कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार
गालीबाजी और देश से गद्दारी कम्युनिस्टों का चरित्र है। ये मैं नहीं इतिहास के पन्ने कह रहे हैं। ख़ुद 1945 में पंडित नेहरू ने भी ऐसा कहा। तथ्यों के आलोक में चलते हैं। जंतर-मंतर नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गा'लियां देने को जो लोग कूल बता रहे थे। नई लैंग्वेज बता रहे थे। कसीदे पर कसीदे पढ़े जा रहे थे।असल में इनका DNA ही गालीबाज है और इनका ये मुखौटा कई बार उतर चुका है। क्योंकि ये उन्हीं कम्युनिस्टों की औलादें हैं जो पूज्य महात्मा गांधी, गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, पंडित नेहरू, सरदार पटेल तक को गाली देते रहे हैं। क्योंकि इनकी निष्ठा भारत और भारत के लोकतंत्र में कभी नहीं रही है। स्वाधीनता संग्राम के विरोध, पाकिस्तान निर्माण में पैरोकारी से लेकर भारत-चीन 1962 के युद्ध में ये चीन के समर्थन में कम्युनिस्ट लामबंद थे। चीन को आक्रमणकारी मानने से इनकार कर दिया था।भारत के पोखरण परमाणु परीक्षण कार्यक्रम का वामपंथियों ने देश भर में विरोध किया था। वर्तमान में भी जहां-जहां भारत शक्तिशाली होता नज़र आता है। ये विदेशों में बैठे अपने आकाओं की कमांड पर प्रहसन में जुट जाते हैं। कांग्रेस की वैचारिकी में कब्ज़ा जमा कर कांग्रेस को ख़त्म करने वाले कम्युनिस्टों को कांग्रेस जिस तरह से खाद पानी दे रही है। उसे क्या इनके कुकृत्य नहीं मालूम हैं ? कांग्रेस जहां स्वाधीनता संग्राम का क्रेडिट 'एक दो लोगों' के नाम पर कॉपीराइट और कैश कराती मिलती है। वहीं दूसरी ओर इन कम्युनिस्ट गालीबाजों को शीर्ष पर विराजती है। सो, क्या कांग्रेस की नज़र में ये स्वाधीनता संग्राम का अपमान नहीं होता?
मूल मुद्दे पर क्रमशः तथ्यात्मक प्रकाश डालेंगे लेकिन इन ऐतिहासिक और वर्तमान पृष्ठभूमि के विषय में जानना आवश्यक है।दूसरा बिंदु ये कि भारतीय उद्योगपतियों से भी वामपंथी इकोसिस्टम की नफ़रत जगज़ाहिर है। ये कभी भी विदेशी उद्योगपति के ख़िलाफ़ कुछ भी बोलते नहीं मिलते हैं। लेकिन अगर कोई भारतीय उद्योगपति शीर्ष पर पहुंचता है तो इनके पेट में मरोड़ें उठने लगती हैं। क्योंकि भारतीय उद्योगपति बढ़ेंगे तो भारत का प्रभुत्व होगा। हम आत्मनिर्भर होंगे। लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। इसलिए ये कहां बर्दाश्त होगा? आज कल ये गिरोह 'अडानी-अंबानी' के नाम से जैसे विध्वंसक ज़हर की खेती करता है। ठीक उसी तर्ज़ पर ये पहले 'टाटा और बिरला' के नाम पर पंडित नेहरू और सरदार पटेल को टारगेट करते थे। इतिहासकार स्व. सीताराम गोयल ने वर्षों पहले पुस्तक लिखी थी —'हिन्दू समाज : संकटों के घेरे में' जिसका प्रथम प्रकाशन 1984 में हुआ। इसी पुस्तक के 50वें पृष्ठ पर वो लिखते हैं —“भारत में कम्युनिज्म ने एक गाली-शास्त्र का आविष्कार भी किया है। इस शास्त्र में विहित गालियों की बौछार पार्टी अपने विरोधियों पर बरसाती रहती है। इन गालियों की चोट कितनी गहरी हो सकती है यह कई-एक उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा। १९४८-५० के दौरान पार्टी रणदिवे-नीति का अनुसरण कर रही थी। उस समय महात्मा गाँधी को "पूँजीवाद का सबसे धूर्त गुण्डा" बतलाया गया था और कविगुरु रविन्द्रनाथ को "माघीर दलाल" अर्थात "वेश्याओं का दलाल" ठहराया गया था।”
