चका नैन नीलांचल वारे: बस्तर से सरगुजा तक रथदूज

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    08-Jul-2026
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चका नैन नीलांचल वारे: बस्तर से सरगुजा तक रथदूज 
 
 
आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता
 
हमारी सांस्कृतिक एकता को समझने के लिए केवल इतिहास के ग्रंथों और राजनीतिक सीमाओं को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उन तीर्थ मार्गों, पर्वों, मेलों और लोक परंपराओं को भी समझना आवश्यक है, जिन्होंने सदियों से विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को एक दूसरे से जोड़ा है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा ऐसी ही एक महान सांस्कृतिक परंपरा है। इसका सबसे विराट स्वरूप ओड़िशा के पुरी में दिखाई देता है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक छाया देश के अनेक क्षेत्रों तक फैली हुई है। छत्तीसगढ़ उन प्रदेशों में है जहाँ भगवान जगन्नाथ की उपासना और रथयात्रा की परंपरा लोकजीवन में गहराई से रची बसी है।
 
 
छत्तीसगढ़ में रथयात्रा को लोकभाषा में रथदूज भी कहा जाता है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रदेश के अनेक नगरों, कस्बों और गाँवों में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की यात्रा निकाली जाती है। कहीं विशाल लकड़ी के रथ नगर के मुख्य मार्गों से गुजरते हैं, कहीं छोटे मंदिरों से भगवान की शोभायात्रा निकलती है और कहीं स्थानीय परंपरा ने जगन्नाथ संस्कृति को इतना आत्मसात कर लिया है कि उसने अपना अलग स्वरूप प्राप्त कर लिया है।
 
 
बस्तर का गोंचा पर्व इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहीं महानदी के किनारे बसे शिवरीनारायण, राजिम और उनसे जुड़े क्षेत्रों की जगन्नाथ परंपरा छत्तीसगढ़ और उत्कल के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों की कहानी कहती है। देवभोग में भगवान को चावल और मूंग अर्पित करने की अनूठी परंपरा है तो सरगुजा में कंसारी समाज की आस्था ने रथयात्रा को स्थापित किया। रायगढ़, कवर्धा और पांडादाह में रियासतकालीन स्मृतियाँ इस यात्रा के साथ जुड़ी हुई हैं।
 
 
इस दृष्टि से छत्तीसगढ़ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है। यह प्रदेश के सांस्कृतिक भूगोल की एक जीवित यात्रा है।
 
 
पुरी और राजिम को जोड़ती लोक आस्था
 
छत्तीसगढ़ में भगवान जगन्नाथ के प्रभाव को एक प्रचलित तीर्थ मान्यता से समझा जा सकता है। लोकमान्यता रही है कि जगन्नाथ पुरी की तीर्थयात्रा के बाद राजिम की यात्रा भी की जानी चाहिए। महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के संगम पर स्थित राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है। प्राचीन परंपरा में इसे पद्म क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है और यहाँ भगवान राजीव लोचन का प्रसिद्ध मंदिर है।
 
 
यह मान्यता केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि दो सांस्कृतिक क्षेत्रों के बीच पुराने संपर्क की ओर भी संकेत करती है। छत्तीसगढ़ की सीमा ओड़िशा से लगी हुई है। दोनों क्षेत्रों के बीच लोगों का आवागमन, व्यापार, तीर्थयात्रा और सांस्कृतिक आदान प्रदान सदियों से होता रहा है। इसका प्रभाव भाषा, खानपान, लोकाचार और पर्वों में स्पष्ट दिखाई देता है।
 
 
रथदूज इसी सांस्कृतिक निकटता का महत्वपूर्ण पर्व है। छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में इस तिथि को अत्यंत शुभ माना जाता रहा है। बेटी की विदाई, बहू को घर लाना, गृह प्रवेश, दुकान का शुभारंभ और अन्य मांगलिक कार्य इस दिन किए जाते रहे हैं। भगवान जगन्नाथ के प्रति लोकमानस की अगाध श्रद्धा ने इस तिथि को सामाजिक जीवन में भी विशेष स्थान दिया।
 
