डॉ भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार,लेखक
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा”
23 जुलाई भारतीय इतिहास में एक ऐसी महान विभूति के जन्मदिवस के रूप में स्मरण किया जाता है, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा, नई दिशा और नई राजनीतिक चेतना प्रदान की। यह दिन है लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती का।
तिलक केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे। वे एक महान राष्ट्रवादी चिंतक, निर्भीक पत्रकार, शिक्षक, समाज जागरण के प्रणेता, राजनीतिक नेता और जन-आंदोलन के कुशल रणनीतिकार थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को केवल राजनीतिक मंचों और सभागारों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे आम भारतीय के जीवन से जोड़ दिया।
उन्होंने भारत के लोगों को यह विश्वास दिलाया कि अंग्रेजी शासन कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है और भारत की जनता अपने भाग्य का निर्माण स्वयं कर सकती है। उन्होंने भारतीयों के भीतर वह आत्मविश्वास पैदा किया, जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता स्वतंत्रता संघर्ष के प्रारंभिक दौर में थी।
उनका प्रसिद्ध उद्घोष—
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।”
—भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का ऐसा मंत्र बन गया, जिसने करोड़ों भारतीयों के भीतर स्वाधीनता की आकांक्षा को प्रज्वलित किया।
राष्ट्रवादी चेतना के महान अग्रदूत
लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। उनका पूरा नाम केशव गंगाधर तिलक था। बचपन से ही वे मेधावी, स्पष्टवादी और स्वाभिमानी स्वभाव के थे।
उनके व्यक्तित्व पर शिक्षा, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का गहरा प्रभाव था। वे मानते थे कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी जनता की जागरूकता में निहित होती है।
जब भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था, तब भारतीय समाज राजनीतिक रूप से कमजोर और विभाजित था। अंग्रेजों की नीतियों के कारण भारतीयों में हीनभावना पैदा की जा रही थी। ऐसी परिस्थिति में तिलक ने भारतीयों को अपने इतिहास, संस्कृति और सामर्थ्य पर गर्व करना सिखाया।
उनका राष्ट्रवाद केवल अंग्रेजों का विरोध करने तक सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि भारत की जनता आत्मनिर्भर बने, शिक्षित बने, संगठित हो और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो।
उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ
राष्ट्र के प्रति प्रेम, अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और राष्ट्रहित के लिए त्याग की भावना।
शिक्षा को बनाया राष्ट्रनिर्माण का आधार
लोकमान्य तिलक का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता तभी स्थायी हो सकती है, जब उसके नागरिक शिक्षित और जागरूक हों।
उन्होंने शिक्षा को केवल नौकरी प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी का विकास करना था।
उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रयास किए। उनका मानना था कि भारत की शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय गौरव को उचित स्थान मिले।
उनकी दृष्टि में शिक्षित व्यक्ति वही है, जो अपने समाज और राष्ट्र की समस्याओं को समझे और उनके समाधान के लिए सक्रिय भूमिका निभाए।
आज जब भारत ज्ञान, तकनीक, नवाचार और कौशल के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब तिलक की शिक्षा संबंधी सोच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
आज के युवाओं के लिए उनका संदेश है—
डिग्री प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है; शिक्षा को जीवन, समाज और राष्ट्र के निर्माण से जोड़ना आवश्यक है।
पत्रकारिता : तिलक की राष्ट्रवादी क्रांति
लोकमान्य तिलक के राष्ट्रवादी संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय उनकी पत्रकारिता है।
उन्होंने 1881 में ‘केसरी’ नामक मराठी समाचार पत्र और ‘द मराठा’ नामक अंग्रेजी समाचार पत्र की शुरुआत की। उस समय पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं थी। वह राजनीतिक चेतना और जनजागरण का प्रभावी साधन थी।
तिलक ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से अंग्रेजी शासन की नीतियों की आलोचना की और भारतीयों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
