डॉ. भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री और भारतीय राजनीति के अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय सार्वजनिक जीवन की ऐसी विराट विभूति थे, जिनके व्यक्तित्व में विचार की दृढ़ता, भाषा की गरिमा, लोकतांत्रिक मर्यादा, राष्ट्रभक्ति और मानवीय संवेदना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। 16 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि केवल एक महान राजनेता को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उस वैचारिक परंपरा कोसमझने का दिन है, जिसने राजनीति को सत्ता प्राप्ति से आगे राष्ट्रसेवा का माध्यम माना।
अटल जी का जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक स्वयंसेवक और प्रचारक के रूप में आरंभ हुआ। संघ ने उन्हें केवल संगठन का कार्यकर्ता नहीं बनाया, बल्कि राष्ट्र को सर्वोपरि मानने, अनुशासन में रहकर कार्य करने, समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने और भारत की सांस्कृतिक चेतना को आधुनिक लोकतांत्रिक जीवन से जोड़ने की दृष्टि दी। यही कारण है कि अटल जी की राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ संवाद, सहमति और लोकतांत्रिक उदारता भी दिखाई देती है।
स्वयंसेवक से राष्ट्रीय नेता तक
अटल जी ने सार्वजनिक जीवन में जिस यात्रा की शुरुआत की, उसमें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की अपेक्षा संगठन और राष्ट्र का भाव अधिक महत्वपूर्ण था। संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने समाज के बीच काम किया, लोगों को समझा और राष्ट्रजीवन के प्रश्नों को निकट से देखा।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि विचारधारा उनके लिए संघर्ष का कारण नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की दिशा थी। वे अपने विचारों पर दृढ़ रहते थे, लेकिन विरोधी विचार रखने वाले व्यक्ति के प्रति सम्मान बनाए रखते थे।
यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र में वे सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच सम्मान प्राप्त करने वाले नेताओं में गिने गए।
हिंदी को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा
अटल बिहारी वाजपेयी केवल राजनेता नहीं, बल्कि हिंदी के विलक्षण कवि, वक्ता और पत्रकार भी थे। उनकी भाषा में ओज था, लेकिन उसमें संवेदना भी थी। उनके भाषण राजनीतिक होते हुए भी साहित्यिक प्रभाव छोड़ते थे।
संयुक्त राष्ट्र के मंच पर हिंदी में उनका संबोधन भारतीय भाषा और संस्कृति के आत्मविश्वास का प्रतीक बना। उन्होंने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत आधुनिकता और वैश्विक संवाद की ओर बढ़ सकता है, लेकिन अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान को छोड़े बिना।
आज जब नई पीढ़ी वैश्विक संचार की दुनिया में प्रवेश कर रही है, अटल जी का जीवन यह संदेश देता है कि वैश्विक होना अपनी जड़ों को छोड़ना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों के बल पर दुनिया के सामने खड़ा होना है।
पत्रकारिता से संसद तक
अटल जी ने पत्रकारिता को भी राष्ट्रजागरण का माध्यम बनाया। उन्होंने लेखन और संपादन के माध्यम से राष्ट्रीय चिंतन को व्यापक समाज तक पहुंचाने का प्रयास किया। पत्रकारिता ने उनके भीतर तर्क, संवाद और सामाजिक प्रश्नों को समझने की क्षमता विकसित की।
संसद में उनका प्रवेश भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय बना। उनका वक्तृत्व केवल शब्दों की चमक नहीं था; उसमें अध्ययन, इतिहासबोध और विषय की गहरी समझ दिखाई देती थी।
विरोधी दल के नेता के रूप में उन्होंने सरकार की आलोचना की, लेकिन राष्ट्रहित के प्रश्नों पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश भी की। यही संसदीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।
प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रनिर्माण
अटल जी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा, आधारभूत संरचना, आर्थिक नीति, विज्ञान और तकनीक तथा वैश्विक कूटनीति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए।
1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों ने भारत की सामरिक क्षमता और आत्मविश्वास को दुनिया के सामने स्थापित किया। इसके बाद उत्पन्न अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी।
उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी पहलों ने देश के बुनियादी ढांचे को नई दिशा दी। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना ने देश के प्रमुख महानगरों को बेहतर सड़क संपर्क से जोड़ने की महत्वाकांक्षी पहल को गति दी।
अटल जी का दृष्टिकोण केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं था। गांव, किसान, गरीब और दूरदराज के क्षेत्र भी उनके विकास चिंतन का हिस्सा थे।
कारगिल और राष्ट्रीय स्वाभिमान
1999 का कारगिल युद्ध अटल सरकार के सामने बड़ी चुनौती बनकर आया। भारत ने सैन्य और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर दृढ़ता दिखाई। भारतीय सैनिकों के साहस और बलिदान के प्रति अटल जी की संवेदनशीलता उनके राष्ट्रवादी नेतृत्व की पहचान बनी।
