राष्ट्र निर्माण की छात्र चेतना के 78 वर्ष : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना, उद्देश्य और राष्ट्रीय योगदान

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    09-Jul-2026
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राष्ट्र निर्माण की छात्र चेतना के 78 वर्ष : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना, उद्देश्य और राष्ट्रीय योगदान 
 
 
-डॉ. भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
 
9 जुलाई भारतीय छात्र आंदोलन के इतिहास में एक ऐसी तिथि है, जिसने छात्र शक्ति को केवल परिसर की राजनीति तक सीमित न रखकर राष्ट्र निर्माण की एक सशक्त धारा में परिवर्तित करने का मार्ग प्रशस्त किया। इसी दिन 1949 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की स्थापना हुई। वर्ष 2026 में परिषद अपना 78वाँ स्थापना दिवस मना रही है। यह अवसर केवल एक छात्र संगठन की वर्षगाँठ नहीं, बल्कि भारतीय युवा शक्ति, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और शिक्षा के भारतीय दृष्टिकोण की सात दशक से अधिक लंबी यात्रा का उत्सव है।
 
 
भारत का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि जब-जब युवाओं ने राष्ट्रीय उद्देश्यों को अपना लक्ष्य बनाया, तब-तब देश ने नई दिशा प्राप्त की। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर राष्ट्र के पुनर्निर्माण तक छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद यह आवश्यकता अनुभव की गई कि छात्र ऊर्जा को सकारात्मक दिशा मिले, ताकि वह राष्ट्र निर्माण, शिक्षा सुधार और सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सके। इसी विचार ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जन्म का मार्ग प्रशस्त किया।
 
 
स्वतंत्र भारत की चुनौतियाँ और एबीवीपी की स्थापना
 
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही भारत अनेक कठिन चुनौतियों का सामना कर रहा था। विभाजन की त्रासदी, विस्थापन, सांप्रदायिक तनाव, आर्थिक संकट, शिक्षा व्यवस्था की कमजोर स्थिति और राष्ट्रीय एकता की चुनौती देश के सामने थी। विश्वविद्यालयों में वैचारिक संघर्ष बढ़ रहे थे तथा छात्र आंदोलनों को विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएँ प्रभावित कर रही थीं।
 
 
ऐसे समय यह अनुभव किया गया कि विद्यार्थियों को केवल राजनीतिक संघर्ष का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें राष्ट्र निर्माण की सकारात्मक शक्ति के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से 9 जुलाई 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना हुई।
 
 
प्रारंभिक वर्षों में परिषद ने छात्र संगठन के रूप में अपनी पहचान बनाई, किंतु शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि इसका उद्देश्य केवल छात्रसंघ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करना है।
 
 
वैचारिक आधार : "ज्ञान, शील और एकता"
एबीवीपी का ध्येय वाक्य है—"ज्ञान, शील और एकता।"
इन तीन शब्दों में परिषद का संपूर्ण दर्शन समाहित है।
 
ज्ञान का अर्थ केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं, बल्कि विवेक, वैज्ञानिक दृष्टि, शोध, नवाचार और जीवनोपयोगी शिक्षा प्राप्त करना है।
 
शील का अर्थ चरित्र, अनुशासन, नैतिकता, सेवा, ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व से है। परिषद मानती है कि ज्ञान बिना चरित्र के समाज के लिए उपयोगी नहीं हो सकता।
 
एकता का अर्थ भारत की सांस्कृतिक विविधता में निहित राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करना है। भाषा, क्षेत्र, जाति और पंथ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना परिषद की मूल भावना है।
 
 
यशवंतराव केलकर : संगठन के वैचारिक शिल्पकार
 
एबीवीपी के संगठनात्मक विस्तार और वैचारिक विकास में यशवंतराव केलकर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने परिषद को केवल आंदोलनकारी संगठन नहीं रहने दिया, बल्कि उसे वैचारिक, रचनात्मक और राष्ट्रोन्मुख छात्र संगठन का स्वरूप प्रदान किया।
 
