सरदार ऊधम सिंह : प्रतिशोध नहीं, न्याय का अमर संकल्प

बलिदान दिवस (31 जुलाई) पर विशेष

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    31-Jul-2026
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udham singh
 
 
डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं चिंतक
 
 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक आंदोलनों का इतिहास नहीं है, बल्कि वह उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों के अदम्य साहस, बलिदान और राष्ट्रभक्ति का अमर आख्यान है, जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। ऐसे ही अमर क्रांतिकारियों में सरदार ऊधम सिंह का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविल जेल में फाँसी के फंदे पर झूलते हुए उन्होंने संसार को यह संदेश दिया कि अन्याय चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, न्याय के लिए समर्पित एक दृढ़ संकल्प अंततः इतिहास रच देता है।
 
 
सरदार ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम में हुआ। उनका बचपन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। माता-पिता का साया शीघ्र ही उठ गया और वे अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में पले-बढ़े। विपरीत परिस्थितियों ने उन्हें कमजोर नहीं बनाया, बल्कि उनके भीतर आत्मबल, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम की भावना को और अधिक प्रबल किया।
 
 
13 अप्रैल 1919 का दिन भारतीय इतिहास का सबसे हृदयविदारक दिन माना जाता है। बैसाखी के पावन पर्व पर हजारों लोग अमृतसर के जलियाँवाला बाग में शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्रित हुए थे। तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ बरसा दी गईं। इस अमानवीय नरसंहार में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। उस समय युवा ऊधम सिंह भी वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने रक्त से सनी धरती, कराहते हुए घायल लोगों और निर्दोष महिलाओं-बच्चों का दर्द अपनी आँखों से देखा। यह दृश्य उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गया। उन्होंने उसी क्षण संकल्प लिया कि इस क्रूर अत्याचार के दोषियों को न्याय अवश्य मिलेगा।
 
 
यह संकल्प किसी क्षणिक आवेश का परिणाम नहीं था। अगले इक्कीस वर्षों तक उन्होंने धैर्य, साहस और अद्भुत संयम के साथ अपने उद्देश्य को जीवित रखा। वे भारत से बाहर निकले, अनेक देशों की यात्राएँ कीं, क्रांतिकारी साथियों से संपर्क स्थापित किया और अंग्रेजी शासन की गतिविधियों का अध्ययन किया। उनके लिए यह केवल प्रतिशोध का विषय नहीं था, बल्कि उन हजारों निर्दोष भारतीयों के सम्मान और न्याय की लड़ाई थी, जिनका रक्त जलियाँवाला बाग की मिट्टी में समाया हुआ था।
 
 
13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में आयोजित एक सार्वजनिक सभा के दौरान उन्होंने पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'ड्वायर को गोली मार दी। ओ'ड्वायर को जलियाँवाला बाग हत्याकांड के लिए राजनीतिक रूप से जिम्मेदार माना जाता था। इस घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की स्वतंत्रता की ओर आकर्षित किया। अंग्रेजी साम्राज्य ने इसे अपराध कहा, लेकिन भारतवासियों ने इसे न्याय की पुकार के रूप में देखा।
 
 
गिरफ्तारी के बाद भी ऊधम सिंह तनिक विचलित नहीं हुए। उन्होंने अदालत में निर्भीकता से कहा कि उन्होंने यह कार्य अपने देशवासियों पर हुए अत्याचार का प्रतिकार करने के लिए किया है। उन्होंने मृत्यु से भयभीत होने के बजाय उसे राष्ट्रधर्म का गौरवपूर्ण अवसर माना। उनका यह साहस आज भी भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
 
 
उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था—"राम मोहम्मद सिंह आज़ाद" नाम धारण करना। इस एक नाम में भारत की सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय समरसता का अद्भुत संदेश निहित था। "राम" भारत की सनातन परंपरा का प्रतीक है, "मोहम्मद" इस्लामी विरासत का और "सिंह" सिख परंपरा का। "आज़ाद" शब्द उन सभी भारतीयों की साझा आकांक्षा का प्रतीक था, जो विदेशी दासता से मुक्ति चाहते थे। यह नाम बताता है कि भारत की स्वतंत्रता किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र की लड़ाई थी।
 
 
31 जुलाई 1940 को पेंटनविल जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई। कहा जाता है कि वे अंतिम क्षण तक शांत, निर्भीक और दृढ़ रहे। उनका शरीर भले ही समाप्त हो गया, किंतु उनका संकल्प अमर हो गया। वर्ष 1974 में उनके पार्थिव अवशेष भारत लाए गए और पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। यह स्वतंत्र भारत की ओर से अपने अमर क्रांतिकारी के प्रति कृतज्ञ श्रद्धांजलि थी।
 
 
सरदार ऊधम सिंह का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेम केवल भावनाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके लिए त्याग, अनुशासन, धैर्य और समर्पण की आवश्यकता होती है। उन्होंने व्यक्तिगत सुख, परिवार और जीवन की परवाह किए बिना राष्ट्र के सम्मान को सर्वोपरि रखा। यही कारण है कि उनका बलिदान समय के साथ और अधिक प्रेरणादायक होता गया है।
 
 
आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब ऊधम सिंह के आदर्श और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। भ्रष्टाचार, सामाजिक विभाजन, हिंसा, स्वार्थ और नैतिक पतन जैसी चुनौतियों के बीच उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्र का निर्माण केवल सरकारें नहीं करतीं, बल्कि चरित्रवान नागरिक करते हैं। यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करे, तो यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
 
 
भारत का युवा वर्ग यदि ऊधम सिंह के जीवन से प्रेरणा लेकर सत्य, परिश्रम, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक समरसता को अपने जीवन का आधार बनाए, तो भारत विश्व में नैतिक नेतृत्व स्थापित कर सकता है। आज आवश्यकता हथियार उठाने की नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, नवाचार, सेवा, ईमानदारी और उत्कृष्ट चरित्र के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त बनाने की है। यही आधुनिक भारत में राष्ट्रसेवा का सर्वोत्तम मार्ग है।
 
 
युवाओं के नाम संदेश
प्रिय युवा साथियो,
सरदार ऊधम सिंह का बलिदान हमें यह स्मरण कराता है कि इतिहास उन्हीं का सम्मान करता है जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हैं। आज आपका संघर्ष शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार, सामाजिक सेवा, ईमानदारी और राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण का होना चाहिए। अपने ज्ञान, प्रतिभा और परिश्रम को भारत की उन्नति के लिए समर्पित कीजिए। देशभक्ति केवल भावनात्मक उद्घोष नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन है। आइए, उनके बलिदान दिवस पर हम यह संकल्प लें कि एक सशक्त, समरस, आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँगे।