डॉ भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
आज भी जब भारत की पावन धरती पर सूर्य की प्रथम किरण हिमालय की चोटियों को आलोकित करती है, जब गंगा की निर्मल धारा अनादि काल से चली आ रही सनातन संस्कृति का संदेश गुनगुनाती है, जब मंदिरों की घंटियों और वेद मंत्रों की ध्वनि वातावरण को दिव्यता से भर देती है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो एक ओजस्वी स्वर आज भी भारत की आत्मा को पुकार रहा हो—
"उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।"
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि भारत के नवजागरण का उद्घोष है। यह उस युगपुरुष की वाणी है जिसने सोई हुई राष्ट्रीय चेतना को जगाया, आत्मविश्वास खो चुके समाज को उसकी शक्ति का बोध कराया और विश्व के समक्ष सनातन धर्म की सार्वभौमिकता का ऐसा परिचय दिया कि पूरी मानवता भारत की आध्यात्मिक विरासत के सामने नतमस्तक हो गई। वह युगद्रष्टा थे स्वामी विवेकानंद।
4 जुलाई केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जब वर्ष 1902 में बेलूर मठ की पावन भूमि पर स्वामी विवेकानंद ने योगबल से महा-समाधि ग्रहण कर अपने नश्वर शरीर का त्याग किया। मात्र 39 वर्ष का जीवन—किन्तु ऐसा जीवन, जिसने सहस्राब्दियों तक भारत और विश्व का मार्ग प्रकाशित करने वाली विचार-ज्योति प्रज्वलित कर दी। उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ, परंतु उनके विचार कालजयी बनकर प्रत्येक पीढ़ी के पथप्रदर्शक बन गए।
स्वामी विवेकानंद का जीवन केवल एक संन्यासी का जीवन नहीं था; वह भारत की आत्मा का पुनर्जागरण था। जब भारत दासता, हीनभावना और सामाजिक जड़ता से संघर्ष कर रहा था, तब उन्होंने प्रत्येक भारतीय को उसकी वास्तविक पहचान कराई। उन्होंने कहा कि भारत कभी निर्धन नहीं था, भारत कभी दुर्बल नहीं था; भारत की सबसे बड़ी संपत्ति उसका अध्यात्म, उसका ज्ञान और उसकी सनातन संस्कृति है। यदि भारतीय अपने आत्मस्वरूप को पहचान लें, तो कोई भी शक्ति उन्हें पराजित नहीं कर सकती।
उन्होंने सनातन धर्म को संकीर्ण धार्मिक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के शाश्वत सत्य के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार सनातन का अर्थ है—जो अनादि है, अनंत है और जो प्रत्येक युग में मानवता का मार्गदर्शन करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन धर्म किसी एक पैगंबर, किसी एक पुस्तक या किसी एक मत तक सीमित नहीं है। यह अनुभव का धर्म है, सत्य की खोज का धर्म है, सहिष्णुता का धर्म है और समस्त मानव जाति को एक परिवार मानने का दर्शन है।
विश्व धर्म सम्मेलन में उनका ऐतिहासिक संबोधन केवल भारत की विजय नहीं था, बल्कि यह उस सनातन दृष्टि की विजय थी जो कहती है कि सभी मार्ग अंततः उसी परम सत्य तक पहुँचते हैं। उन्होंने विश्व को बताया कि भारत ने कभी किसी धर्म का विरोध नहीं किया, बल्कि सभी मतों का सम्मान किया है। यही सनातन की सबसे बड़ी विशेषता है—विविधता में एकता, मतभेद में सम्मान और भिन्नता में समरसता।
स्वामी विवेकानंद ने ईश्वर की ऐसी व्याख्या की जो आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि ईश्वर किसी मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या किसी विशेष स्थान में सीमित नहीं है। ईश्वर प्रत्येक जीव में विद्यमान है। जिस गरीब, पीड़ित, वंचित और असहाय व्यक्ति की सेवा की जाती है, वहीं ईश्वर की सच्ची पूजा होती है। उनका प्रसिद्ध विचार—"दरिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर की सेवा है"—मानवता को धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाता है।