वर्तमान में आप देखते होंगे कि ये पूरा इकोसिस्टम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर अपमानजक टिप्पणियां करता है। भारतीय उद्योगपतियों यथा बहुधा 'अडानी-अंबानी' के नाम पर घ्रणा और नफ़रत का दुष्प्रचार करता रहता है। कांग्रेस और उसके वर्तमान नेता इसमें आनंद का अतिरेक प्राप्त करते हैं। चुनावी अभियान समझते हैं। जबकि ठीक इसी पैटर्न से पूर्व में कम्युनिस्ट पंडित नेहरू और सरदार पटेल को लांछित और अपमानित करते थे। इसी संदर्भ में सीताराम गोयल लिखते हैं कि —
“किन्तु सबसे भारी-भरकम गाली पण्डित नेहरू तथा सरदार पटेल के हिस्से में आई थी। पार्टी ने उनको "फासिस्ट-द्वय" की पदवी से तो विभूषित किया ही था, साथ ही पार्टी के लब्धप्रतिष्ठ बंगला मासिक 'परिचय' ने "अमरीकी साम्राज्यवाद की सेवा में रत" इन नेताओं की "काली करतूतों" का "भण्डाफोड़" भी एक कविता में कर डाला था। कविता की एक पंक्ति में कहा गया था कि ये दोनों "श्याला सुआरेर बाच्चा, बिड़ला टाटार जारोज शोन्तान" हैं, अर्थात "ये साले सूअर के बच्चे बिड़ला-टाटा की नाजायज़ सन्तान हैं।"
किन्तु कम्युनिस्ट पार्टी की किसी भी पुरानी करतूत का दोष पार्टी पर लगाना कठिन है। कारण, पार्टी को ज्यों ही रूस का आदेश मिलता है कि नीति बदल दी जाए, त्यों ही पार्टी अपनी भूलें स्वीकार कर लेती है और छाती पीट कर अपने पुराने पापों पर विलाप करने लगती है।
लोग समझते हैं कि चलो कम्युनिस्ट पार्टी सही रास्ते पर आ गई और मामला रफा-दफा हो गया। किन्तु पार्टी किसी भी समय अपने गाली-शास्त्र का नया पाठ शुरू कर सकती है। इन दिनों पार्टी के गाली-शास्त्र का अखण्ड पाठ आत्मनिष्ठ राष्ट्रवाद के विरुद्ध किया जा रहा है। इस राष्ट्रवाद के अनुयाइयों को नित्य ही सम्प्रदायवादी, आक्रामक प्रवृत्ति वाले, अल्पसंख्यकों के फासिस्ट हत्यारे, नरमेध के प्रवर्तक, प्रतिक्रिया के पोषक और अतीत का अन्धानुकरण करने-कराने वाले कहा जा रहा है। यह याद करने पर कि पार्टी का स्वर कितना प्रखर हो सकता है, इतना मानना पड़ेगा कि पार्टी का रुख अभी अपेक्षाकृत सौम्य है। किन्तु ऐसे संकेत भी मिलते हैं कि जरूरत पड़ने पर कम्युनिस्ट पार्टी का स्वर फिर अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच सकता है।”
(संदर्भ:हिन्दू समाज : संकटों के घेरे में, पृ-50, सीताराम गोयल, भारत भारती प्रकाशन नई दिल्ली संस्करण 2010)
ठीक इसी तरह कम्युनिस्ट नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को लेकर कैसी मानसिकता रखते थे? उसे समझना आवश्यक है। ख्यातिलब्ध लेखक, डॉ शंकर शरण 22 अक्टूबर 2018 को 'नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को तोजो का कुत्ता बताते थे वामपंथी' ; इस शीर्षक से लेख लिखा। इसमें वो लिखते हैं —“1940 में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तिका 'बेनकाब दल व राजनीति' में नेताजी को 'अंधा मसीहा' कहा गया। फिर उनके कामों को कहा गया, 'सिद्धांतहीन अवसरवाद, जिसकी मिसाल मिलनी कठिन है। यह सब तो