 
महानदी की जगन्नाथ संस्कृति
 
छत्तीसगढ़ में रथयात्रा के प्रसार को देखते हुए महानदी का सांस्कृतिक महत्व भी सामने आता है। महानदी और उससे जुड़े अंचलों में भगवान जगन्नाथ की उपासना के अनेक केंद्र विकसित हुए। शिवरीनारायण, राजिम, गोबरा नवापारा और महासमुंद अंचल की परंपराएँ इसका प्रमाण हैं।
 
 
महानदी केवल जलधारा नहीं रही। प्राचीन समय में नदी घाटियाँ आवागमन और सांस्कृतिक संपर्क के मार्ग भी थीं। महानदी का प्रवाह छत्तीसगढ़ से ओड़िशा की ओर है और इसके साथ दोनों क्षेत्रों के बीच अनेक सांस्कृतिक संबंध विकसित हुए। भगवान जगन्नाथ की उपासना इस व्यापक सांस्कृतिक संबंध का महत्वपूर्ण अध्याय है।
 
 
देवभोग में भगवान को लगान देने की अनूठी परंपरा
 
गरियाबंद जिले का देवभोग भगवान जगन्नाथ की एक विशिष्ट परंपरा के लिए जाना जाता है। यहाँ स्थित जगन्नाथ मंदिर का इतिहास डेढ़ सौ वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार आसपास के चौरासी गाँवों के जनसहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य हुआ और इसे पूरा होने में कई दशक लगे।
 
 
देवभोग की विशेषता भगवान को लगान अर्पित करने की परंपरा है। श्रद्धालु सुगंधित चावल और मूंग अर्पित करते हैं। स्थानीय मान्यता में यहाँ से भगवान के भोग के लिए अन्न पुरी भेजे जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है और इसी से देवभोग नाम को जोड़कर भी देखा जाता है।
 
 
इस परंपरा में कृषि और भक्ति का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। किसान अपनी भूमि से उत्पन्न श्रेष्ठ अन्न को भगवान को समर्पित करता है। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि अन्न, भूमि और ईश्वर के बीच भारतीय समाज द्वारा स्थापित संबंध की अभिव्यक्ति है।
 
 
शिवरीनारायण और नीलमाधव की लोकस्मृति
 
छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ परंपरा में शिवरीनारायण का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह प्राचीन तीर्थ महानदी, शिवनाथ और जोंक नदियों के संगम क्षेत्र के निकट स्थित है। लोक में शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी भी कहा जाता है।
 
 
शिवरीनारायण की लोक परंपराओं में नीलमाधव और भगवान जगन्नाथ से संबंधित अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। स्थानीय विश्वास में भगवान जगन्नाथ के पुरी जाने और शिवरीनारायण के बीच गहरा संबंध माना जाता है। इसी आस्था से माघ पूर्णिमा का विशाल मेला भी जुड़ा हुआ है। लोकमान्यता है कि जो श्रद्धालु पुरी जाकर दर्शन नहीं कर सकते, वे शिवरीनारायण में भगवान का दर्शन कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।
 
 
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को यहाँ रथयात्रा का पर्व उत्साह से मनाया जाता है। आसपास के गाँवों से बड़ी संख्या में लोग भगवान के दर्शन और गजामूंग का प्रसाद ग्रहण करने पहुँचते हैं। धार्मिक आयोजन के साथ यह ग्रामीण समाज का बड़ा सांस्कृतिक मिलन भी बन जाता है।
 
 
बस्तर का गोंचा: जगन्नाथ संस्कृति का अनूठा लोक रूप
 
छत्तीसगढ़ में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का सबसे विशिष्ट स्वरूप बस्तर में दिखाई देता है। यहाँ रथयात्रा को गोंचा पर्व कहा जाता है। परंपरा में इसका आरंभ बस्तर के महाराजा पुरुषोत्तम देव की जगन्नाथ पुरी यात्रा से जोड़ा जाता है।
 
 
गोंचा नाम को गुंडिचा यात्रा के स्थानीय रूप से भी जोड़ा जाता है। समय के साथ पुरी की रथयात्रा परंपरा ने बस्तर की जनजातीय और लोक संस्कृति से संवाद किया और एक अलग सांस्कृतिक स्वरूप विकसित हुआ।
 
