसम्मत कार्य करने वाले अल्पसंख्यक संस्थान के विरुद्ध जाता हो, परंतु विपक्ष के पास इस तर्क का कोई उत्तर नहीं था। उनके पास सिर्फ हंगामा करने और विधेयक को टालने की रणनीति थी। आखिरकार, सरकार ने इस विधेयक को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को सौंप दिया।
इस पूरे घटनाक्रम का कुल सार यही है कि भारत के नीति-निर्धारण और विधायी प्रक्रियाओं में विदेशी धन पर पलने वाले तत्वों का हस्तक्षेप आज भी अत्यंत सुदृढ़ है। एक ऐसी सरकार जिसके पास पूर्ण बहुमत है और जो बड़े और कड़े फैसले लेने के लिए जानी जाती है, उसे भी इस छद्म सेक्युलर सिंडिकेट के संगठित विरोध के कारण अपने कदम कुछ समय के लिए पीछे खींचने पड़े हैं।
किरेन रिजिजू का यह वक्तव्य निश्चित तौर पर बहुत मायने रखता है कि भारत कोई सामान्य रिपब्लिक नहीं है, जहां विदेशी धन बिना किसी जवाबदेही के आता रहे, इस देश के आत्मसम्मान की हुंकार है। भले ही यह विधेयक जेपीसी की समीक्षा के कारण अस्थायी रूप से रुक गया हो, किंतु इसने देश के बहुसंख्यक समाज और राष्ट्रभक्त ताकतों के सामने यह सच पूरी तरह उजागर कर दिया है कि देश के भीतर बैठी हुई भीतरघाती ताकतें कितनी संगठित हैं।
सच तो यही है कि यह समय भारत की आंतरिक सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने और विदेशी पैसों के दम पर चलने वाली एजेंडा-राजनीति को समूल नष्ट करने का है। यदि चर्च, कांग्रेस, वामपंथ का ये गठजोड़ एक अच्छे कार्य को भी इसलिए नहीं होने दे रहे, क्योंकि इससे उनके हित प्रभावी होते हैं, तब फिर क्यों नहीं देश हित में शेष 85 फीसद एफसीआरए के समर्थन में अपनी आवाज बुलंद करते? अच्छा हो, ये सभी एकमत होकर भारत को भारत बनाए रखने के लिए आगे आएं और 'विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' के समर्थन में खड़े हों। तभी चर्च, कांग्रेस, वामपंथ गठजोड़ कमजोर होगा और परिणाम देश हित में सुखद एवं कल्याणकारी आएंगे।