सेहत से समझौता कर स्वाद के पीछे भागता समाज

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    20-Jul-2026
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सेहत से  समझौता कर स्वाद के पीछे भागता समाज  
 
 
 
रूमा सेनगुप्ता
लेखिका पत्रकार
 
 
भारतीय बाजार में खान-पान के बदलते स्वरूप को देखकर अब मैं बहुत हैरान और चिंतिंत हूं। मन में बार-बार एक ही सवाल उठता है—हम कहां से चले थे और कहां पहुंच रहे हैं? जिस भारत की पहचान दुनिया में उसकी समृद्ध खान-पान संस्कृति, सात्विक जीवनशैली और संतुलित भोजन के लिए रही है, उसी देश में आज जंक फूड की संस्कृति तेजी से अपने पैर पसार रही है। हमारी परंपरा में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि शरीर, मन और विचारों को स्वस्थ रखने का आधार माना गया है। आयुर्वेद कहता है कि "हितभुक, मितभुक और ऋतभुक" अर्थात हितकारी, संतुलित और समयानुकूल भोजन ही स्वस्थ जीवन की सबसे बड़ी कुंजी है। शायद यही कारण है कि भारतीय भोजन पद्धति को दुनिया की सबसे संतुलित भोजन प्रणालियों में गिना जाता है।
 
 
लेकिन आज की तस्वीर बिल्कुल अलग है। यदि आज से दस-पंद्रह वर्ष पहले की बात करें तो अधिकांश भारतीय परिवारों में घर का बना भोजन ही पहली पसंद होता था। कामकाजी लोग भी बाहर खाने की स्थिति में दाल, चावल, रोटी, सब्जी, इडली, डोसा, पोहा या अन्य पारंपरिक व्यंजन ही खाते थे। बच्चे घर से बना टिफिन लेकर स्कूल जाते थे और बाजार में भी ऐसी ही दुकानों की भरमार होती थी।
 
 
आज रायपुर, दिल्ली, मुंबई, भोपाल, इंदौर, लखनऊ, पटना, जयपुर, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद या देश के किसी भी छोटे-बड़े शहर में निकल जाइए। हर गली, हर चौक, हर मोहल्ले और हर बाजार में मोमोज, बर्गर, पिज्जा, पास्ता, मैगी, फ्रेंच फ्राइज, शावरमा, रोल, तले हुए स्नैक्स और रंग-बिरंगे पेय बेचने वाले ठेले और दुकानें आसानी से दिखाई दे जाएंगी। ऐसा लगता है जैसे भारतीय थाली पर धीरे-धीरे जंक फूड ने कब्जा करना शुरू कर दिया है।
 
 
सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि यह बदलाव सबसे तेजी से बच्चों और युवाओं में दिखाई दे रहा है। स्कूलों और कॉलेजों के आसपास जंक फूड की दुकानों पर लगी भीड़ इस बात का प्रमाण है। घर की दाल-रोटी और सब्जी की जगह अब मोमोज, नूडल्स, बर्गर और पिज्जा ने ले ली है। सोशल मीडिया, आकर्षक विज्ञापन, ऑनलाइन फूड डिलीवरी और दिखावे की संस्कृति ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है। स्वाद की चाहत अब धीरे-धीरे आदत और फिर लत में बदलती जा रही है।
 
 
असल में जंक फूड का स्वाद प्राकृतिक नहीं होता। इसे अधिक आकर्षक बनाने के लिए मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी या अजीनोमोटो), कृत्रिम रंग, कृत्रिम फ्लेवर, सोडियम बेंजोएट, पोटेशियम सोर्बेट जैसे परिरक्षक, अत्यधिक रिफाइंड मैदा, ट्रांस फैट, रिफाइंड तेल, अधिक नमक और परिष्कृत चीनी का उपयोग किया जाता है। कई छोटे प्रतिष्ठानों में एक ही तेल को बार-बार गर्म करके इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि बार-बार गर्म किए गए तेल में हानिकारक रसायन बनने लगते हैं, जो लंबे समय तक शरीर में पहुंचकर गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
 