 
गोंचा का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण तुपकी है। बाँस से बनाई जाने वाली तुपकी में एक स्थानीय जंगली फल भरकर चलाया जाता है। रथयात्रा के समय तुपकी की आवाज पूरे उत्सव को बस्तर की विशिष्ट पहचान देती है। इसे महाप्रभु के स्वागत से जोड़कर देखा जाता है।
 
 
जगदलपुर के जगन्नाथ मंदिर की एक और विशेषता वहाँ स्थापित अनेक विग्रह हैं। परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के कई जोड़े विग्रह तथा अन्य प्रतिमाएँ यहाँ एक साथ पूजित होती हैं और उत्सव में उनकी सामूहिक भागीदारी होती है।
 
 
गोंचा पर्व का धार्मिक विधान भी विस्तृत है। देव स्नान पूर्णिमा के बाद अनसर की परंपरा, भगवान के अस्वस्थ होने की लोक धारणा, दर्शन का विराम और उसके बाद नेत्रोत्सव के अवसर पर भगवान के पुनः दर्शन की परंपरा इसे पुरी की धार्मिक विधियों से जोड़ती है।
 
 
रायपुर की प्राचीन रथयात्रा
 
रायपुर में भगवान जगन्नाथ की उपासना की पुरानी परंपरा रही है। पुरानी बस्ती का जगन्नाथ मंदिर कभी साहूकार मंदिर के नाम से जाना जाता था। भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा स्थापित होने के बाद मंदिर को नई पहचान मिली। स्थानीय परंपरा इसे लगभग पाँच सौ वर्ष पुराना मानती है।
 
 
यहाँ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाता है। रथयात्रा के अवसर पर गजामूंग का प्रसाद वितरित किया जाता है। पुराने रायपुर की गलियों में निकलने वाली यह यात्रा अनेक पीढ़ियों की स्मृतियों को अपने साथ लेकर चलती है।
 
 
समय के साथ रायपुर के अन्य क्षेत्रों में भी रथयात्रा के आयोजन होने लगे हैं, लेकिन पुरानी बस्ती की यात्रा नगर की ऐतिहासिक धार्मिक परंपराओं की महत्वपूर्ण कड़ी बनी हुई है।
 
 
रायगढ़ की रियासतकालीन रथयात्रा
 
रायगढ़ की रथयात्रा परंपरा को रियासतकालीन इतिहास से जोड़कर देखा जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार रायगढ़ रियासत के महाराजा भूपदेव सिंह ने राजा पारा क्षेत्र में जगन्नाथ मंदिर की स्थापना कर रथोत्सव की परंपरा प्रारंभ की थी।
 
 
इससे जुड़ी लोककथा में राजा की पुरी यात्रा और मनौती का उल्लेख मिलता है। संतान प्राप्ति की कामना पूरी होने के बाद उन्होंने अपनी रियासत में जगन्नाथ मंदिर बनवाया और रथयात्रा आरंभ कराई। इस प्रकार धार्मिक आस्था ने राजपरिवार से नगर समाज तक विस्तार प्राप्त किया और आज भी यह परंपरा रायगढ़ के सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा है।
 
 
दादर खुर्द से कोरबा अंचल तक
 
कोरबा जिले के दादर खुर्द में भी रथयात्रा की पुरानी परंपरा है। स्थानीय स्मृति में इसकी शुरुआत रामभरोस और उनके छोटे भाई झाड़ूराम थवाइत की पुरी यात्राओं से जुड़ी हुई है। पुरी में भगवान जगन्नाथ के प्रति लोगों की आस्था और रथयात्रा के उत्साह को देखकर उनके मन में अपने गाँव में मंदिर निर्माण का विचार आया।
 
 
मंदिर बनने के बाद गाँव में रथयात्रा प्रारंभ हुई और यह परंपरा पीढ़ियों से आगे बढ़ती रही। बाद के समय में बालको, छुरी और दीपका जैसे स्थानों में भी रथयात्रा के आयोजन होने लगे।
 
 
इस प्रसंग की विशेषता यह है कि यहाँ किसी राजा या बड़े संस्थान ने परंपरा प्रारंभ नहीं की, बल्कि सामान्य श्रद्धालुओं की तीर्थयात्रा से प्रेरित होकर एक गाँव में रथयात्रा की नींव पड़ी।
 
