-डॉ. भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
भारतीय इतिहास में समय-समय पर ऐसे महापुरुषों का जन्म हुआ है जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, विचारों, त्याग और राष्ट्रभक्ति से देश की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित किया। ऐसे महान राष्ट्रनिर्माताओं में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक विलक्षण शिक्षाविद, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, सिद्धांतनिष्ठ जननेता और भारत की एकता एवं अखंडता के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले कर्मयोगी थे। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि यदि किसी व्यक्ति के भीतर राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण हो, तो वह अपने विचारों से आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन कर सकता है।
6 जुलाई, उनकी जयंती, केवल एक जन्मदिन नहीं है, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और अखंड राष्ट्रवाद के पुनर्स्मरण का अवसर है। यह दिन हमें उस महापुरुष के संघर्ष, दूरदृष्टि और बलिदान को याद करने का अवसर देता है जिसने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को भारत माता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक संस्कार
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में एक प्रतिष्ठित एवं विद्वान परिवार में हुआ। उनके पिता आशुतोष मुखर्जी भारतीय शिक्षा जगत के महान स्तंभ माने जाते थे। उन्हें "बंगाल का बाघ" कहा जाता था। उनकी माता जोगमाया देवी धार्मिक और संस्कारित व्यक्तित्व की धनी थीं। परिवार में शिक्षा, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान का वातावरण था। यही कारण था कि बालक श्यामा प्रसाद बचपन से ही असाधारण प्रतिभा, अनुशासन और गंभीर चिंतन के धनी बने।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अत्यंत उत्कृष्ट अंकों से पूर्ण की। अध्ययन के प्रति उनकी लगन इतनी अद्भुत थी कि प्रत्येक परीक्षा में वे सर्वोच्च स्थान प्राप्त करते रहे। उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य, विधि और दर्शन जैसे विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा कम आयु में ही अपनी विद्वता का परिचय दे दिया।
शिक्षा जगत में असाधारण उपलब्धियाँ
डॉ. मुखर्जी की प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उस समय यह विश्वविद्यालय एशिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में गिना जाता था।
उन्होंने विश्वविद्यालय में भारतीय भाषाओं, भारतीय संस्कृति और वैज्ञानिक शिक्षा को समान महत्व देने की नीति अपनाई। उनका विश्वास था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्रवान, राष्ट्रनिष्ठ और उत्तरदायी नागरिक तैयार करना होना चाहिए।
उन्होंने शिक्षा में भारतीय दृष्टिकोण को बढ़ावा देने का प्रयास किया। वे चाहते थे कि भारतीय विद्यार्थी आधुनिक विज्ञान का ज्ञान प्राप्त करें, किंतु अपनी संस्कृति और परंपराओं से कभी विमुख न हों। उनकी यह सोच आज की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनेक सिद्धांतों से मेल खाती दिखाई देती है।
राजनीति में प्रवेश
यद्यपि उनका प्रारंभिक जीवन शिक्षा के क्षेत्र में बीता, किंतु देश की राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में आने के लिए प्रेरित किया। वे मानते थे कि यदि योग्य और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्ति राजनीति से दूर रहेंगे तो देश का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता।
उन्होंने बंगाल की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। उस समय देश सांप्रदायिक तनाव, राजनीतिक अस्थिरता और ब्रिटिश शासन की विभाजनकारी नीतियों से जूझ रहा था। डॉ. मुखर्जी ने सदैव राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
विभाजन का दर्द और राष्ट्रीय दृष्टि
भारत का विभाजन उनके लिए अत्यंत पीड़ादायक घटना थी। वे मानते थे कि विभाजन भारत की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध था। विभाजन के समय बंगाल और पंजाब में लाखों लोगों को विस्थापन और हिंसा का सामना करना पड़ा।
डॉ. मुखर्जी ने विशेष रूप से पूर्वी बंगाल से आए शरणार्थियों की सहायता के लिए अनेक प्रयास किए। उन्होंने संसद और सार्वजनिक मंचों पर उनके अधिकारों की जोरदार वकालत की। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत का पहला दायित्व अपने प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना है।
स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग मंत्री
स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी पहली मंत्रिपरिषद में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया गया।
उन्होंने देश में औद्योगिक विकास, आत्मनिर्भरता और आधुनिक उत्पादन व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनका विश्वास था कि आर्थिक रूप से सशक्त भारत ही राजनीतिक रूप से भी मजबूत बन सकता है।
किन्तु जब उन्हें लगा कि कुछ राष्ट्रीय नीतियाँ देशहित के अनुरूप नहीं हैं, तब उन्होंने पद की अपेक्षा सिद्धांतों को महत्व दिया और मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। भारतीय राजनीति में ऐसा साहस विरले ही देखने को मिलता है।
भारतीय जनसंघ की स्थापना
1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। इसका उद्देश्य केवल चुनाव लड़ना नहीं था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र, सुशासन और राष्ट्रवाद को राजनीतिक आधार प्रदान करना था।
उन्होंने कहा कि राजनीति सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का सर्वोत्तम साधन है। उनके नेतृत्व में जनसंघ धीरे-धीरे एक वैचारिक आंदोलन बन गया। आगे चलकर यही जनसंघ भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ।
