-डॉ. भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक औपचारिक दिवस नहीं है, बल्कि मानव विकास, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। बढ़ती जनसंख्या के कारण उत्पन्न चुनौतियों और संभावनाओं पर विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने वर्ष 1989 में इस दिवस की शुरुआत की। इसकी पृष्ठभूमि वर्ष 1987 में उस समय बनी, जब 11 जुलाई को विश्व की जनसंख्या पाँच अरब के आँकड़े तक पहुँच गई थी। आज लगभग चार दशक बाद विश्व की जनसंख्या आठ अरब से अधिक हो चुकी है और यह निरंतर बढ़ रही है। ऐसे में यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है कि क्या पृथ्वी के सीमित संसाधन बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं को पूरा कर पाएँगे, अथवा हमें विकास का नया संतुलित मॉडल अपनाना होगा।
जनसंख्या किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है, बशर्ते वह शिक्षित, स्वस्थ, कुशल और उत्पादक हो। यदि जनसंख्या गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन में परिवर्तित हो जाए तो वही आर्थिक प्रगति, वैज्ञानिक नवाचार, सांस्कृतिक समृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार बनती है। इसके विपरीत यदि जनसंख्या वृद्धि अनियंत्रित हो तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं का विकास उसके अनुरूप न हो, तो बेरोजगारी, गरीबी, कुपोषण, पर्यावरण प्रदूषण, अपराध और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं।
भारत आज विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। यह स्थिति भारत के सामने दोहरी चुनौती प्रस्तुत करती है। एक ओर देश के पास विशाल युवा शक्ति है, जो उसे विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनाने की क्षमता रखती है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, पेयजल, परिवहन और ऊर्जा जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। यदि भारत अपनी युवा आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार से जोड़ने में सफल होता है, तो यह जनसंख्या देश की सबसे बड़ी पूँजी सिद्ध होगी। यही कारण है कि आज "जनसंख्या नियंत्रण" से अधिक "जनसंख्या प्रबंधन" और "मानव संसाधन विकास" पर बल दिया जा रहा है।
विश्व के अनेक देशों में जनसंख्या वृद्धि की गति अलग-अलग है। विकसित देशों में जन्मदर कम होने के कारण वृद्ध जनसंख्या का अनुपात बढ़ रहा है, जबकि विकासशील देशों में युवा आबादी अधिक है। भारत इस समय जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) के दौर में है। इसका अर्थ है कि देश में कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या सबसे अधिक है। यदि इस वर्ग को उचित अवसर मिले तो भारत अगले दो दशकों में विश्व अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बन सकता है। लेकिन यदि यह युवा वर्ग बेरोजगार और निराश रहेगा, तो यही स्थिति सामाजिक तनाव और आर्थिक संकट का कारण भी बन सकती है।
बढ़ती जनसंख्या का सबसे अधिक प्रभाव प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है। पृथ्वी के पास जल, भूमि, वन, खनिज और ऊर्जा के संसाधन सीमित हैं। जनसंख्या वृद्धि के कारण इन संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। परिणामस्वरूप भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, वन क्षेत्र घट रहे हैं, जैव विविधता प्रभावित हो रही है और जलवायु परिवर्तन की समस्या गंभीर होती जा रही है। शहरों का अनियोजित विस्तार, वायु और जल प्रदूषण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या तथा कृषि योग्य भूमि में कमी भविष्य के लिए गंभीर संकेत हैं। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन और अधिक कठिन हो सकता है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी जनसंख्या वृद्धि अनेक चुनौतियाँ उत्पन्न करती है। मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करना, सभी तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाना, पोषण की समस्या का समाधान, संक्रामक एवं असंक्रामक रोगों की रोकथाम तथा मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय आज अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था किसी भी देश के लिए कितनी आवश्यक है। जनसंख्या जितनी अधिक होगी, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव भी उतना ही अधिक होगा। इसलिए प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, टीकाकरण, पोषण कार्यक्रम और परिवार कल्याण योजनाएँ अत्यंत आवश्यक हैं।