उनकी कलम निर्भीक थी। वे सत्ता से प्रश्न पूछने में संकोच नहीं करते थे। उन्होंने पत्रकारिता को जनहित और राष्ट्रहित से जोड़ते हुए यह सिद्ध किया कि एक पत्रकार की सबसे बड़ी शक्ति उसकी स्वतंत्र सोच, सत्य के प्रति प्रतिबद्धता और जनसरोकार है।
उनकी पत्रकारिता ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार दिया।
‘केसरी’ केवल एक समाचार पत्र नहीं था, बल्कि वह राष्ट्रवादी चेतना का एक सशक्त मंच बन गया था।
तिलक की पत्रकारिता आज के पत्रकारों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता का प्रचार करना नहीं, बल्कि समाज के प्रश्नों को सामने लाना और जनहित की आवाज को मजबूती देना है।
सार्वजनिक गणेशोत्सव : संस्कृति से राष्ट्रजागरण तक
लोकमान्य तिलक की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी—जनता को संगठित करने की उनकी अद्भुत क्षमता।
उन्होंने सार्वजनिक गणेशोत्सव को एक सामाजिक और राष्ट्रीय मंच के रूप में विकसित किया। उस समय अंग्रेजी शासन के कारण भारतीयों के सार्वजनिक राजनीतिक एकत्रीकरण पर अनेक प्रकार की सीमाएं थीं। तिलक ने भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपरा को सामाजिक एकता और राष्ट्रीय जागरण से जोड़ा।
गणेशोत्सव के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एक स्थान पर एकत्र होने लगे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों, भाषणों और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का प्रसार होने लगा।
तिलक का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन करना नहीं था। वे चाहते थे कि भारतीय समाज एकजुट हो और उसमें राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित हो।
यह उनकी दूरदर्शी राजनीतिक रणनीति थी, जिसमें संस्कृति को सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनाया गया।
छत्रपति शिवाजी से राष्ट्रगौरव की प्रेरणा
तिलक ने शिवाजी उत्सव के माध्यम से भी भारतीयों में आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास किया।
छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन को वे साहस, संगठन, स्वाभिमान और नेतृत्व का प्रतीक मानते थे।
शिवाजी उत्सव के माध्यम से उन्होंने भारतीयों को अपने इतिहास की महान परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया। उनका संदेश था कि जिस समाज को अपने इतिहास और महापुरुषों पर गर्व होता है, वही समाज भविष्य का निर्माण आत्मविश्वास के साथ कर सकता है।
तिलक ने इतिहास को केवल अतीत की स्मृति नहीं माना, बल्कि उसे वर्तमान के लिए प्रेरणा का स्रोत बनाया।
स्वदेशी और बहिष्कार का आंदोलन
बंगाल विभाजन के बाद भारत में स्वदेशी आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला। लोकमान्य तिलक इस आंदोलन के प्रमुख समर्थकों में थे।
उन्होंने भारतीयों से विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का आह्वान किया।
उनकी सोच स्पष्ट थी—
यदि भारत को राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होना है, तो उसे आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर बनना होगा।
स्वदेशी का अर्थ उनके लिए केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं था। यह आत्मनिर्भरता, स्थानीय उद्योगों के विकास और भारतीय आर्थिक शक्ति को मजबूत करने का आंदोलन था।
आज जब भारत आत्मनिर्भर भारत, स्थानीय उत्पादन, स्टार्टअप, मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल जैसे अभियानों की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब तिलक की स्वदेशी सोच नई प्रासंगिकता प्राप्त करती है।
उग्र राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता संघर्ष
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक दौर में राजनीतिक आंदोलन का एक बड़ा हिस्सा संवैधानिक सुधारों और शांतिपूर्ण निवेदनों पर आधारित था। लोकमान्य तिलक का मानना था कि केवल निवेदन करने से अंग्रेजी शासन भारत को स्वतंत्रता नहीं देगा।
उन्होंने राजनीतिक संघर्ष को अधिक व्यापक और जनआधारित बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल की विचारधारा ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रवादी तेवर को मजबूत किया। इन तीनों नेताओं को इतिहास में ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से जाना गया।
उनका राष्ट्रवाद भारतीयों को आत्मसम्मान, संघर्ष और स्वाधीनता के लिए तैयार करता था।
तिलक ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता किसी शासक की कृपा से मिलने वाली वस्तु नहीं, बल्कि जनता का अधिकार है।
जेल और संघर्ष : राष्ट्र के लिए त्याग
