डॉ राधा मिश्रा
आज का भारत नारी शक्ति के एक नए स्वर्णिम युग का साक्षी बन रहा है। देश की बेटियाँ सीमाओं पर राष्ट्र की रक्षा कर रही हैं, अंतरिक्ष में नए इतिहास रच रही हैं, खेल के मैदान में तिरंगा लहरा रही हैं, विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका और उद्यमिता के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। यह परिवर्तन केवल महिलाओं की व्यक्तिगत उपलब्धियों का नहीं, बल्कि उस भारतीय सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है जिसने सदियों से नारी को शक्ति, सृजन और संस्कृति की आधारशिला माना है।
भारतीय संस्कृति और नारी का गौरवशाली इतिहास
भारतीय संस्कृति में नारी को केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि शक्ति, ज्ञान, करुणा और सृजन का स्वरूप माना गया है। हमारे इतिहास और परंपरा में नारी को सम्मान देने की बात केवल आदर्श के रूप में नहीं कही गई, बल्कि उसे जीवन में व्यवहारिक रूप से भी स्थान दिया गया।
वैदिक काल की गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा ने ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की परंपरा को समृद्ध किया। मध्यकाल में रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई, रानी वेलु नचियार और कित्तूर की रानी चेन्नम्मा ने विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध अद्वितीय साहस का परिचय दिया। अहिल्याबाई होल्कर ने न्याय, सुशासन और लोककल्याण का ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया जिसकी प्रशंसा आज भी की जाती है।
भारतीय दृष्टि में नारी की स्वतंत्रता का अर्थ केवल अधिकार प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, आत्मानुशासन, कर्तव्य और समाज-निर्माण में सक्रिय सहभागिता भी है।
आधुनिक भारत में नारी शक्ति के नए कीर्तिमान
आज का भारत इस गौरवशाली परंपरा को नए आयाम दे रहा है। रक्षा, विज्ञान, खेल, शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक नेतृत्व हर क्षेत्र में भारतीय महिलाएँ उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर रही हैं।
भारतीय सशस्त्र सेनाओं में महिलाओं की भूमिका निरंतर बढ़ रही है। वे लड़ाकू विमानों का संचालन कर रही हैं, नौसेना में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभा रही हैं और सैन्य नेतृत्व का हिस्सा बन रही हैं। हाल के सैन्य अभियानों के दौरान महिला अधिकारियों द्वारा संयम, आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ देश का पक्ष प्रस्तुत करना प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय रहा।
खेल जगत में मैरी कॉम, पी. वी. सिंधु, मीराबाई चानू, मनु भाकर, निकहत ज़रीन, हरमनप्रीत कौर, स्मृति मंधाना और मिताली राज जैसी खिलाड़ियों ने विश्व मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया है।
इसरो के मंगलयान और चंद्रयान अभियानों में महिला वैज्ञानिकों की भूमिका ने विश्व को भारतीय प्रतिभा का परिचय कराया है। वहीं ग्रामीण भारत में लाखों महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक परिवर्तन की नई कहानी लिख रही हैं।
यह सब सिद्ध करता है कि अवसर, शिक्षा और सही दिशा मिलने पर भारतीय नारी किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती है।
उपलब्धियों के बीच आत्मचिंतन का विषय
इन गौरवपूर्ण उपलब्धियों के बीच समाज के सामने कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े हुए हैं।
हाल के कुछ आंदोलनों और सार्वजनिक प्रदर्शनों में विरोध की अभिव्यक्ति के नाम पर ऐसे पोस्टर, नारे और शब्द देखने-सुनने को मिले, जिन्होंने लोकतांत्रिक संवाद की मर्यादा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग हैं, परंतु जब विरोध का स्वर व्यक्तिगत अपमान, अश्लीलता और अमर्यादित भाषा में बदल जाए, तब वह केवल विरोध नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक संस्कारों के क्षरण का संकेत बन जाता है।
