डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं चिंतक
भारतीय लोकतंत्र में चुनावी व्यवहार को समझना कभी भी आसान नहीं रहा। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने राजनीतिक विमर्श को नई दिशा अवश्य दी है, लेकिन कई बार यह भ्रम भी पैदा कर देता है कि डिजिटल दुनिया ही पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है। हाल के वर्षों में यह धारणा बार-बार सामने आई कि जनरेशन Z (1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा) भारतीय जनता पार्टी से तेजी से दूर हो रही है। इंस्टाग्राम, एक्स (पूर्व ट्विटर) और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर दिखाई देने वाले विरोध, व्यंग्य और आलोचनाओं के आधार पर ऐसे निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या सोशल मीडिया का रुझान वास्तव में मतदान का रुझान भी होता है?
इस प्रश्न का उत्तर भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं में छिपा है। भारत की युवा पीढ़ी एक समान नहीं है। इसमें महानगरों के छात्र, छोटे शहरों के युवा, ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थी, तकनीकी क्षेत्र में कार्यरत पेशेवर, किसान परिवारों के बेटे-बेटियां, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी तथा असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों युवा शामिल हैं। इन सभी की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। इसलिए कुछ हजार वायरल पोस्ट या ट्रेंडिंग हैशटैग के आधार पर पूरी पीढ़ी की राजनीतिक सोच का अनुमान लगाना उचित नहीं कहा जा सकता।
यह भी सत्य है कि आज का युवा अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण रोजगार की अनिश्चितता और महंगाई जैसी चुनौतियों ने उसके भीतर असंतोष पैदा किया है। इन मुद्दों पर युवाओं ने मुखर होकर अपनी आवाज उठाई है। NEET सहित विभिन्न परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं के विरोध ने यह स्पष्ट कर दिया कि युवा अपने भविष्य से जुड़े प्रश्नों पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
लेकिन सरकार की किसी नीति का विरोध करना और चुनाव में सरकार के विरुद्ध मतदान करना दोनों अलग-अलग बातें हैं। भारतीय मतदाता अक्सर मुद्दों के आधार पर सरकार की आलोचना भी करता है और उसी सरकार को पुनः अवसर भी देता है। यही भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है।
विभिन्न चुनावी अध्ययनों और सर्वेक्षणों से भी यह संकेत मिलता रहा है कि युवाओं का एक बड़ा वर्ग अभी भी भाजपा को शासन, नेतृत्व और विकास के प्रश्न पर अपेक्षाकृत अधिक सक्षम मानता है। अनेक सर्वेक्षणों में रोजगार, राष्ट्रीय सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं के संदर्भ में भाजपा के प्रति विश्वास दिखाई देता है, जबकि शिक्षा जैसे कुछ मुद्दों पर अन्य दलों के प्रति झुकाव भी देखा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि युवा मतदाता किसी एक विचारधारा में बंधा हुआ नहीं है, बल्कि वह मुद्दों के आधार पर अलग-अलग राय रखता है।
आज की जनरेशन Z भावनात्मक राजनीति की अपेक्षा परिणाम आधारित राजनीति को अधिक महत्व देती है। यह पीढ़ी सरकार से सवाल पूछती है, सोशल मीडिया पर विरोध दर्ज कराती है, लेकिन मतदान के समय अपने दीर्घकालिक हितों, स्थानीय परिस्थितियों, विकास कार्यों, परिवार की प्राथमिकताओं और उपलब्ध राजनीतिक विकल्पों का भी आकलन करती है। इसलिए यह संभव है कि वही युवा किसी परीक्षा घोटाले के खिलाफ प्रदर्शन करे और चुनाव में उसी दल को वोट भी दे, यदि उसे लगे कि विकल्प अपेक्षाकृत कमजोर हैं।
सोशल मीडिया की एक बड़ी सीमा यह भी है कि वह मुख्यतः शहरी, शिक्षित और डिजिटल रूप से सक्रिय वर्ग की आवाज को अधिक प्रमुखता देता है। जबकि भारत के चुनाव केवल महानगरों में नहीं, बल्कि गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में भी तय होते हैं। वहां सड़क, बिजली, पानी, आवास, गैस कनेक्शन, स्वास्थ्य सेवाएं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, कानून-व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और स्थानीय नेतृत्व जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक विमर्श।
इसी कारण किसी वायरल रील, ट्रेंडिंग हैशटैग या डिजिटल अभियान को चुनावी परिणाम का पूर्वानुमान मान लेना अक्सर भ्रामक सिद्ध होता है। भारतीय मतदाता कई बार सोशल मीडिया पर व्यक्त विचारों से अलग मतदान करता है। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय मतदान केंद्र पर होता है, न कि कमेंट बॉक्स में।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकारें युवाओं की चिंताओं की अनदेखी कर सकती हैं। यदि रोजगार सृजन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था और आर्थिक अवसरों पर अपेक्षित प्रगति नहीं हुई, तो भविष्य में राजनीतिक समीकरण बदल भी सकते हैं। युवा भारत अवसर चाहता है, केवल आश्वासन नहीं। इसलिए प्रत्येक सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती रोजगार और विश्वास दोनों को मजबूत करना है।
जनरेशन Z को किसी एक राजनीतिक खांचे में रखना उचित नहीं होगा। यह पीढ़ी डिजिटल है, जागरूक है, प्रश्न पूछती है और अपने अधिकारों के प्रति सजग है। लेकिन यह उतनी ही व्यावहारिक भी है। वह विरोध और समर्थन दोनों को परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग देखती है। इसलिए भारतीय राजनीति को समझने के लिए केवल इंस्टाग्राम, एक्स या सोशल मीडिया के ट्रेंड पर्याप्त नहीं हैं। भारत का वास्तविक राजनीतिक मन आज भी गांवों, कस्बों, परिवारों, स्थानीय मुद्दों और अंततः मतदान केंद्रों में आकार लेता है।
भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सबक यही है कि सोशल मीडिया जनमत का एक महत्वपूर्ण संकेतक हो सकता है, लेकिन वह पूरे भारत का पर्याय नहीं है। चुनावी लोकतंत्र में अंतिम निर्णय हमेशा मतपेटी करती है, मोबाइल स्क्रीन नहीं।