उनकी राजनीति में राष्ट्रवाद आक्रामक नारों तक सीमित नहीं था। वह सैनिक के सम्मान, सीमाओं की सुरक्षा और देश की सामरिक क्षमता को मजबूत करने के साथ जुड़ा हुआ था।
पड़ोसी देशों के साथ शांति का प्रयास
अटल जी की राष्ट्रनीति में शक्ति और शांति दोनों साथ-साथ दिखाई देते हैं। वे भारत की सुरक्षा के प्रति दृढ़ थे, लेकिन युद्ध को अंतिम विकल्प मानते थे।
उनकी लाहौर बस यात्रा और पाकिस्तान के साथ संवाद का प्रयास यह दर्शाता है कि एक मजबूत राष्ट्र भी शांति की पहल कर सकता है। उनका प्रसिद्ध भाव था कि मित्र बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं। इसलिए पड़ोस के साथ संवाद की आवश्यकता बनी रहती है।
यह दृष्टिकोण आज की पीढ़ी के लिए भी महत्वपूर्ण है—राष्ट्रहित पर कोई समझौता नहीं, लेकिन शांति के रास्ते बंद भी नहीं।
अजातशत्रु व्यक्तित्व
अटल जी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में से एक उनका व्यक्तित्व था। वे अपने राजनीतिक विरोधियों के भी प्रिय रहे।
उनके भाषणों में विपक्ष की आलोचना होती थी, लेकिन व्यक्तिगत कटुता बहुत कम दिखाई देती थी। उन्होंने लोकतंत्र को केवल चुनाव जीतने की व्यवस्था नहीं माना, बल्कि विचारों के सह-अस्तित्व की व्यवस्था माना।
इसीलिए उन्हें भारतीय राजनीति का 'अजातशत्रु' कहा गया।
उनका जीवन यह सिखाता है कि राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मनभेद लोकतंत्र को कमजोर करते हैं।
राष्ट्रधर्म की उनकी अवधारणा
अटल जी के लिए राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं था। भारत उनके लिए एक जीवंत सांस्कृतिक राष्ट्र था—जिसकी हजारों वर्षों की परंपरा, विविधता, भाषाएं, आस्थाएं और सामाजिक स्मृतियां उसकी शक्ति हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि से निकले होने के बावजूद उन्होंने लोकतांत्रिक राजनीति में व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता बनाई। यह उनकी संवाद क्षमता और लोकतांत्रिक दृष्टि का प्रमाण है।
उन्होंने दिखाया कि वैचारिक प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिक उदारता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं।
आने वाली पीढ़ी के लिए अटल संदेश
आज की युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल रोजगार या तकनीक की नहीं, बल्कि दिशा की भी है। सोशल मीडिया के तेज दौर में विचार कई बार अधूरी जानकारी, उत्तेजना और तात्कालिक प्रतिक्रियाओं में बदल जाते हैं।
अटल जी का जीवन युवाओं को पांच बड़े संदेश देता है—
पहला—विचार रखें, लेकिन संवाद का दरवाजा खुला रखें।
दूसरा—अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करें, लेकिन दुनिया से संवाद करने का आत्मविश्वास भी रखें।
तीसरा—सत्ता को लक्ष्य नहीं, राष्ट्रसेवा का माध्यम समझें।
चौथा—विपरीत विचार रखने वाले व्यक्ति का सम्मान करना लोकतंत्र की ताकत है।
पांचवां—व्यक्तिगत सफलता से बड़ा लक्ष्य राष्ट्र और समाज के लिए उपयोगी बनना है।
स्वयंसेवक से राष्ट्रनायक बनने की प्रेरणा
अटल जी की यात्रा हमें यह समझाती है कि एक सामान्य स्वयंसेवक भी अपने विचार, अनुशासन, अध्ययन, परिश्रम और राष्ट्रसमर्पण के बल पर राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित कर सकता है।
उनकी शक्ति केवल पद में नहीं थी। उनकी शक्ति उनके व्यक्तित्व, विचार, शब्द और चरित्र में थी।
एक स्वयंसेवक के रूप में उन्होंने संगठन से अनुशासन सीखा, पत्रकार के रूप में समाज को समझा, कवि के रूप में संवेदनाओं को शब्द दिए, सांसद के रूप में लोकतंत्र को मजबूत किया और प्रधानमंत्री के रूप में भारत की सामरिक तथा विकास यात्रा को नई दिशा दी।
यही अटल जी की सबसे बड़ी विरासत है।
स्मृति नहीं, संकल्प का दिवस
अटल जी की पुण्यतिथि पर उन्हें केवल पुष्पांजलि देना पर्याप्त नहीं। उनके विचारों को जीवन में उतारना ही उनके प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि होगी।
आज आवश्यकता है कि युवा उनके भाषण पढ़ें, उनकी कविताएं पढ़ें, संसद में उनके वक्तव्यों का अध्ययन करें और उनके सार्वजनिक जीवन को समझें। वे यह सीखें कि लोकप्रिय होना और महान होना अलग-अलग बातें हैं। महानता दीर्घकालीन चरित्र, विचार और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण से आती है।
अटल जी ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि राजनीति में कविता की संवेदना, पत्रकार की दृष्टि, स्वयंसेवक का अनुशासन, राजनेता का साहस और राष्ट्रनायक की दूरदृष्टि एक साथ संभव है।
उनकी कविता की पंक्ति—“हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा”—उनके जीवन के संघर्ष और संकल्प का सार प्रतीत होती है।
आज उनकी पुण्यतिथि पर यही संकल्प होना चाहिए कि भारत की नई पीढ़ी ज्ञान में आधुनिक, विचार में स्वतंत्र, संस्कृति में आत्मविश्वासी, लोकतंत्र में मर्यादित और राष्ट्र के प्रति समर्पित बने।
अटल जी चले गए, लेकिन उनका अटल विचार आज भी भारत की लोकतांत्रिक चेतना, राष्ट्रभक्ति और हिंदी के स्वाभिमान में जीवित है।
उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।