सबसे अधिक पीड़ादायक बात यह रही कि एक माँ, मातृत्व और स्त्री की गरिमा को लक्ष्य बनाकर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग हुआ। विडंबना यह भी थी कि ऐसी भाषा का प्रयोग कुछ महिलाओं द्वारा भी किया गया। यह दृश्य केवल किसी एक घटना का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का विषय है।
यदि नारी सशक्तिकरण का अर्थ दूसरी स्त्री के सम्मान और मातृत्व का अपमान करना है, यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ अशोभनीय भाषा को सामान्य बना देना है, यदि आधुनिकता का अर्थ संवेदनशीलता खो देना है, तो हमें गंभीरता से विचार करना होगा कि हम वास्तव में किस प्रकार के सशक्तिकरण की ओर बढ़ रहे हैं।
डिग्री प्राप्त कर लेना साक्षरता है, परंतु चरित्र, संयम और संवेदनशीलता ही वास्तविक शिक्षा है। बिना संस्कारों की शिक्षा उस भवन के समान है जिसकी नींव कमजोर हो। ऐसी शिक्षा व्यक्ति को कुशल तो बना सकती है, लेकिन श्रेष्ठ नहीं।
भारतीय संस्कृति में शक्ति का अर्थ कभी अहंकार,उद्दंडता,असंयम नहीं रहा। यहाँ शक्ति का स्वरूप साहस और शालीनता, आत्मविश्वास और आत्मसंयम, अधिकार और उत्तरदायित्त्व इन सबके संतुलन से निर्मित होता है।
परिवार और शिक्षण संस्थानों की साझा जिम्मेदारी
यदि समाज को सही दिशा देनी है तो इसकी शुरुआत परिवार और शिक्षण संस्थानों से ही होगी।
माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बच्चों को सफल बनाना नहीं, बल्कि उन्हें संस्कारित बनाना भी है। बच्चों को यह सिखाना आवश्यक है कि आधुनिक होना और अपनी संस्कृति से जुड़ा रहना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को भी केवल डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण के केंद्र बनना होगा। पाठ्यक्रम के साथ-साथ नैतिक शिक्षा, संवाद की मर्यादा, संवैधानिक कर्तव्य, सामाजिक उत्तरदायित्व और भारतीय ज्ञान परंपरा को भी समान महत्व देना होगा।
आज आवश्यकता केवल शिक्षित नागरिकों की नहीं, बल्कि ऐसे नागरिकों की है जो ज्ञान के साथ विवेक, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व भी रखते हों।
समय की माँग: आत्मचिंतन और सच्चा सशक्तिकरण
आज की युवा पीढ़ी, विशेषकर बेटियों के सामने अवसर भी पहले से अधिक हैं और चुनौतियाँ भी। उन्हें अपनी पहचान केवल लोकप्रियता से नहीं, बल्कि अपने चरित्र, परिश्रम, ज्ञान और सामाजिक योगदान से बनानी होगी।
सच्चा सशक्तिकरण गाली देने की क्षमता में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी मर्यादा बनाए रखने की शक्ति में है। वह दूसरी स्त्री को अपमानित करने में नहीं, बल्कि उसका सम्मान करने में है। वह कटुता में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, विवेक, नेतृत्व और करुणा में दिखाई देता है।
जो महिलाएँ आज भी अपने संस्कारों, मर्यादा और उत्कृष्ट कार्यों के बल पर देश और समाज का गौरव बढ़ा रही हैं, वही वास्तव में आने वाली पीढ़ी की प्रेरणा और आदर्श हैं।
भारतीय नारी शक्ति का इतिहास केवल पराक्रम का इतिहास नहीं, बल्कि ज्ञान, सेवा, करुणा, त्याग, नेतृत्व और मर्यादा का इतिहास है। आधुनिक उपलब्धियों और वैज्ञानिक प्रगति के साथ यदि भारतीय जीवन-मूल्यों, नैतिकता और संवेदनशीलता का संतुलित समन्वय स्थापित किया जाए, तो भारत का नारी सशक्तिकरण विश्व के लिए एक विशिष्ट और अनुकरणीय मॉडल बन सकता है।
नारी की वास्तविक शक्ति उसके साहस में जितनी है, उतनी ही उसके विवेक, मर्यादा और संवेदनशीलता में भी है। जब अधिकारों के साथ कर्तव्य, स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व और सफलता के साथ संस्कार जुड़ते हैं, तभी सशक्तिकरण पूर्ण होता है। यही भारतीय दृष्टि है और यही विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति भी।