 
दुर्ग, आमदी और धमधा की परंपरा
 
दुर्ग शहर में किल्ला मंदिर और आमदी मंदिर की रथयात्राओं का अपना इतिहास है। किल्ला मंदिर से रथयात्रा की परंपरा लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुरानी बताई जाती है, जबकि आमदी के राम मंदिर से बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक से रथयात्रा निकाली जा रही है।
 
 
दुर्ग जिले के धमधा में भी राम मंदिर से रथयात्रा निकालने की परंपरा है। इसमें आसपास के ग्रामीण बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। इन यात्राओं से स्पष्ट होता है कि मध्य छत्तीसगढ़ में भी रथदूज केवल नगरीय आयोजन नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण अंचल के लोगों की सामूहिक आस्था का पर्व बना।
 
  
पांडादाह में कंधों पर भगवान
 
राजनांदगांव जिले के पांडादाह में भगवान जगन्नाथ का रियासतकालीन मंदिर है। यहाँ रथयात्रा उत्सव से जुड़ी एक विशिष्ट परंपरा रही है। भगवान के स्नान और अभिषेक के बाद श्रद्धालु उन्हें अपने कंधों पर विराजमान कर मंदिर प्रांगण की परिक्रमा कराते हैं।
 
 
यह परंपरा लगभग सवा सौ वर्ष से चली आ रही बताई जाती है। भगवान को कंधे पर लेकर चलने का भाव भक्त और भगवान के बीच निकटता का सुंदर उदाहरण है। यहाँ भव्यता की अपेक्षा आत्मीयता अधिक दिखाई देती है।
 
 
कवर्धा का रियासतकालीन जगन्नाथ मंदिर
 
कवर्धा में जगन्नाथ स्वामी मंदिर से रथयात्रा निकाली जाती है। इसे स्थानीय रूप से फुटहा मंदिर भी कहा जाता है। राधाकृष्ण बड़े मंदिर के निकट उजियार सागर के तट पर स्थित यह मंदिर रियासतकालीन स्थापत्य और धार्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर है।
 
 
मंदिर के गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र की काष्ठ प्रतिमाएँ विराजमान हैं। स्थानीय परंपरा में इन प्रतिमाओं को मंदिर के निर्माण काल से स्थापित माना जाता है। मंदिर की सेवा परंपरा भी पीढ़ियों से चली आ रही है और रथयात्रा का पर्व नगर में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
 
 
कांकेर के राजापारा से निकलती यात्रा
 
कांकेर के राजापारा स्थित जगन्नाथ मंदिर से भी भगवान की रथयात्रा निकालने की पुरानी परंपरा है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और पतित पावन के विग्रहों को मंदिर से बाहर लाकर रथ पर विराजमान किया जाता है और नगर भ्रमण कराया जाता है।
 
 
इस यात्रा में कांकेर नगर के साथ आसपास के गाँवों से भी श्रद्धालु पहुँचते हैं। बस्तर के उत्तरी प्रवेश क्षेत्र में स्थित कांकेर की यह परंपरा मध्य छत्तीसगढ़ और बस्तर की जगन्नाथ संस्कृति के बीच एक सांस्कृतिक कड़ी की तरह दिखाई देती है।
 
 
सरगुजा में कंसारी समाज की आस्था
 
उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में भी रथयात्रा की व्यापक परंपरा है। अंबिकापुर के केदारपुर क्षेत्र स्थित जगन्नाथ मंदिर से रथदूज के अवसर पर यात्रा निकाली जाती है।
 
 
स्थानीय परंपरा के अनुसार कंसारी समाज के श्रद्धालु पुरी की यात्रा पर जाते थे। इन्हीं यात्राओं से प्रेरित होकर अंबिकापुर में जगन्नाथ मंदिर की स्थापना और रथयात्रा की शुरुआत हुई। यहाँ नेत्रोत्सव, छेरा पहरा, गुंडिचा यात्रा और बाहुड़ा यात्रा से जुड़े अनुष्ठान भी किए जाते हैं।
 