एक देश में दो विधान नहीं
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सबसे ऐतिहासिक संघर्ष जम्मू-कश्मीर में लागू विशेष संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध था। उनका मानना था कि यदि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है तो उसके भीतर अलग संविधान, अलग ध्वज और अलग प्रशासनिक व्यवस्था राष्ट्रीय एकता के लिए उचित नहीं हो सकती।
उनका प्रसिद्ध उद्घोष था—
"एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।"
यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि उनके राष्ट्रवादी दर्शन का सार था। वे मानते थे कि राष्ट्रीय एकता किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है।
ऐतिहासिक सत्याग्रह और बलिदान
1953 में उन्होंने बिना परमिट जम्मू-कश्मीर जाने का निर्णय लिया। उनका उद्देश्य किसी प्रकार का संघर्ष उत्पन्न करना नहीं था, बल्कि यह सिद्ध करना था कि भारत का प्रत्येक नागरिक देश के किसी भी भाग में बिना किसी विशेष अनुमति के जा सकता है।
सीमा पार करते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हिरासत के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी और 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया।
उनकी मृत्यु ने पूरे देश को झकझोर दिया। लाखों लोगों ने इसे राष्ट्र के लिए महान क्षति माना। उनका बलिदान भारत की राजनीतिक चेतना में सदैव स्मरणीय रहेगा।
राष्ट्रवाद की उनकी अवधारणा
डॉ. मुखर्जी का राष्ट्रवाद किसी जाति, भाषा या क्षेत्र के विरुद्ध नहीं था। वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जहाँ सभी नागरिक समान अधिकारों के साथ राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानें। उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ था—संविधान का सम्मान, संस्कृति का संरक्षण, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन।
उनका विश्वास था कि भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। यदि सभी भारतीय स्वयं को पहले भारतीय मानें, तो देश की प्रगति को कोई नहीं रोक सकता।
शिक्षा, संस्कृति और समाज
डॉ. मुखर्जी भारतीय संस्कृति को राष्ट्र की आत्मा मानते थे। वे चाहते थे कि शिक्षा ऐसी हो जो विद्यार्थियों में चरित्र, अनुशासन, नैतिकता और राष्ट्रीय चेतना का विकास करे। उन्होंने भारतीय भाषाओं और परंपराओं के संरक्षण पर विशेष बल दिया।
वे आधुनिक विज्ञान और तकनीक के समर्थक थे, लेकिन साथ ही यह भी मानते थे कि विकास का आधार भारतीय जीवन-मूल्य होने चाहिए।
लोकतंत्र के प्रति आस्था
डॉ. मुखर्जी लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष की भूमिका को अत्यंत आवश्यक मानते थे। उनका विचार था कि स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतना ही महत्वपूर्ण रचनात्मक विपक्ष भी होता है। उन्होंने सदैव संसदीय परंपराओं का सम्मान किया और वैचारिक मतभेदों को लोकतांत्रिक ढंग से प्रस्तुत किया।
दूरदर्शी आर्थिक चिंतन
उन्होंने आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना बहुत पहले प्रस्तुत की थी। उनका मानना था कि भारत को कृषि, उद्योग, विज्ञान, तकनीक और स्वदेशी उत्पादन में आत्मनिर्भर बनना चाहिए। वे रोजगार सृजन, ग्रामीण विकास और संतुलित औद्योगिकीकरण के पक्षधर थे।
आज के भारत में प्रासंगिकता
आज जब भारत वैश्विक मंच पर एक उभरती हुई शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचार और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमाओं की रक्षा, सांस्कृतिक गौरव, सुशासन, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता जैसे विषय आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने उनके समय में थे।
उनके जीवन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि राष्ट्रहित के सामने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सिद्धांतों पर अडिग रहना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।
प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व
डॉ. मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, विनम्रता, साहस, संगठन क्षमता, दूरदर्शिता और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत समन्वय था। वे जितने बड़े विद्वान थे, उतने ही सरल और सहज व्यक्ति भी थे। उन्होंने कभी सत्ता को लक्ष्य नहीं बनाया, बल्कि राष्ट्रसेवा को अपना जीवनधर्म माना।
उनका जीवन आज के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वे बताते हैं कि ज्ञान, चरित्र, राष्ट्रभक्ति और सेवा का समन्वय ही महान नेतृत्व का आधार होता है
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय इतिहास के उन अमर राष्ट्रपुरुषों में हैं जिन्होंने अपने जीवन और बलिदान से राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। वे शिक्षा के क्षेत्र के महान सुधारक, राजनीति के सिद्धांतनिष्ठ नेता, भारतीय जनसंघ के संस्थापक, लोकतंत्र के सशक्त प्रहरी और भारत की अखंडता के अमर सेनानी थे।
आज जब हम उनकी जयंती पर उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं, तब यह केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का संकल्प भी होना चाहिए। यदि प्रत्येक भारतीय राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करे, तो वही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता केवल संविधान की धाराओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की राष्ट्रीय चेतना, त्याग और समर्पण से सुरक्षित रहती है। उनका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ बना रहेगा और भारत की राष्ट्रीय चेतना में उनका नाम सदैव अमर रहेगा।