उनके अनुसार ईश्वर सत्य है, प्रेम है, करुणा है, चेतना है, ज्ञान है और प्रत्येक आत्मा में विद्यमान दिव्य शक्ति है। मनुष्य का उद्देश्य बाहर ईश्वर को खोजने का नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित उस दिव्यता को पहचानने का है। वे कहते थे कि प्रत्येक आत्मा संभावित रूप से दिव्य है और जीवन का लक्ष्य उस दिव्यता को प्रकट करना है।
स्वामी विवेकानंद ने धर्म और विज्ञान को विरोधी नहीं, बल्कि पूरक माना। उनका विश्वास था कि जहाँ विज्ञान बाहरी जगत की खोज करता है, वहीं अध्यात्म मनुष्य के आंतरिक जगत का अन्वेषण करता है। उन्होंने कहा कि धर्म तर्क का विरोध नहीं करता, बल्कि सत्य की खोज के लिए विवेक का उपयोग करना सिखाता है। इसी कारण उनके विचार आधुनिक वैज्ञानिक समाज में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने एक शताब्दी पूर्व थे।
उन्होंने शिक्षा की नई परिभाषा दी। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना या रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी हुई अनंत शक्तियों का विकास करना है। शिक्षा वह है जो चरित्र का निर्माण करे, आत्मविश्वास जगाए, राष्ट्रभक्ति उत्पन्न करे और मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाए। उन्होंने कहा कि चरित्रवान व्यक्ति ही महान राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।
युवाओं के प्रति उनका विश्वास अद्वितीय था। वे कहते थे कि यदि उन्हें सौ ऊर्जावान, चरित्रवान और राष्ट्रभक्त युवा मिल जाएँ, तो वे पूरे भारत का स्वरूप बदल सकते हैं। उन्होंने युवाओं को निर्भीक बनने, परिश्रम करने, आत्मबल विकसित करने और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा दी। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि युवा शक्ति यदि सही दिशा में चले तो इतिहास बदल सकती है।
स्वामी विवेकानंद ने भारत की आध्यात्मिक शक्ति को विश्व के सामने स्थापित किया। उन्होंने कहा कि भारत का भविष्य केवल आर्थिक समृद्धि में नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व में निहित है। भारत तभी विश्वगुरु बनेगा जब वह अपने सनातन मूल्यों—सत्य, सेवा, त्याग, करुणा, सहिष्णुता और आत्मसंयम—को जीवन में उतारेगा।
आज का विश्व तकनीकी उन्नति के बावजूद मानसिक तनाव, हिंसा, उपभोक्तावाद, पर्यावरण संकट और नैतिक पतन जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। वे हमें सिखाते हैं कि विज्ञान आवश्यक है, परंतु विज्ञान के साथ विवेक भी आवश्यक है; समृद्धि आवश्यक है, परंतु उसके साथ संवेदना भी आवश्यक है; शक्ति आवश्यक है, परंतु उसके साथ चरित्र भी अनिवार्य है।
आज भारत का युवा स्टार्टअप, विज्ञान, तकनीक, खेल, शिक्षा और वैश्विक नेतृत्व के नए आयाम स्थापित कर रहा है। यदि इस ऊर्जा के साथ स्वामी विवेकानंद का आत्मबल, राष्ट्रभाव और आध्यात्मिक दृष्टि जुड़ जाए, तो भारत केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक महाशक्ति भी बन सकता है।
स्वामी विवेकानंद किसी एक संगठन, संप्रदाय या विचारधारा के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के प्रेरणास्रोत हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म मानव सेवा है, सबसे बड़ी पूजा कर्म है, सबसे बड़ी शक्ति आत्मविश्वास है और सबसे बड़ी साधना राष्ट्र एवं मानवता के लिए समर्पित जीवन है।
आज, उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि केवल पुष्प अर्पित करने से नहीं, बल्कि उनके संदेश को जीवन में उतारने से होगी। जब तक भारत का कोई युवा आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहेगा, जब तक कोई मनुष्य निःस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करता रहेगा, जब तक सत्य, सेवा और सनातन के आदर्श जीवित रहेंगे—तब तक स्वामी विवेकानंद केवल इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि भारत की आत्मा में अमर रहेंगे।