लोकमान्य तिलक को अपने राष्ट्रवादी विचारों और पत्रकारिता के कारण अंग्रेजी शासन की कठोर कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
उन पर राजद्रोह के आरोप लगाए गए और उन्हें जेल भेजा गया। उन्हें मांडले, बर्मा की जेल में भी लंबे समय तक रहना पड़ा।
कारावास उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सका। जेल में रहते हुए भी उन्होंने अध्ययन और लेखन जारी रखा।
उन्होंने वहीं ‘गीता रहस्य’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ की रचना की। इस कृति में उन्होंने भगवद्गीता की व्याख्या कर्मयोग के दृष्टिकोण से की।
उनका संदेश था कि जीवन में निष्क्रियता नहीं, बल्कि कर्तव्य और कर्म का मार्ग अपनाना चाहिए।
उनके जीवन में यह विचार स्पष्ट दिखाई देता है कि—
राष्ट्र के लिए संघर्ष करने वाले व्यक्ति के सामने कठिनाइयां आती हैं, लेकिन कठिनाइयां उसके संकल्प की परीक्षा होती हैं, उसकी दिशा बदलने का कारण नहीं।
होमरूल आंदोलन और स्वराज की मांग
प्रथम विश्व युद्ध के समय लोकमान्य तिलक ने भारत में स्वशासन की मांग को और मजबूत किया। उन्होंने होमरूल आंदोलन के माध्यम से स्वराज की मांग को जनचेतना का विषय बनाया।
उनका लक्ष्य था कि भारतीयों को अपने शासन में निर्णायक भूमिका मिले।
होमरूल आंदोलन ने भारत में राजनीतिक चेतना को व्यापक बनाया और स्वतंत्रता के संघर्ष को नई गति दी।
तिलक की राजनीतिक दृष्टि में स्वराज केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था। यह भारतीयों को अपने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भविष्य का निर्णय स्वयं करने का अधिकार था।
तिलक और युवा शक्ति
लोकमान्य तिलक का जीवन विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।
उन्होंने युवाओं को केवल भावनात्मक राष्ट्रवाद नहीं दिया, बल्कि उन्हें कर्म, संगठन और जिम्मेदारी का मार्ग दिखाया।
आज भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है। भारत की युवा शक्ति के सामने अवसर भी हैं और चुनौतियां भी।
तकनीक, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्टार्टअप, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में तिलक का जीवन युवाओं से कहता है—
अपने ज्ञान को केवल अपने करियर तक सीमित मत रखिए। उसे राष्ट्र के विकास से जोड़िए।
युवा यदि ईमानदारी से अपना कार्य करें, नई तकनीक सीखें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, संविधान और लोकतंत्र के मूल्यों को समझें, पर्यावरण की रक्षा करें और समाज के कमजोर वर्गों के लिए संवेदनशील बनें, तो यही आधुनिक राष्ट्रसेवा है।
आज देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है, जो केवल रोजगार खोजने वाले न हों, बल्कि रोजगार और अवसर पैदा करने वाले बनें।
ऐसे युवा चाहिए जो केवल समस्याओं की चर्चा न करें, बल्कि समाधान खोजें।
ऐसे युवा चाहिए जो सोशल मीडिया पर केवल प्रतिक्रिया न दें, बल्कि वास्तविक जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का हिस्सा बनें।
आज के भारत में तिलक की प्रासंगिकता
लोकमान्य तिलक का जीवन आज भी इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि उनके विचार केवल एक ऐतिहासिक कालखंड तक सीमित नहीं हैं।
आज भी भारत के सामने कई चुनौतियां हैं—
- सामाजिक असमानता
- बेरोजगारी
- शिक्षा की गुणवत्ता
- पर्यावरण संरक्षण
- ग्रामीण विकास
- तकनीकी परिवर्तन
- लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा
- सामाजिक समरसता
- आर्थिक आत्मनिर्भरता
इन सभी क्षेत्रों में तिलक के जीवन से प्रेरणा ली जा सकती है।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्रनिर्माण केवल सरकारों का कार्य नहीं है। राष्ट्र का निर्माण नागरिकों के सामूहिक प्रयास से होता है।
एक जिम्मेदार नागरिक, एक ईमानदार शिक्षक, एक निर्भीक पत्रकार, एक मेहनती किसान, एक कर्मठ वैज्ञानिक, एक संवेदनशील डॉक्टर, एक समर्पित सैनिक और एक जागरूक युवा—सभी राष्ट्रनिर्माण के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं
राष्ट्र के लिए जीवन की शपथ
23 जुलाई को लोकमान्य तिलक की जयंती केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन है।
हमें स्वयं से पूछना चाहिए—
क्या हम अपने राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझते हैं?
क्या हम अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी स्वीकार करते हैं?
क्या हम अपने जीवन की सफलता को समाज की प्रगति से जोड़ते हैं?
क्या हमारी शिक्षा हमें केवल रोजगार देती है या हमें एक बेहतर नागरिक भी बनाती है?
