-डॉ. भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
"जब कोई महान कलाकार इस संसार से विदा होता है, तब केवल एक व्यक्ति नहीं जाता, बल्कि उसके साथ एक युग, एक परंपरा और एक जीवंत संस्कृति का एक अध्याय भी इतिहास बन जाता है।"
भारतीय लोक संस्कृति की आत्मा को स्वर देने वाली, महाभारत की कथाओं को अपनी अद्भुत गायन शैली, अभिनय और भावाभिव्यक्ति से जन-जन तक पहुँचाने वाली, पांडवनी की अमर साधिका तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनके निधन के साथ भारतीय लोककला के आकाश का एक ऐसा सूर्य अस्त हो गया, जिसकी आभा केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं थी, बल्कि पूरे भारत और विश्व में भारतीय लोक संस्कृति का परिचय बन चुकी थी।
उनका जाना केवल एक प्रसिद्ध लोकगायिका का निधन नहीं है। यह भारतीय लोक परंपरा की उस जीवंत धारा का मौन हो जाना है, जिसने सदियों से हमारी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा। आज ऐसा प्रतीत होता है मानो महाभारत की वे अमर कथाएँ, जो उनके स्वर में जीवंत हो उठती थीं, स्वयं शोक में डूब गई हों।
तीजन बाई का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि महानता कभी साधनों से नहीं, बल्कि साधना से प्राप्त होती है। अत्यंत साधारण परिवार में जन्मी इस लोक कलाकार ने अपनी प्रतिभा, अथक परिश्रम, अदम्य आत्मविश्वास और अटूट सांस्कृतिक निष्ठा के बल पर वह ऊँचाई प्राप्त की, जहाँ पहुँचना किसी भी कलाकार का स्वप्न होता है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि यदि कला के प्रति समर्पण सच्चा हो तो मिट्टी की खुशबू विश्व के सबसे बड़े मंचों तक पहुँच सकती है।
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की धरती पर जन्मी तीजन बाई बचपन से ही लोकगीतों और महाभारत की कथाओं के बीच पली-बढ़ीं। उनके परिवार में पांडवनी सुनने और सुनाने की परंपरा थी। बाल्यावस्था में ही उन्होंने अपने नाना से महाभारत की कथाएँ सुनीं और उन्हें गाना प्रारंभ कर दिया। उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यही बालिका एक दिन भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान बन जाएगी।
उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। आर्थिक अभाव, सामाजिक उपेक्षा और परंपरागत रूढ़ियाँ उनके मार्ग में बार-बार बाधा बनकर खड़ी हुईं। उस समय पांडवनी की ऊर्जावान कपालिक शैली में प्रस्तुति देना पुरुषों का अधिकार माना जाता था। महिलाओं को केवल सीमित शैली में गायन की अनुमति थी। लेकिन तीजन बाई ने समाज की इस सोच को स्वीकार करने के बजाय उसे बदलने का साहस किया। उन्होंने पुरुषों की शैली में पांडवनी प्रस्तुत कर यह सिद्ध किया कि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता।
इस साहस का उन्हें भारी मूल्य भी चुकाना पड़ा। समाज के एक वर्ग ने उनका विरोध किया, उन्हें बहिष्कृत किया गया, अपमानित किया गया और अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। किंतु उन्होंने अपने संकल्प को कभी नहीं छोड़ा। वे जानती थीं कि यदि कला सत्य है तो अंततः समाज को उसे स्वीकार करना ही होगा। समय ने यही सिद्ध किया। जिन्होंने कभी उन्हें अस्वीकार किया था, वही बाद में उनकी प्रतिभा के सामने नतमस्तक हुए।
पांडवनी केवल गायन नहीं है। यह भारत की महान महाकाव्य परंपरा का लोक रूप है। इसमें महाभारत की कथाओं को संगीत, अभिनय, संवाद, नाटकीय प्रस्तुति और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इस कला में कलाकार अकेला होते हुए भी अनेक पात्रों का अभिनय करता है। तीजन बाई इस कला की अद्वितीय साधिका थीं। उनके हाथ में तंबूरा केवल एक वाद्य नहीं होता था, बल्कि वह कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी दुर्योधन का अभिमान और कभी श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र। यही उनकी प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता थी।
जब वे मंच पर आती थीं तो ऐसा लगता था मानो स्वयं महाभारत जीवित हो उठी हो। उनके स्वर में करुणा भी थी, वीरता भी थी, क्रोध भी था और करुण रस की गहराई भी। दर्शक केवल गीत नहीं सुनते थे, बल्कि पूरी कथा को अपनी आँखों के सामने घटित होते हुए अनुभव करते थे। यही कारण था कि अशिक्षित ग्रामीण से लेकर विद्वान साहित्यकार तक सभी उनके समान रूप से प्रशंसक थे।
उन्होंने पाँच दशकों से अधिक समय तक निरंतर पांडवनी की साधना की। देश के छोटे-छोटे गाँवों से लेकर महानगरों तक और भारत से लेकर विश्व के अनेक देशों तक उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया। जहाँ-जहाँ वे गईं, वहाँ भारतीय लोक संस्कृति के प्रति सम्मान और जिज्ञासा बढ़ी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भारतीय लोककलाएँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय सभ्यता, दर्शन, नैतिकता और जीवन मूल्यों की जीवित धरोहर हैं।
विदेशों में जब उन्होंने महाभारत की कथाओं को अपने स्वर में प्रस्तुत किया तो भाषा अलग होने के बावजूद दर्शक उनके अभिनय और भावों से इतने प्रभावित हुए कि अनेक बार पूरा सभागार खड़े होकर उनका अभिनंदन करता था। यह किसी एक कलाकार की सफलता नहीं थी, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति की वैश्विक प्रतिष्ठा थी।
