-डॉ नुपूर निखिल देशकर
आज भारत की युवा पीढ़ी अभूतपूर्व परिवर्तन के समय से गुजर रही है। वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और डिजिटल संस्कृति ने उसे अभिव्यक्ति के अनेक मंच दिए हैं। सोशल मीडिया, स्टैंड-अप कॉमेडी, पॉडकास्ट और ओटीटी जैसे माध्यमों ने रचनात्मकता के नए अवसर खोले हैं, किन्तु इनके साथ यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सामाजिक मर्यादा, मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों की उपेक्षा हो रही है?
उपभोक्तावाद और वैश्वीकरण ने मनोरंजन को भी एक बाज़ार बना दिया है, जहाँ अधिक से अधिक ध्यान आकर्षित करने के लिए कई बार चौंकाने वाली या विवादास्पद भाषा का प्रयोग किया जाता है। वायरल होने की संस्कृति ने कुछ युवाओं को यह विश्वास दिलाया है कि जितना अधिक विवाद, उतनी अधिक लोकप्रियता।
डिजिटल संस्कृति ने इस प्रवृत्ति को और तेज़ किया है। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म अक्सर ऐसी सामग्री को अधिक प्रसारित करते हैं जो तीखी, विवादास्पद या भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करे। परिणामस्वरूप, संयमित और विचारपूर्ण संवाद की अपेक्षा उत्तेजक अभिव्यक्ति को अधिक प्रोत्साहन मिलता दिखाई देता है।
इसी संदर्भ में हाल के समय में कुछ विवाद सामने आए। उदाहरण के लिए, दंत चिकित्सक मुस्कान सोनी द्वारा केतन को लेकर की गई कथित अभद्र टिप्पणी मुंबई की एमबीबीएस की छात्रा सेजल पवार द्वारा स्टैंड-अप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के कार्यक्रम में शरीरदान करने वाले व्यक्तियों के शवों के विशेष अंगों पर की गई कथित टिप्पणी ने सार्वजनिक चर्चा को जन्म दिया।
प्रणीत मोरे और हिमांशु जांगड़ा से जुड़ा "370 की बिरयानी" विषयक संवाद भी सोशल मीडिया पर व्यापक विवाद का कारण बना। इन घटनाओं को कई लोगों ने हास्य की सीमा, पेशेवर नैतिकता और सामाजिक संवेदनशीलता के संदर्भ में देखा। एक और समाज की बेटियां अपने जीवन के प्रमुख निर्णय पर अपने माता-पिता से खुलकर बात करने का समर्थ नहीं झूठ पाती और आपराधिक घटनाओं के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति करती है वहीं दूसरी ओर उपरोक्त शिक्षित युवाओं की स्वच्छंद अभिव्यक्ति........?
इन उदाहरणों के माध्यम से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं
क्या हास्य का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है या उसमें सामाजिक उत्तरदायित्व भी निहित है?
क्या चिकित्सा जैसे सेवा-प्रधान व्यवसाय से जुड़े व्यक्तियों से अधिक संवेदनशील भाषा और आचरण की अपेक्षा उचित है?
क्या डिजिटल प्रसिद्धि की होड़ युवाओं को सामाजिक मर्यादा से दूर ले जा रही है?
क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन आवश्यक है?
भारतीय जीवन-मूल्यों की दृष्टि से वाणी को विशेष महत्व दिया गया है।
मनुस्मृति के श्लोक "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्" का संदेश सत्य के साथ-साथ मर्यादित और हितकारी वाणी पर बल देता है। इसी प्रकार "मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव" जैसी शिक्षाएँ केवल परिवार का सम्मान नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के प्रति संवेदनशील व्यवहार की प्रेरणा देती हैं।
अतः समकालीन भारत में यह अध्ययन अत्यंत प्रासंगिक है कि डिजिटल संस्कृति, उपभोक्तावाद और वैश्वीकरण ने युवा पीढ़ी की भाषा, हास्य-बोध, सामाजिक उत्तरदायित्व और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति दृष्टिकोण को किस प्रकार प्रभावित किया है। साथ ही, यह भी विचारणीय है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा—दोनों का संतुलन किस प्रकार बनाए रखा जा सकता है।
संवैधानिक संदर्भ-
भारतीय संविधान अनुच्छेद 19(1)(क) — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार।
अनुच्छेद 19(2) — यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है; सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार, मानहानि आदि के आधार पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
स्टैंड-अप कॉमेडी और सामाजिक उत्तरदायित्व
हाल के वर्षों में स्टैंड-अप कॉमेडी में अभिव्यक्ति की सीमा, धार्मिक एवं सामाजिक संवेदनशीलता तथा डिजिटल माध्यमों पर सामग्री की जिम्मेदारी को लेकर व्यापक बहस हुई है।
प्रणीत मोरे–हिमांशु जांगड़ा "₹370 बिरयानी" विवाद
वायरल वीडियो के बाद व्यापक आलोचना हुई।
इस प्रकरण में कानूनी कार्रवाई भी हुई।
एमबीबीएस छात्रा सेजल पवार विवाद
वायरल क्लिप में शवदान (Cadaver Donation) से जुड़े विषय पर कथित अभद्र टिप्पणी के बाद चिकित्सा नैतिकता और मृत शरीर के सम्मान पर व्यापक चर्चा हुई।
The Culture Industry: Enlightenment as Mass Deception
Amusing Ourselves to Death
The Coddling of the American Mind
The Anxious Generation