 
सरगुजा संभाग में कल्याणपुर, सीतापुर, विश्रामपुर, बैकुंठपुर, खजूरी और चिरमिरी जैसे स्थानों में भी रथयात्रा उत्सव की परंपरा रही है। इससे स्पष्ट है कि भगवान जगन्नाथ की उपासना छत्तीसगढ़ के दक्षिणी छोर बस्तर से लेकर उत्तर के सरगुजा तक विस्तृत है।
 
 
धमतरी, राजिम और गोबरा नवापारा
 
धमतरी नगर की रथयात्रा भी शताब्दी से अधिक पुरानी परंपराओं में गिनी जाती है। नगर में भगवान के रथ को खींचने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं।
 
 
राजिम में भी जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा निकाली जाती है। इसके निकट गोबरा नवापारा के राधाकृष्ण मंदिर से निकलने वाली रथयात्रा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने और गजामूंग का प्रसाद ग्रहण करने आते हैं।
 
 
महानदी के इस अंचल में रथयात्रा धार्मिक उत्सव के साथ ग्रामीण समाज का मिलन भी है।
 
 
बिलासपुर की नगर यात्रा
 
बिलासपुर के रेलवे क्षेत्र स्थित जगन्नाथ मंदिर से निकलने वाली रथयात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरती है। मंदिर से प्रारंभ होकर यात्रा रेलवे क्षेत्र, तारबाहर, गांधी चौक और दयालबंद की ओर जाती है तथा निर्धारित स्थल पर भगवान के प्रवास के बाद बाहुड़ा यात्रा के दिन वापस लौटती है।
 
 
रेलवे नगर के विकास के साथ यहाँ विभिन्न क्षेत्रों से आए समुदायों ने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी स्थापित किया। जगन्नाथ मंदिर और रथयात्रा इसी सांस्कृतिक समन्वय का उदाहरण हैं।
 
 
आरंग, चांपा और नरियरा
 
प्राचीन नगरी आरंग के गुप्ता पारा स्थित जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा निकाली जाती है। इसमें आसपास के ग्रामीण बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।
 
 
चांपा के मठ मंदिर और नरियरा के राधाकृष्ण मंदिर में भी रथयात्रा का आयोजन होता है। भगवान के रथ को साफ कर सजाया जाता है और सामूहिक रूप से नगर या गाँव में भ्रमण कराया जाता है।
 
 
जांजगीर चांपा अंचल की इन यात्राओं में स्थानीय मंदिर समितियों और ग्रामीण समाज की सक्रिय भागीदारी दिखाई देती है।
 
 
तुमगांव की जनसहयोग से बनी परंपरा
महासमुंद जिले के तुमगांव की रथयात्रा अपेक्षाकृत नई होते हुए भी स्थानीय समाज की सामूहिकता का सुंदर उदाहरण है। स्थानीय स्मृतियों के अनुसार इसकी शुरुआत वर्ष 1967 में हुई। महिला मंडल को मिली एक छोटी सी राशि से रथ बनवाया गया और प्रारंभ में भगवान जगन्नाथ के चित्र को रथ में रखकर यात्रा निकाली गई।
 
 
बाद में जनसहयोग से जगन्नाथ मंदिर का निर्माण हुआ। पुरी से भगवान की प्रतिमा लाई गई और नए रथ का निर्माण कराया गया। इसके बाद यह आयोजन नियमित परंपरा बन गया।
 
 
तुमगांव की कहानी यह बताती है कि परंपरा केवल विरासत में नहीं मिलती, समाज अपनी श्रद्धा और सामूहिक प्रयास से नई परंपरा भी स्थापित करता है।
 
 
पिथौरा, बसना, सरायपाली और अभनपुर
 
महासमुंद जिले के पिथौरा, बसना और सरायपाली में भी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के आयोजन होते रहे हैं। ओड़िशा से भौगोलिक और सांस्कृतिक निकटता के कारण इस पूरे क्षेत्र में जगन्नाथ संस्कृति का प्रभाव दिखाई देता है।
 
 
रायपुर जिले के अभनपुर में भी राधाकृष्ण मंदिर से रथयात्रा निकालने की परंपरा स्थापित हुई है। स्थानीय स्तर पर आरंभ हुई ऐसी यात्राएँ धीरे धीरे नगर की सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं।
 