तीजन बाई ने कभी आधुनिकता का विरोध नहीं किया, लेकिन उन्होंने अपनी जड़ों को भी नहीं छोड़ा। वे मानती थीं कि आधुनिक बनने का अर्थ अपनी संस्कृति को भूल जाना नहीं है। उनका जीवन आज की युवा पीढ़ी के लिए यह संदेश देता है कि वैश्विक पहचान उसी को मिलती है, जो अपनी स्थानीय पहचान को सम्मान देता है।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहजता थी। इतनी बड़ी ख्याति प्राप्त करने के बाद भी उनमें अहंकार का लेशमात्र नहीं था। वे स्वयं को सदैव लोक कलाकार ही कहती थीं। गाँव की मिट्टी, लोकभाषा, लोकगीत और लोकजीवन उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग थे। यही कारण था कि वे करोड़ों लोगों के हृदय से जुड़ी रहीं।
भारत सरकार ने उनके अनुपम योगदान का सम्मान करते हुए उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और अंततः देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से अलंकृत किया। संगीत नाटक अकादमी सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया। किंतु उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान जनता का प्रेम था। वे अक्सर कहती थीं कि यदि लोगों के हृदय में स्थान मिल जाए तो उससे बड़ा कोई पुरस्कार नहीं हो सकता।
आज जब अनेक लोककलाएँ धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं, तब तीजन बाई का जीवन हमें चेतावनी भी देता है। यदि हमने अपनी लोक परंपराओं, लोक भाषाओं और लोक कलाकारों का संरक्षण नहीं किया तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल पुस्तकों में इनका नाम पढ़ेंगी। संस्कृति केवल स्मारकों में नहीं बसती, बल्कि कलाकारों के कंठ, समाज की स्मृति और लोकजीवन की परंपराओं में जीवित रहती है।
उनके निधन पर पूरे देश ने शोक व्यक्त किया। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं, साहित्यकारों, कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका जाना भारतीय संस्कृति की अपूरणीय क्षति है। यह केवल औपचारिक संवेदना नहीं थी, बल्कि उस कलाकार के प्रति राष्ट्र का सम्मान था जिसने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण भारतीय संस्कृति को समर्पित कर दिया।
तीजन बाई का जीवन भारतीय नारी शक्ति का भी अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि महिला संकल्प कर ले तो वह समाज की सबसे कठोर परंपराओं को भी बदल सकती है। उन्होंने किसी आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया, कोई भाषण नहीं दिया, बल्कि अपनी कला के माध्यम से समाज की सोच बदल दी। यही किसी भी सच्चे परिवर्तन की सबसे बड़ी पहचान होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि उनकी स्मृति को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित न रखा जाए। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पांडवनी जैसी लोककलाओं का अध्ययन बढ़ाया जाए। नई पीढ़ी को इस महान परंपरा से जोड़ा जाए। लोक कलाकारों को सम्मानजनक जीवन, प्रशिक्षण और मंच उपलब्ध कराए जाएँ। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में अनेक तीजन बाई हमारे बीच जन्म लेने से पहले ही गुमनाम हो जाएँगी।
संस्कृति किसी राष्ट्र की आत्मा होती है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और आर्थिक विकास किसी देश को शक्तिशाली बना सकते हैं, लेकिन उसकी पहचान उसकी संस्कृति से ही बनती है। तीजन बाई जैसी विभूतियाँ उस सांस्कृतिक आत्मा की जीवित प्रतीक थीं। उन्होंने हमें सिखाया कि अपनी मिट्टी से जुड़े रहकर भी विश्व का सम्मान प्राप्त किया जा सकता है।
आज उनका शरीर हमारे बीच नहीं है, किंतु उनका स्वर अमर है। जब भी कोई कलाकार पांडवनी गाएगा, जब भी महाभारत की लोकगाथा गूँजेगी, जब भी छत्तीसगढ़ की धरती पर तंबूरे की ध्वनि सुनाई देगी, तब-तब तीजन बाई की स्मृति सजीव हो उठेगी। वे अपने गीतों, अपने संघर्ष, अपनी साधना और अपनी सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से सदैव जीवित रहेंगी।
उनका जीवन हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा कलाकार कभी मरता नहीं। वह अपनी कला में जीवित रहता है। उसके स्वर समय की सीमाओं को पार कर पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों के हृदय तक पहुँचते रहते हैं। तीजन बाई भी उसी अमर परंपरा की प्रतिनिधि हैं।
आज जब हम उन्हें अंतिम प्रणाम कर रहे हैं, तब यह संकल्प भी लेना होगा कि उनकी विरासत को जीवित रखेंगे। लोककलाओं का संरक्षण करेंगे, लोक कलाकारों का सम्मान करेंगे और भारतीय संस्कृति की उस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँगे, जिसके लिए तीजन बाई ने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
वास्तव में, तीजन बाई का निधन केवल एक महान लोकगायिका की मृत्यु नहीं है; यह भारतीय लोक संस्कृति के एक स्वर्णिम युग का अवसान है। किंतु उनका जीवन, उनका संघर्ष, उनका स्वर और उनकी साधना सदैव अमर रहेंगे। भारतीय संस्कृति जब-जब अपने गौरवशाली इतिहास का स्मरण करेगी, तब-तब पांडवनी की यह अमर साधिका श्रद्धा और सम्मान के साथ याद की जाती रहेगी। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।