नरम मूल्यांकन था। धीरे-धीरे नेताजी के प्रति कम्युनिस्ट शब्दावली हिंसक और गाली-गलौज से भरती गई। जैसे, 'काला गिरोह', 'गद्दार बोस', 'दुश्मन के जरखरीद एजेंट', 'तोजो (जापानी तानाशाह) और हिटलर के अगुआ दस्ते', 'राजनीतिक कीड़े', 'सड़ा हुआ अंग जिसे काटकर फेंकना है',आदि। ये सब विशेषण सुभाष बोस और उनकी सेना आई़ एऩ ए़ (इंडियन नेशनल आर्मी) के लिए थे। तब कम्युनिस्ट मुखपत्रों, पत्रिकाओं में नेताजी के कई कार्टून छपे थे, जिससे कम्युनिस्टों की घोर अंधविश्वासी मानसिकता की झलक मिलती है (उन पर सधी नजर रखने वाले इतिहासकार स्व़ सीताराम गोयल के सौजन्य से वे कार्टून उपलब्ध हैं)। अधिकांश कार्टूनों में सुभाष बाबू को 'जापानी, जर्मन फासिस्टों का कुत्ते या बिल्ली' जैसा दिखाया गया है, जिससे उसका मालिक जैसे चाहे खेलता है।”
इतना ही नहीं कम्युनिस्ट - नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और महात्मा गांधी जी को लेकर कैसे परिभाषित कर रहे थे। उस पर भी डॉ शंकर शरण लिखते हैं — “एक कार्टून में बोस को तोजो का मुखौटा, तो अन्य में भारतवासियों पर जापानी बम गिराने वाला दिखाया गया है। एक में बोस को 'गांधीजी की बकरी छीनने वाला' दिखाया गया। एक कार्टून में तोजो एक गधे के गले में रस्सी डाले सवारी कर रहा है, उस गधे का मुंह बोस जैसा बना था। दूसरे में बोस को 'तोजो का पालतू क्षुद्र बौना' दिखाया, आदि।”
साथ ही कम्युनिस्ट कैसे परजीवी बन जाते हैं सुविधानुसार वो कैसे अपना स्टैंड बदलते हैं? शंकर शरण के इस विवेचन से और सुस्पष्ट होता है —“कम्युनिस्ट अखबार पीपुल्स डेली (10 जनवरी 1943) में तब कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता रणदिवे ने अपने लेख में बोस को 'जापानी साम्राज्यवाद का गुंडा' तथा उनकी सेना को 'भारतीय भूमि पर लूट, डाका, विध्वंस मचाने वाला भड़ैत' बताया। लेकिन रोचक बात यह है कि यह सब कहने के बाद, समय बदलते ही, जब आई़ एऩ ए. की लोकप्रियता देशभर में बढ़ने लगी, तो कम्युनिस्टों ने उसके बंदी सिपाहियों के पक्ष में लफ्फाजी शुरू कर दी।”
इस क्रम में ये तथ्य भी उल्लेखनीय हैं। 'कम्युनिस्ट विश्वासघात की कहानी' पुस्तक के लेखक और ख्यातिलब्ध संपादक रहे रामशंकर अग्निहोत्री अपने एक लेख में लिखते हैं — “भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान भारत की कम्युनिस्ट पार्टी सोवियत संघ के इशारे पर अंग्रेजों की चाटुकारिता करने, गांधी जी और सुभाष चन्द्र बोस को जापान का एजेंट बताने, भारतीय स्वाधीनता सेनानियों को बन्दी बनवाकर जेलों में सड़ने देने की राष्ट्रघाती नीतियों को व्यावहारिक रूप देने में जोर-शोर से लगी हुई थी।”
आगे रामशंकर अग्निहोत्री 'भारत छोड़ो आंदोलन' से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाते हैं कि - आखिर कैसे कम्युनिस्ट न सिर्फ़ भारत छोड़ो आंदोलन की ख़िलाफ़त कर रहे थे। बल्कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को अपमानित कर रहे थे। रामशंकर अग्निहोत्री लिखते हैं —“इस संबंध में यह तथ्य ध्यान रखने योग्य है कि जब कांग्रेस अगस्त, 1942 में अंग्रेजों के विरुद्ध 'भारत-छोड़ो' का उद्घोष करने जा रही थी उसी