जगन्नाथ रथयात्रा : सामाजिक समरसता, वनवासी परंपरा और भारत के राष्ट्रीय एकत्व का जीवंत प्रतीक

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    15-Jul-2026
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जगन्नाथ रथयात्रा
 
 
डॉ भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
 
 
भारत की सनातन संस्कृति में पर्व और उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे समाज, संस्कृति, प्रकृति और राष्ट्र जीवन के मार्गदर्शक भी हैं। इन्हीं उत्सवों में ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा विश्व की सबसे प्राचीन और विशाल धार्मिक यात्राओं में से एक है। यह केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के नगर भ्रमण का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की समन्वयकारी चेतना, सामाजिक समरसता, जनजातीय परंपरा, पर्यावरण संरक्षण तथा राष्ट्रीय एकात्मता का सजीव प्रतीक है। यही कारण है कि प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु, देश-विदेश से पुरी पहुँचकर इस महायात्रा में सहभागी बनते हैं और भगवान के रथ को खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं।
 
 
भारत में धार्मिक पर्वों का उद्देश्य केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि समाज को जोड़ना, समानता का संदेश देना और जीवन मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाना रहा है। जगन्नाथ रथयात्रा इस परंपरा का सर्वोत्तम उदाहरण है। इस यात्रा में न कोई ऊँच-नीच है, न कोई जातिगत भेद, न राजा और न ही प्रजा का अंतर। सभी भगवान के सेवक बनकर एक ही रस्सी पकड़ते हैं। यही भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
 
 
पुरी स्थित जगन्नाथ धाम भारत के चार प्रमुख धामों में से एक है। आदि शंकराचार्य ने यहाँ गोवर्धन मठ की स्थापना की थी। यह धाम केवल वैष्णव परंपरा का केंद्र नहीं, बल्कि शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध और जनजातीय संस्कृति के अद्भुत समन्वय का केंद्र भी है। भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण का लोकमंगलकारी स्वरूप माना जाता है। उनके साथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिष्ठा भारतीय परिवार व्यवस्था, भाई-बहन के स्नेह और पारिवारिक एकता का संदेश देती है।
 
 
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ तीन भव्य रथों में आरूढ़ होकर श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज और सुभद्रा का दर्पदलन कहलाता है। प्रत्येक वर्ष इन तीनों रथों का निर्माण नए सिरे से किया जाता है। इनके निर्माण की प्रक्रिया अक्षय तृतीया से प्रारंभ होती है और परंपरागत शिल्पकार बिना आधुनिक मशीनों के इन्हें तैयार करते हैं।
 
 
रथयात्रा की सबसे अनूठी परंपरा 'छेरा पहरा' है। इसमें पुरी के गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण झाड़ू लेकर भगवान के रथ के आगे मार्ग की सफाई करते हैं। यह दृश्य भारतीय लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत प्रतीक है। राजा स्वयं को भगवान का सेवक मानते हुए झाड़ू लगाता है। इससे बड़ा सामाजिक समानता और सेवा भाव का संदेश संसार में दुर्लभ है।
 
 
जगन्नाथ संस्कृति की आत्मा है आदिवासी समाज
 
जगन्नाथ परंपरा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसका मूल जनजातीय संस्कृति से जुड़ा हुआ है। अनेक इतिहासकारों, धार्मिक परंपराओं और 'मदला पांजी' जैसे ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार भगवान जगन्नाथ की मूल उपासना नीलमाधव के रूप में शबर (सबर/सौरा) जनजाति द्वारा की जाती थी।
 
 
पौराणिक कथा के अनुसार शबर जनजाति के प्रमुख विश्ववसु भगवान नीलमाधव के महान उपासक थे। वे घने वन में गुप्त रूप से भगवान की पूजा करते थे। मालवा के राजा इन्द्रद्युम्न को जब भगवान नीलमाधव के विषय में ज्ञात हुआ, तब उन्होंने अपने पुरोहित विद्यापति को भगवान की खोज में भेजा। विद्यापति ने विश्ववसु की पुत्री ललिता से विवाह किया और विश्ववसु के साथ वन में जाकर भगवान के दर्शन किए। बाद में भगवान ने स्वयं राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में दर्शन देकर समुद्र से प्राप्त पवित्र दारु (लकड़ी) से अपनी प्रतिमा बनाने का निर्देश दिया।
 
 
यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि भारतीय संस्कृति ने जनजातीय समाज की आस्था को सम्मान दिया और उसे मुख्यधारा में प्रतिष्ठित किया। आज भी जगन्नाथ मंदिर की अनेक परंपराओं में शबर समाज के वंशजों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं।
 
