संघ ने भगवा ध्वज को ही गुरु क्यों माना?

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    29-Jul-2026
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रोहन गिरि 
शोधार्थी 
 
 
गुरु पूर्णिमा का पर्व भारतीय परंपरा का एक अद्भुत उत्सव है। यह केवल किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का अवसर नहीं, अपितु उस ज्ञान, प्रेरणा और मार्गदर्शन को नमन करने का दिन है जो मनुष्य के जीवन को ऊँचाई प्रदान करता है।
 
 
भारतीय परंपरा में गुरु को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला माना गया है। इसलिए यहाँ गुरु का आशय केवल शिक्षक से नहीं है, जीवन को दिशा देने वाल से है।
 
 
जब गुरु की चर्चा होती है, तब सामान्यतः हमारे मन में किसी महापुरुष, संत या आचार्य का स्वरूप उभरता है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के समय एक अलग मार्ग चुना। संघ ने भगवा ध्वज को गुरु का स्थान दिया।
 
 
पहली दृष्टि में यह निर्णय असामान्य प्रतीत हो सकता है, किंतु इसके पीछे गहन चिंतन और व्यापक दृष्टि निहित है।
 
 
व्यक्ति कितना ही महान क्यों न हो, वह समय की सीमाओं से बंधा होता है। उसका जीवन एक निश्चित अवधि तक रहता है। उसके गुण प्रेरणा देते हैं, किंतु उसके व्यक्तित्व के साथ अनेक मानवीय सीमाएँ भी जुड़ी होती हैं। दूसरी ओर आदर्श कालातीत होते हैं। वे पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों का मार्गदर्शन करते रहते हैं। संघ ने अपने लिए ऐसे ही शाश्वत आदर्श को गुरु के रूप में स्वीकार किया।
 
 
भगवा ध्वज भारतीय संस्कृति की दीर्घ साधना का प्रतीक है। यह रंग हमें उन ऋषियों की स्मृति से जोड़ता है जिन्होंने ज्ञान के लिए अपना जीवन समर्पित किया। यह उन संतों का स्मरण कराता है जिन्होंने समाज जागरण का कार्य किया। यह उन वीरों की गाथा सुनाता है जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। त्याग, तप, सेवा, समर्पण और आत्मबल, ये सभी भाव भगवा ध्वज में साकार दिखाई देते हैं।
 
 
शायद यही कारण है कि संघ ने किसी व्यक्ति के स्थान पर इन मूल्यों को अपना गुरु माना। क्योंकि व्यक्ति प्रेरणा दे सकता है, लेकिन आदर्श जीवन का आधार बन जाते हैं। व्यक्ति के प्रति श्रद्धा हमें प्रभावित करती है, लेकिन आदर्शों के प्रति निष्ठा हमें रूपांतरित करती है।
 
 
आज का समय आकर्षणों का समय है। प्रसिद्धि, सुविधा और स्वार्थ अनेक बार जीवन का केंद्र बन जाते हैं। ऐसे समय में भगवा ध्वज हमें एक अलग संदेश देता है। वह कहता है कि जीवन का महत्व इस बात में नहीं है कि हमने कितना प्राप्त किया, इस बात में है कि हमने कितना अर्पित किया। महानता अधिकारों के संचय से नहीं, कर्तव्य के पालन से प्राप्त होती है।
 
 
गुरु पूर्णिमा पर भगवा ध्वज के समक्ष नतमस्तक होने का अर्थ किसी प्रतीक के सामने झुकना मात्र नहीं है। यह उन शाश्वत मूल्यों के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करना है जिन्होंने इस राष्ट्र की चेतना को युगों से प्रकाशमान रखा है। यह स्वयं से एक संकल्प है कि जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी जिया जाएगा।
 
 
आज जब हम गुरु पूर्णिमा का पर्व मना रहे हैं, तब भगवा ध्वज हमें स्मरण कराता है कि जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता किसी व्यक्ति की छाया से परे ऐसे आदर्शों का प्रकाश है जो कभी क्षीण नहीं पड़ता। यही प्रकाश पथ दिखाता है, यही प्रेरणा देता है और यही साधारण मनुष्य को असाधारण कार्यों के लिए तैयार करता है। शायद इसी कारण भगवा ध्वज केवल एक ध्वज नहीं वह एक ऐसा गुरु है जो मौन रहकर भी पीढ़ियों को दिशा देता आया है।