डॉ भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
काव्यांजलि
जंगल-जंगल दीप जलाया, सेवा का संदेश दिया,
जन-जन के अंतर्मन में, राष्ट्रभाव का बीज दिया।
तन था साधन, मन था अर्पण, जीवन था उपकार महान,
ऐसे तपस्वी कर्मयोगी को, शत-शत नमन, शत-शत प्रणाम।
न पद की चाह, न यश की अभिलाषा, न सम्मान का कोई मोह,
वनवासी जन-जीवन की सेवा ही था उनका एकमात्र संयोग।
जहाँ कठिन था पथ जीवन का, वहाँ स्वयं प्रकाश बने,
भारत माता के सच्चे सपूत, जगदेव जी इतिहास बने।
15 जुलाई श्रद्धेय जगदेव उरांव जी की पुण्यतिथि केवल एक तिथि का स्मरण नहीं है, बल्कि भारतीय समाज के उस महान कर्मयोगी को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर है, जिसने अपना संपूर्ण जीवन वनवासी समाज के उत्थान, भारतीय संस्कृति के संरक्षण और राष्ट्र निर्माण के कार्य में समर्पित कर दिया। उनका जीवन त्याग, तपस्या, सेवा, संगठन, सादगी और सुचिता का ऐसा अनुपम उदाहरण है, जो आज भी हजारों कार्यकर्ताओं को प्रेरित करता है। वे उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में थे जिन्होंने अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए जीवन जिया। उनके लिए सेवा कोई दायित्व नहीं, बल्कि साधना थी और राष्ट्र उनके जीवन का सर्वोच्च आदर्श था।
श्रद्धेय जगदेव उरांव जी का विश्वास था कि भारत की आत्मा उसके गाँवों, वनों और वनवासी समाज में बसती है। वे वनवासी समाज को किसी पिछड़े वर्ग के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति मानते थे। उनका कहना था कि यदि भारत को उसकी वास्तविक शक्ति के साथ आगे बढ़ाना है, तो वनवासी समाज के स्वाभिमान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बनाना होगा।
वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ने के बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वनवासी समाज की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने देश के अनेक वनवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार, स्वावलंबन, महिला सशक्तिकरण, खेलकूद और सामाजिक समरसता के कार्यों को नई दिशा प्रदान की। वे मानते थे कि किसी समाज का वास्तविक विकास केवल आर्थिक संसाधनों से नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कार और आत्मविश्वास से होता है। इसलिए उन्होंने विद्यालयों, छात्रावासों, स्वास्थ्य शिविरों, संस्कार केंद्रों और स्वावलंबन के अनेक कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया। उनके कार्य का उद्देश्य केवल सुविधा पहुँचाना नहीं था, बल्कि समाज को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाना था।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी थी। उन्होंने कभी पद, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत प्रसिद्धि की इच्छा नहीं की। साधारण वेशभूषा, सामान्य जीवन और निरंतर प्रवास उनके जीवन का हिस्सा था। वे जहाँ भी जाते, लोगों से आत्मीयता के साथ मिलते और उनकी समस्याओं को अपना समझकर समाधान के लिए प्रयास करते। उनके व्यवहार में विनम्रता थी, विचारों में स्पष्टता थी और कार्य में अद्भुत अनुशासन था। यही कारण था कि वे वनवासी समाज के बीच केवल एक संगठनकर्ता नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य के रूप में स्वीकार किए जाते थे।
जगदेव उरांव जी का जीवन सुचिता और पारदर्शिता का पर्याय था। आज जब सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और ईमानदारी की चर्चा बार-बार होती है, तब उनका जीवन हमें यह विश्वास दिलाता है कि बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के भी समाज में व्यापक परिवर्तन लाया जा सकता है। उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा। समाज का विश्वास ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान था। वे मानते थे कि सेवा कार्यकर्ता की सबसे बड़ी पूँजी उसका चरित्र होता है और यदि चरित्र सुरक्षित है तो संगठन और समाज दोनों मजबूत रहते हैं।
वे एक कुशल संगठनकर्ता भी थे। उन्होंने स्वयं कार्य करने के साथ-साथ हजारों कार्यकर्ताओं का निर्माण किया। उनका विश्वास था कि समाज परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं, बल्कि संगठित समाज की शक्ति से संभव होता है। इसलिए उन्होंने युवाओं को सेवा, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक समरसता का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने अनेक युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनना है।
उनका विकास का दृष्टिकोण अत्यंत व्यापक था। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, संस्कार और सांस्कृतिक संरक्षण को विकास के पाँच प्रमुख आधार मानते थे। उनका कहना था कि यदि आर्थिक प्रगति हो जाए लेकिन संस्कृति नष्ट हो जाए, तो विकास अधूरा रह जाता है। इसी प्रकार यदि शिक्षा केवल रोजगार तक सीमित रह जाए और चरित्र निर्माण न करे, तो समाज मजबूत नहीं बन सकता। इसलिए उन्होंने आधुनिक विकास और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के समन्वय पर विशेष बल दिया।
श्रद्धेय जगदेव उरांव जी प्रकृति और संस्कृति दोनों के संरक्षण के पक्षधर थे। उनका मानना था कि वनवासी समाज का प्रकृति के साथ जो आत्मीय संबंध है, वही भारत की पर्यावरणीय चेतना की सबसे बड़ी शक्ति है। आज जब पूरा विश्व पर्यावरण संरक्षण की चिंता कर रहा है, तब उनका जीवन और विचार और भी अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं।
राष्ट्रीय एकता के प्रति उनका समर्पण भी अद्वितीय था। वे मानते थे कि भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और वनवासी समाज इस विविधता का अभिन्न अंग है। उन्होंने सदैव इस बात पर बल दिया कि वनवासी समाज को सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास मिले, ताकि वह राष्ट्र निर्माण में अपनी पूर्ण भूमिका निभा सके। उनके लिए समरसता का अर्थ किसी की पहचान मिटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक समुदाय को सम्मान के साथ जोड़ना था।
आज जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों से गुजर रहा है, तब श्रद्धेय जगदेव उरांव जी का जीवन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, सादगी ही सबसे बड़ा आभूषण है, चरित्र ही सबसे बड़ी संपत्ति है और राष्ट्रसेवा ही जीवन की सर्वोच्च साधना है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि बिना किसी पद, सत्ता या प्रचार के भी समाज में स्थायी परिवर्तन लाया जा सकता है।
15 जुलाई की यह पुण्यतिथि हमें उनके आदर्शों का स्मरण करने के साथ-साथ उन्हें अपने जीवन में उतारने का भी संकल्प लेने का अवसर देती है। यदि हम सेवा, समर्पण, सादगी, सुचिता, संगठन और राष्ट्रभक्ति के उनके आदर्शों को अपने जीवन का हिस्सा बना सकें, तो वही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
श्रद्धेय जगदेव उरांव जी का जीवन भारतीय समाज की अमूल्य धरोहर है। उनका तप, त्याग और सेवा का संदेश आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा। वे भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किंतु उनके विचार, उनके संस्कार और उनके द्वारा निर्मित सेवा की परंपरा सदैव जीवित रहेगी। राष्ट्र और समाज के इस महान तपस्वी को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।