समय 26 जुलाई, 1942 को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस कार्यसमिति के नाम एक खुली चिट्ठी प्रकाशित की थी। इसमें कहा गया था कि "आपके प्रस्तावित अगस्त-प्रस्ताव के द्वारा संघर्ष छेड़ने से अंग्रेज नौकरशाहों को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को "पंचमांगी" कहकर बदनाम करने का अवसर मिलेगा। आपका प्रस्तावित भारत-छोड़ो संघर्ष फासिस्ट जापानियों को देश के भीतर आने में सहायता पहुंचाएगा।" इसी तरह नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की अवमानना और अवज्ञा करते हुए कम्युनिस्टों ने लिखा कि "आखिर जापान-समर्थक भावना किन लोगों में पैदा हुई थी? उन्हीं लोगों में जिनमें आत्मविश्वास नहीं था और जो जापानियों से यह आशा करते थे कि वे अंग्रेजों को इस देश से निकालकर सम्पूर्ण हिन्दुस्थान उन्हें सौंप देंगे।”
(संदर्भ- भारत का कम्युनिस्ट पार्टी-एक संक्षिप्त इतिहास, लेखक-एम.आर.मसानी)
कम्युनिस्टों के राष्ट्रघाती दुष्प्रचार को तो रामशंकर अग्निहोत्री तथ्यात्मक रूप से उद्धृत करते ही हैं। इसके साथ ही पंडित नेहरू की कम्युनिस्टों को लेकर की गई महत्वपूर्ण टिप्पणी को भी उल्लेखित करते हैं। वे लिखते हैं कि —“केरल के अन्दर ए.के. गोपालन और ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद जैसे नेता संकट की उस घड़ी में कांग्रेस को छोड़कर सम्पूर्ण दल-बल के साथ कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए थे। इसीलिए कम्युनिस्टों की इन राष्ट्रघाती कारगुजारियों पर टिप्पणी करते हुए अक्तूबर, 1945 में पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि —“जब देश के हित के लिए लाखों भारतीयों ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था, उस समय कम्युनिस्ट देश के शत्रुओं से जा मिले थे, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।”
(संदर्भ- माडर्न इंडियन पालिटिकल थिंकर्स लेखक-डा. विष्णु भगवान)।
अभिप्रायत: कम्युनिस्टों की वैचारिकी, कृत्यों को संक्षेप में समझना चाहें तो इन तथ्यों से उनका भारत विभाजनकारी मूल प्रकट होता है। गालियां इनके रणनीतिक हथियार हैं। गद्दारी इनका स्वभाव है। दुर्भाग्यवश वर्तमान कांग्रेस इसका अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। वो भी कम्युनिस्टों की वैचारिकी के गुलाम की तरह नज़र आ रही है। जिस तरह से कम्युनिस्टों ने पूज्य बापू से लेकर गुरुदेव टैगोर, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस समेत स्वातंत्र्य वीरों को अपमानित किया। गालियां दी। उनके विरुद्ध अभियान चलाए। भारत के सशक्तिकरण के ख़िलाफ़ व्यापक अभियान और वैचारिक दुष्प्रचार, घ्रणा का व्यापार किया। वो कभी माफ़ करने के योग्य नहीं है। आवश्यकता इनके मूल, कुकृत्यों को समझने और जानने की है। इन्हें बेनकाब करने की है। क्योंकि ये मुखौटा कोई और धारण करते हैं और प्रोपेगैंडा कोई और चलाते हैं।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस इकोसिस्टम को यों ही 'दिमागी नक्सली' न कहा होगा? क्योंकि जो भी समाज में हिंसा, अराजकता, उपद्रव, वैमनस्य आदि को फैलाए। वो और भला क्या हो सकता है?