क्या हमारी पत्रकारिता जनहित की आवाज बन रही है?
क्या हमारी राजनीति राष्ट्रहित को सर्वोच्च स्थान दे रही है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या हम अपने जीवन में तिलक के उस स्वाभिमान, साहस और राष्ट्रनिष्ठा को स्थान दे पा रहे हैं?
आज लोकमान्य तिलक की जयंती पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए—
हम राष्ट्र की एकता और अखंडता की रक्षा करेंगे।
हम संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करेंगे।
हम अपनी संस्कृति और विरासत को समझेंगे और उसका सम्मान करेंगे।
हम शिक्षा को केवल रोजगार नहीं, बल्कि चरित्र और राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बनाएंगे।
हम स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और स्थानीय प्रतिभा को प्रोत्साहित करेंगे।
हम सत्य, न्याय और जनहित के पक्ष में खड़े होंगे।
हम अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को सर्वोच्च स्थान देंगे।
और सबसे बढ़कर—
हम अपने जीवन का एक हिस्सा राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित करने का संकल्प लेंगे।
लोकमान्य तिलक की विरासत
लोकमान्य तिलक ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि एक व्यक्ति भी पूरे राष्ट्र की चेतना को बदल सकता है।
उनकी कलम ने जनता को जगाया।
उनके भाषणों ने युवाओं में ऊर्जा भरी।
उनके आंदोलनों ने जनता को संगठित किया।
उनकी पत्रकारिता ने सत्ता से सवाल किए।
उनके स्वदेशी विचारों ने आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया।
उनके स्वराज के उद्घोष ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक नया लक्ष्य दिया।
और उनके संघर्ष ने आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास दिया कि भारत स्वतंत्र हो सकता है।
लोकमान्य तिलक का निधन 1 अगस्त 1920 को हुआ, लेकिन उनके विचार कभी समाप्त नहीं हुए।
उनका जीवन आज भी भारत के प्रत्येक नागरिक से कहता है—
राष्ट्र निर्माण केवल इतिहास के महान नेताओं की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सभी की जिम्मेदारी है।
आज जब भारत एक विकसित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब लोकमान्य तिलक की राष्ट्रवादी चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है।
तिलक ने जिस स्वराज का सपना देखा था, आज उसकी व्यापक व्याख्या सुशासन, आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय, शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, राष्ट्रीय एकता और नागरिक कर्तव्य के रूप में की जा सकती है।
इसलिए 23 जुलाई को हम केवल लोकमान्य तिलक को याद न करें।
हम उनके जीवन से प्रेरणा लें।
उनकी पत्रकारिता से निर्भीकता सीखें।
उनके राष्ट्रवाद से स्वाभिमान सीखें।
उनके संघर्ष से साहस सीखें।
उनके स्वदेशी विचारों से आत्मनिर्भरता सीखें।
उनके जीवन से कर्मयोग सीखें।
और उनके स्वराज के उद्घोष को आज के भारत के लिए एक नए संकल्प में बदलें।
अंतिम संकल्प
“हम ऐसा भारत बनाएंगे, जहां स्वतंत्रता केवल इतिहास की स्मृति नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन में अधिकार और जिम्मेदारी दोनों के रूप में जीवित रहे।
हम ऐसा भारत बनाएंगे, जहां युवा केवल अपने भविष्य के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के लिए भी चिंतित हों।
हम ऐसा भारत बनाएंगे, जहां ज्ञान शक्ति बने, शिक्षा चरित्र बनाए, पत्रकारिता जनहित की आवाज बने और राजनीति राष्ट्रसेवा का माध्यम बने।
हम ऐसा भारत बनाएंगे, जो आत्मनिर्भर हो, स्वाभिमानी हो, संस्कारित हो और विश्व के सामने अपनी ज्ञान, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की शक्ति के साथ खड़ा हो।
यही लोकमान्य तिलक को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
यही 23 जुलाई का वास्तविक संदेश होगा।
और यही उस महान राष्ट्रवादी की जीवन-शपथ होगी, जिसने करोड़ों भारतीयों के भीतर स्वतंत्रता का स्वप्न जगाते हुए कहा था—
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।”
आज इस उद्घोष को नई पीढ़ी के लिए एक नए संकल्प में बदलने का समय है—
“राष्ट्र का विकास हमारा कर्तव्य है,
भारत का गौरव हमारी जिम्मेदारी है,
और राष्ट्रनिर्माण हमारे जीवन का संकल्प है।”