शिक्षा जनसंख्या स्थिरीकरण का सबसे प्रभावी माध्यम मानी जाती है। विशेष रूप से महिलाओं की शिक्षा का सीधा संबंध छोटे और स्वस्थ परिवार से होता है। जब महिलाएँ शिक्षित होती हैं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती हैं और उन्हें निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त होता है, तब परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता स्वतः बढ़ती है। बाल विवाह की रोकथाम, किशोरियों के स्वास्थ्य की सुरक्षा तथा बालिकाओं की उच्च शिक्षा जनसंख्या संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" जैसी पहल केवल सामाजिक अभियान नहीं, बल्कि जनसंख्या प्रबंधन की दीर्घकालिक रणनीति भी हैं।
भारत सरकार ने परिवार कल्याण, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आयुष्मान भारत, मिशन इंद्रधनुष, पोषण अभियान, जननी सुरक्षा योजना तथा मिशन परिवार विकास जैसी अनेक योजनाएँ प्रारंभ की हैं। इनके सकारात्मक परिणाम भी दिखाई दे रहे हैं। देश की कुल प्रजनन दर में उल्लेखनीय कमी आई है और अधिकांश राज्यों ने प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन दर प्राप्त कर ली है। फिर भी कुछ राज्यों और क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि की दर अपेक्षाकृत अधिक है, जहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा और जागरूकता के विस्तार की आवश्यकता बनी हुई है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्य (SDGs) की प्राप्ति भी जनसंख्या के संतुलित विकास पर निर्भर करती है। गरीबी उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छ जल, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार और जलवायु संरक्षण जैसे अधिकांश लक्ष्य जनसंख्या की गुणवत्ता से जुड़े हुए हैं। यदि प्रत्येक नागरिक को समान अवसर उपलब्ध होंगे, तभी विकास वास्तव में समावेशी और टिकाऊ बन सकेगा।
भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में जनसंख्या सबसे महत्वपूर्ण कारक होगी। विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक विकास से नहीं होगा, बल्कि स्वस्थ, शिक्षित, नवाचारी, नैतिक और कुशल नागरिकों के निर्माण से होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, कौशल विकास मिशन, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और महिला सशक्तिकरण जैसे कार्यक्रम इसी दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं। यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए तो भारत अपनी विशाल जनसंख्या को विश्व की सबसे बड़ी उत्पादक शक्ति में बदल सकता है।
आज आवश्यकता केवल जनसंख्या वृद्धि पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता विकसित करने की है। प्रत्येक परिवार को छोटे और स्वस्थ परिवार के महत्व को समझना होगा। समाज को महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। युवाओं को कौशल और नवाचार से जोड़ना होगा तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा। मीडिया, शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक संगठन और धार्मिक नेतृत्व भी जनजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
विश्व जनसंख्या दिवस हमें यह संदेश देता है कि मानव संख्या नहीं, बल्कि मानव गुणवत्ता किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होती है। भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी है। यदि इस युवा शक्ति को ज्ञान, विज्ञान, कौशल, संस्कार और अवसरों से सशक्त बनाया गया, तो भारत न केवल विकसित राष्ट्र बनेगा बल्कि विश्व के सतत और समावेशी विकास का मार्गदर्शक भी सिद्ध होगा।
अंततः यह कहना उचित होगा कि बढ़ती जनसंख्या को केवल समस्या के रूप में देखना उचित नहीं है। सही नीतियों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास और पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से यही जनसंख्या भारत के उज्ज्वल भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। विश्व जनसंख्या दिवस हमें इसी दिशा में सामूहिक संकल्प लेने की प्रेरणा देता है कि हम ऐसी विकास यात्रा का निर्माण करें, जिसमें प्रत्येक नागरिक सम्मानपूर्वक जीवन जी सके और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, समृद्ध और संतुलित विश्व का निर्माण हो।