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) लगातार चेतावनी देता रहा है कि अत्यधिक नमक, चीनी और ट्रांस फैट का सेवन हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मोटापा और मधुमेह जैसी बीमारियों का प्रमुख कारण बन रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने भी अपनी नवीनतम आहार संबंधी सिफारिशों में स्पष्ट कहा है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन जितना कम हो, उतना बेहतर है। ऐसे खाद्य पदार्थ मोटापा, फैटी लिवर, मधुमेह, पाचन संबंधी विकार, हृदय रोग और कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
 
 
भारत में कैंसर और मधुमेह के बढ़ते मामलों के पीछे कई कारण हैं, लेकिन असंतुलित खान-पान और शारीरिक निष्क्रियता को प्रमुख कारणों में गिना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी देते हैं कि यदि बचपन से ही जंक फूड खाने की आदत विकसित हो जाए तो भविष्य में गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। दुर्भाग्य यह है कि चेतावनियों के बावजूद हम स्वाद के मोह से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।
 
 
चिंता की बात केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि हमारी बदलती संस्कृति भी है। भारत की पारंपरिक भोजन पद्धति—दाल, रोटी, चावल, मोटे अनाज (श्री अन्न), हरी सब्जियां, दही, छाछ, अंकुरित अनाज और मौसमी फल—आज भी पोषण विज्ञान की कसौटी पर सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। दुनिया आज जिन मिलेट्स (श्री अन्न) को सुपरफूड कह रही है, वे सदियों से भारतीय रसोई का हिस्सा रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि हम अपनी थाली छोड़कर उसी भोजन के पीछे भाग रहे हैं, जिसे विकसित देश भी अब सीमित करने की सलाह दे रहे हैं।
 
 
बाजार भी इस बदलाव की गवाही देता है। भारत का पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड उद्योग आज कई लाख करोड़ रुपये का हो चुका है और हर वर्ष तेजी से बढ़ रहा है। कंपनियां बच्चों और युवाओं को लक्ष्य बनाकर ऐसे विज्ञापन तैयार करती हैं कि जंक फूड आधुनिक जीवनशैली का प्रतीक लगने लगता है। परिणाम यह है कि घर के पौष्टिक भोजन की जगह बाजार का तला-भुना भोजन हमारी दिनचर्या में शामिल होता जा रहा है।
 
 
यह नहीं कहा जा रहा कि कभी-कभार पिज्जा, बर्गर या मोमोज खाना अपराध है। समस्या तब है, जब ये भोजन हमारी आदत बन जाएं और घर के संतुलित भोजन का स्थान ले लें। स्वाद कुछ मिनटों का आनंद देता है, लेकिन उसका दुष्प्रभाव वर्षों तक शरीर को भुगतना पड़ सकता है।
 
 
समय की मांग है कि परिवार बच्चों को घर के भोजन का महत्व समझाएं, विद्यालयों में पोषण शिक्षा को व्यवहारिक बनाया जाए, खाद्य सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन कराया जाए और जंक फूड की अंधाधुंध मार्केटिंग पर भी प्रभावी नियंत्रण हो। सबसे बड़ी जिम्मेदारी हमारी अपनी है। यदि हम अपनी थाली और अपनी परंपरा को नहीं बचा पाए, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल बीमारियां ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध भोजन संस्कृति से भी हाथ धोना पड़ेगा।
 
 
स्वाद के पीछे भागते-भागते कहीं ऐसा न हो कि हम अपनी सबसे बड़ी पूंजी—स्वास्थ्य—ही खो बैठें। आधुनिकता को अपनाइए, लेकिन अपनी थाली, अपनी संस्कृति और अपनी सेहत की कीमत पर नहीं। क्योंकि स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र की सबसे मजबूत नींव है।