डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
जंगल की मिट्टी से उठकर, जनमन में जो दीप जला गया,
अन्याय और अत्याचारों से, जो निर्भय होकर टकरा गया।
धरती आबा कहलाया वह, जन-जन का अभिमान बना,
बिरसा मुंडा अमर रहेंगे, भारत का स्वाभिमान बना।
भारत के जनजातीय इतिहास में 9 जून का दिन विशेष महत्व रखता है। यह वह दिन है जब महान जननायक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और जनजातीय चेतना के अग्रदूत भगवान बिरसा मुंडा ने अपने प्राण मातृभूमि और समाज के लिए समर्पित कर दिए। जनजातीय समाज उन्हें श्रद्धापूर्वक "धरती आबा" अर्थात पृथ्वी पिता के रूप में स्मरण करता है। उनकी पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर नहीं है, बल्कि उनके विचारों, संघर्षों और आदर्शों को पुनः स्मरण करने का भी समय है।
15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड के उलिहातू गांव में जन्मे बिरसा मुंडा ने बहुत कम आयु में ही जनजातीय समाज पर हो रहे शोषण, अन्याय और उत्पीड़न को निकट से देखा। अंग्रेजी शासन, जमींदारी व्यवस्था और साहूकारों के अत्याचारों ने आदिवासी समुदाय के जीवन को कठिन बना दिया था। ऐसे समय में बिरसा मुंडा ने केवल विरोध का मार्ग नहीं चुना, बल्कि जनजागरण का अभियान प्रारंभ किया। उन्होंने समाज को शिक्षा, स्वच्छता, नशामुक्ति, संगठन और आत्मसम्मान का संदेश दिया।
बिरसा मुंडा का प्रसिद्ध उद्घोष "अबुआ दिशुम, अबुआ राज" अर्थात "हमारा देश, हमारा शासन" आज भी आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने जनजातीय समाज को यह विश्वास दिलाया कि वे अपनी संस्कृति, परंपराओं और अधिकारों की रक्षा स्वयं कर सकते हैं। यही कारण है कि वे केवल एक आंदोलनकारी नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रतीक भी बन गए।
उनके नेतृत्व में चला "उलगुलान" अर्थात महाविद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह आंदोलन केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं था, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा का व्यापक अभियान था। बिरसा मुंडा ने जनजातीय समाज को संगठित कर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का साहस दिया। यद्यपि 9 जून 1900 को रांची कारागार में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचारों की ज्योति कभी नहीं बुझी।
आज जब भारत विकास के नए आयाम स्थापित कर रहा है, तब बिरसा मुंडा के विचार पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। वैश्वीकरण और आधुनिकता के इस दौर में सांस्कृतिक अस्मिता और स्थानीय परंपराओं के संरक्षण की चुनौती हमारे सामने है। बिरसा मुंडा हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और अपनी पहचान पर गर्व करने की प्रेरणा देते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी उनका जीवन विशेष महत्व रखता है। जनजातीय जीवन प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का जीवन है। वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की समस्याओं से जूझ रही है, तब बिरसा मुंडा का प्रकृति-केन्द्रित जीवन दर्शन मानवता को संतुलित विकास का मार्ग दिखाता है।
सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की अवधारणा भी उनके विचारों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति के अधिकारों की बात की और वंचित समुदायों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया। आज का लोकतांत्रिक भारत भी इसी भावना को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
युवा पीढ़ी के लिए बिरसा मुंडा का जीवन एक प्रेरणापुंज है। उन्होंने अल्पायु में ही यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ संकल्प, साहस और समाज के प्रति समर्पण से बड़े से बड़ा परिवर्तन संभव है। आज के युवाओं को उनसे संघर्षशीलता, नेतृत्व क्षमता, सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक गौरव की प्रेरणा लेनी चाहिए। व्यक्तिगत सफलता के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान देना ही बिरसा मुंडा के जीवन का वास्तविक संदेश है।
भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें, समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करें, प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। धरती आबा का जीवन हमें यह सिखाता है कि अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हुए कर्तव्यों का निर्वहन करना ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।
बिरसा मुंडा केवल इतिहास का एक नाम नहीं हैं, बल्कि जनजातीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रभक्ति के ऐसे अमर प्रतीक हैं, जिनकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन देती रहेगी। उनकी पुण्यतिथि पर समस्त राष्ट्र उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है।