 
जगन्नाथ मंदिर के दैतापति सेवक स्वयं को विश्ववसु शबर का वंशज मानते हैं। भगवान के स्नान पूर्णिमा के बाद जब वे 'अनासार' काल में विश्राम करते हैं, तब उनकी सेवा दैतापति ही करते हैं। नवकलेवर के समय पवित्र नीम वृक्ष की खोज, नई प्रतिमाओं का निर्माण, ब्रह्म परिवर्तन तथा अनेक गोपनीय धार्मिक अनुष्ठानों में दैतापति समाज की प्रमुख भूमिका होती है। रथयात्रा में भगवान को रथ पर विराजमान कराने का अधिकार भी इन्हीं सेवकों को प्राप्त है। यह भारत में जनजातीय समाज के सम्मान और सहभागिता का अद्वितीय उदाहरण है।
 
 
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
 
जगन्नाथ रथयात्रा भारतीय पर्यावरणीय दृष्टि का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रत्येक वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं, किन्तु उनके निर्माण में प्रकृति के संरक्षण का विशेष ध्यान रखा जाता है। परंपरागत रूप से चयनित नीम सहित विशिष्ट वृक्षों की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। निर्माण कार्य में स्थानीय कारीगरों की पीढ़ियों से चली आ रही शिल्प परंपरा का पालन किया जाता है। प्राकृतिक रंगों, कपड़ों और हस्तकला का प्रयोग भारतीय संस्कृति की पर्यावरण-सम्मत जीवन शैली को दर्शाता है।
 
 
लोककला और स्वदेशी परंपरा का संरक्षण
 
रथ निर्माण केवल एक धार्मिक कार्य नहीं बल्कि लोकशिल्प का जीवंत विश्वविद्यालय है। बढ़ई, चित्रकार, मूर्तिकार, वस्त्र कलाकार और पारंपरिक शिल्पी महीनों तक मिलकर इन रथों का निर्माण करते हैं। यह परंपरा स्थानीय रोजगार, स्वदेशी शिल्प और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखती है।
 
 
राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक
 
जगन्नाथ धाम भारत की सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ, उनकी कर्मभूमि द्वारका रही, जबकि जगन्नाथ के रूप में उनकी आराधना पुरी में होती है। उनकी बहन सुभद्रा का संबंध हस्तिनापुर से जुड़ता है और विभीषण की उपासना श्रीलंका तक सांस्कृतिक संबंध स्थापित करती है। इस प्रकार उत्तर, पश्चिम, पूर्व और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक धाराएँ जगन्नाथ परंपरा में एकाकार हो जाती हैं।
 
 
संघर्ष, विध्वंस और पुनर्निर्माण की गाथा
 
जगन्नाथ मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं रहा, बल्कि विदेशी आक्रमणकारियों का लक्ष्य भी बना। मध्यकाल में इस मंदिर पर अनेक बार हमले हुए। इलियास शाह, फिरोज शाह तुगलक, इस्माइल गाजी, काला पहाड़ तथा औरंगज़ेब के काल में मंदिर को भारी क्षति पहुँचाई गई। अनेक बार भगवान की प्रतिमाओं को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना पड़ा। इन कठिन परिस्थितियों में स्थानीय जनता, गजपति राजाओं, पुजारियों और विशेष रूप से जनजातीय समाज ने भगवान की प्रतिमाओं की रक्षा की।
 
 
इतिहास में अनेक अवसरों पर शबर और अन्य वनवासी समुदायों ने प्रतिमाओं को जंगलों और दुर्गम क्षेत्रों में सुरक्षित रखा। इससे स्पष्ट होता है कि जगन्नाथ केवल राजाओं के नहीं, बल्कि जनजातीय समाज और सामान्य जनता के भी आराध्य थे। मुगल शासन के पतन के बाद मराठों ने मंदिर के संरक्षण का कार्य किया तथा इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने भी मंदिर के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
 
 
आज के भारत के लिए प्रेरणा
 
आज जब विश्व जातीय और धार्मिक संघर्षों से जूझ रहा है, तब जगन्नाथ रथयात्रा समरसता, सहअस्तित्व और सांस्कृतिक एकात्मता का संदेश देती है। यहाँ राजा भी सेवक है, आदिवासी भी भगवान का आत्मीय है, ब्राह्मण भी सेवक है और सामान्य श्रद्धालु भी समान अधिकार से भगवान के रथ को खींचता है। यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का चलता-फिरता दर्शन है। इसमें धर्म है, दर्शन है, लोकजीवन है, पर्यावरण संरक्षण है, आदिवासी समाज का सम्मान है, सामाजिक समरसता है और राष्ट्रीय एकात्मता का संदेश है। यह महापर्व हमें बताता है कि भारत की शक्ति उसकी विविधताओं में नहीं, बल्कि उन विविधताओं के समन्वय में निहित है।
 
 
जब समाज के सभी वर्ग एक ही रस्सी पकड़कर भगवान के रथ को आगे बढ़ाते हैं, तब वह केवल रथ नहीं चलता, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और मानवता का शाश्वत संदेश भी आगे बढ़ता है। यही जगन्नाथ रथयात्रा का वास्तविक दर्शन है और यही इसकी सनातन प्रासंगिकता।