 
उन्होंने यह विचार स्थापित किया कि "आज का विद्यार्थी आज का नागरिक है।" यह दृष्टिकोण एबीवीपी की कार्यप्रणाली का आधार बन गया। परिषद का मानना है कि छात्र केवल भविष्य के नागरिक नहीं हैं; वे वर्तमान में भी समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी हैं।
 
 
शिक्षा का भारतीय दृष्टिकोण
 
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं मानती। उसके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना है जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ संस्कारित, उत्तरदायी और राष्ट्रभक्त भी हों।
 
 
परिषद समय-समय पर निम्न विषयों को लेकर सक्रिय रही है—
 
- भारतीय संस्कृति पर आधारित शिक्षा।
- मातृभाषा में शिक्षा का विस्तार।
- गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा।
- अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा।
- कौशल विकास।
- शिक्षा में समान अवसर।
- शिक्षा का व्यावसायीकरण रोकना।
- भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्स्थापन।
 
नई शिक्षा नीति 2020 में जिन विषयों पर बल दिया गया है—जैसे बहुविषयक शिक्षा, मातृभाषा, कौशल विकास, भारतीय ज्ञान परंपरा और अनुसंधान—उन पर परिषद लंबे समय से विमर्श करती रही है।
 
 
छात्र राजनीति से आगे का दृष्टिकोण
 
भारत में अधिकांश छात्र संगठन चुनावों तक सीमित रहते हैं, किंतु एबीवीपी स्वयं को केवल चुनावी संगठन नहीं मानती। परिषद छात्रसंघ चुनावों में भाग लेती है, परंतु उसका मूल कार्य छात्र नेतृत्व निर्माण, व्यक्तित्व विकास और सामाजिक दायित्व का विस्तार करना है।
 
 
इसी कारण परिषद वर्षभर अनेक गतिविधियाँ संचालित करती है—
 
- अध्ययन वर्ग
- व्यक्तित्व विकास शिविर
- राष्ट्रीय अधिवेशन
- विचार गोष्ठियाँ
- युवा सम्मेलन
- करियर मार्गदर्शन
- पर्यावरण अभियान
- रक्तदान शिविर
- स्वच्छता अभियान
- पुस्तक संग्रह अभियान
- जनजातीय क्षेत्रों में सेवा कार्य
 
 
राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना
 
एबीवीपी भारत को केवल राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्र मानती है। इसलिए परिषद विद्यार्थियों में राष्ट्रीय प्रतीकों, संविधान, स्वतंत्रता सेनानियों तथा भारतीय सभ्यता के प्रति सम्मान का भाव विकसित करने का प्रयास करती है।
 
 
राष्ट्रीय एकता यात्राएँ, सीमा क्षेत्रों के भ्रमण, उत्तर-पूर्व भारत के विद्यार्थियों के साथ संवाद तथा विभिन्न राज्यों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे कार्यक्रम इसी उद्देश्य से आयोजित किए जाते हैं।
 
 
सामाजिक समरसता
 
परिषद सामाजिक विभाजन को राष्ट्र की प्रगति में बाधा मानती है। इसलिए संगठन सामाजिक समरसता, जनजातीय विकास, ग्रामीण शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा के विस्तार जैसे विषयों पर लगातार कार्य करता रहा है।
 
 
देश के अनेक जनजातीय क्षेत्रों में पुस्तकालय, छात्रावास सहायता, शिक्षा जागरूकता तथा स्वास्थ्य शिविरों में परिषद के कार्यकर्ता सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
 
 
आपदा के समय सेवा
 
एबीवीपी ने अनेक प्राकृतिक आपदाओं और राष्ट्रीय संकटों के दौरान उल्लेखनीय सेवा कार्य किए हैं। उत्तराखंड की आपदा, गुजरात भूकंप, केरल बाढ़, कोविड-19 महामारी सहित अनेक अवसरों पर परिषद के हजारों स्वयंसेवकों ने राहत कार्य, रक्तदान, भोजन वितरण, चिकित्सा सहायता तथा पुनर्वास कार्यक्रमों में भाग लिया।
 
 
कोविड-19 के दौरान परिषद ने विद्यार्थियों, श्रमिकों और जरूरतमंद परिवारों तक भोजन, दवाइयाँ और आवश्यक सामग्री पहुँचाने का व्यापक अभियान चलाया।
 