 
छत्तीसगढ़ के अनेक अन्य छोटे नगरों और गाँवों में भी स्थानीय मंदिरों और समाज के सहयोग से रथदूज का पर्व मनाया जाता है। इन सभी स्थानों का विस्तृत दस्तावेजीकरण अभी आवश्यक है।
 
 
राजाओं से लोक तक या लोक से राजाओं तक
 
छत्तीसगढ़ की रथयात्रा परंपराओं को देखते हुए एक रोचक प्रश्न सामने आता है। यह परंपरा राजाओं और जमींदारों से लोक तक पहुँची या लोक की आस्था से प्रभावित होकर राजसत्ता ने इसे संरक्षण दिया?
 
 
रायगढ़, कवर्धा, कांकेर और बस्तर की परंपराओं में राजसत्ता की भूमिका दिखाई देती है। दूसरी ओर दादर खुर्द, तुमगांव, अंबिकापुर और अनेक ग्रामीण क्षेत्रों की परंपराओं में सामान्य श्रद्धालुओं, तीर्थयात्रियों और स्थानीय समुदायों की भूमिका प्रमुख दिखाई देती है।
 
 
संभवतः इसका उत्तर किसी एक दिशा में नहीं है। भारतीय समाज में राजधर्म और लोकधर्म निरंतर एक दूसरे को प्रभावित करते रहे हैं। राजा ने मंदिर बनवाया तो जनता ने परंपरा को जीवित रखा। किसी सामान्य तीर्थयात्री ने पुरी से प्रेरणा ली तो पूरा गाँव उसके साथ खड़ा हो गया।
 
 
यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में रथयात्रा राजमहलों के सामने से भी निकली और गाँव की कच्ची गलियों से भी।
 
 
लोकमंगल की यात्रा
 
छत्तीसगढ़ की रथदूज परंपरा की सबसे सुंदर विशेषता उसकी व्यापकता है। देवभोग से शिवरीनारायण तक, राजिम से धमतरी तक, रायगढ़ से सरगुजा तक, कवर्धा से दुर्ग तक और कांकेर से जगदलपुर तक भगवान जगन्नाथ की यात्रा अलग अलग रूपों में दिखाई देती है।
 
 
कहीं राजा की मनौती से मंदिर बना, कहीं दो भाइयों की पुरी यात्रा ने गाँव में परंपरा की नींव रखी। कहीं महिलाओं ने छोटी सी राशि से रथ बनवाया, कहीं किसानों ने सुगंधित चावल और मूंग भगवान को अर्पित किए। कहीं भगवान को कंधे पर लेकर परिक्रमा कराई जाती है और कहीं तुपकी की आवाज से उनका स्वागत होता है। यही विविधता छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ परंपरा की वास्तविक शक्ति है।
 
 
रथदूज के दिन भगवान मंदिर से बाहर आते हैं। भक्त रथ की रस्सी पकड़ते हैं और पूरा समाज यात्रा का सहभागी बन जाता है। इस दिन भगवान और भक्त के बीच मंदिर की दूरी समाप्त हो जाती है। गाँव, नगर, किसान, व्यापारी, शिल्पकार, महिला, पुरुष और बच्चे सभी एक ही उत्सव के सहभागी बनते हैं।
 
 
छत्तीसगढ़ की रथयात्रा परंपरा इस बात का प्रमाण है कि संस्कृति केवल बड़े तीर्थों और विशाल मंदिरों में सुरक्षित नहीं रहती। वह छोटे गाँवों के रथों में भी जीवित रहती है। वह किसी वृद्ध की स्मृति में, किसी परिवार की सेवा परंपरा में, किसी महिला मंडल के सामूहिक प्रयास में और रथ की रस्सी खींचते हजारों हाथों में आगे बढ़ती है।
 
 
महानदी के तट से लेकर बस्तर के वनांचल और सरगुजा के पठार तक फैली भगवान जगन्नाथ की यह लोकयात्रा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रतीक है। रथ के पहिए हर वर्ष कुछ दूर चलते हैं, लेकिन उनके साथ चलने वाली परंपरा सदियों की यात्रा तय करती है। यही रथदूज का वास्तविक सांस्कृतिक अर्थ है और यही भगवान जगन्नाथ की लोकव्यापी महिमा भी।