 
महिला सशक्तीकरण
 
आज परिषद में बड़ी संख्या में छात्राएँ नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं। महिला सुरक्षा, आत्मरक्षा प्रशिक्षण, उच्च शिक्षा में समान अवसर, छात्रावास सुविधाएँ और महिला सम्मान जैसे विषय परिषद की प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
 
 
पर्यावरण संरक्षण
 
जल संरक्षण, वृक्षारोपण, प्लास्टिक मुक्त परिसर, स्वच्छ परिसर अभियान तथा पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से परिषद विद्यार्थियों को प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरित करती है।
 
 
राष्ट्र प्रथम की भावना
 
एबीवीपी का मूल विश्वास है कि किसी भी विद्यार्थी की शिक्षा तभी सार्थक है जब वह समाज और राष्ट्र के हित में उपयोगी सिद्ध हो। इसलिए परिषद प्रत्येक कार्य में "राष्ट्र प्रथम" की भावना को प्रमुख स्थान देती है।
 
 
विकसित भारत 2047 और छात्र शक्ति
 
भारत ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में छात्र शक्ति की भूमिका निर्णायक होगी।
 
 
युवा यदि अनुसंधान, नवाचार, विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, उद्यमिता, कृषि, पर्यावरण और सामाजिक नेतृत्व के क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करें, तो भारत विश्व की अग्रणी शक्ति बन सकता है।
 
 
एबीवीपी इस दिशा में युवाओं को प्रेरित करने के लिए निरंतर कार्य कर रही है।
 
 
आलोचनाएँ और लोकतांत्रिक विमर्श
 
किसी भी बड़े संगठन की तरह एबीवीपी भी समय-समय पर आलोचनाओं और वैचारिक मतभेदों का सामना करती रही है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति, विचारधारात्मक बहस और आंदोलनों के संदर्भ में इसके पक्ष और विपक्ष दोनों प्रकार के मत सामने आते रहे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वाभाविक है कि छात्र संगठनों की कार्यशैली और विचारों पर खुली चर्चा हो। परिषद स्वयं अपने दृष्टिकोण को राष्ट्रहित, शिक्षा सुधार और छात्र कल्याण के आधार पर प्रस्तुत करती है।
 
 
78 वर्षों की उपलब्धियाँ
 
आज एबीवीपी देश के लगभग सभी राज्यों, विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में सक्रिय है। लाखों विद्यार्थी इससे जुड़े हैं। संगठन ने अनेक छात्र नेताओं, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, प्रशासकों और जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व निर्माण में योगदान दिया है।
 
 
संगठन का विस्तार केवल भारत तक सीमित नहीं है; विदेशों में अध्ययनरत भारतीय विद्यार्थियों के साथ संवाद और संपर्क की दिशा में भी समय-समय पर पहल की गई है।
 
 
आज की चुनौतियाँ
 
आज भारतीय विद्यार्थियों के सामने नई चुनौतियाँ हैं—
 
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव।
- डिजिटल व्यसन।
- मानसिक स्वास्थ्य।
- बेरोजगारी।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा।
- सामाजिक मीडिया का दुरुपयोग।
- मूल्य आधारित शिक्षा का अभाव।
 
इन चुनौतियों का समाधान केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, सामाजिक उत्तरदायित्व और नेतृत्व विकास से संभव है।
 
 
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का 78वाँ स्थापना दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि छात्र शक्ति किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होती है। यदि विद्यार्थी ज्ञान को चरित्र से, शिक्षा को सेवा से और नेतृत्व को राष्ट्रहित से जोड़ दें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रह जाता।
 
 
सात दशकों से अधिक की यात्रा में परिषद ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करने वाले केंद्र हैं। भारत जब 2047 के विकसित राष्ट्र के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, तब विद्यार्थियों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
 
 
युवा शक्ति यदि ज्ञान, अनुशासन, सेवा, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व के मार्ग पर आगे बढ़े, तो भारत केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, बौद्धिक और नैतिक नेतृत्व करने वाला विश्व का अग्रणी राष्ट्र भी बन सकता है। यही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना का मूल उद्देश्य था और यही उसके 78 वर्षों की यात्रा का स्थायी संदेश है।