घटती जन्मदर और बदलता भारतीय समाज

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    08-Jun-2026
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घटती जन्मदर और बदलता भारतीय समाज 
 
 
 
-दीपक कुमार द्विवेदी
 
 
भारत के सामने आने वाला सबसे बड़ा संकट केवल आर्थिक नहीं है, केवल राजनीतिक नहीं है और केवल सामाजिक भी नहीं है। यह आने वाले समय का जनसांख्यिकीय और सभ्यतागत संकट है। दुर्भाग्य यह है कि भारत अभी भी इस विषय को गंभीरता से समझने को तैयार नहीं दिखता। आज भी देश में बड़ी संख्या में लोग “जनसंख्या विस्फोट” की पुरानी मानसिकता में जी रहे हैं, जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत दिशा में जा चुकी है।
 
 
कुछ दिन पहले अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और जनसांख्यिकीय अध्ययनों के आधार पर यह तथ्य सामने आया कि भारत की कुल प्रजनन दर अर्थात Total Fertility Rate (TFR) घटकर 1.9 तक पहुँच गई है। जबकि जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए 2.1 की दर आवश्यक मानी जाती है। इससे भी अधिक गंभीर स्थिति दिल्ली जैसे महानगरों की है जहाँ यह दर 1.2 तक पहुँच चुकी है। विश्व प्रसिद्ध उद्योगपति Elon Musk ने भी इस विषय को लेकर सोशल मीडिया मंच X पर चिंता व्यक्त की।
 
 
बहुत से लोग इस आँकड़े का अर्थ ही नहीं समझ पा रहे। सरल शब्दों में समझिए यदि किसी समाज में प्रत्येक दंपत्ति औसतन दो से कम बच्चे पैदा करेगा, तो कुछ दशकों बाद उस समाज की जनसंख्या तेजी से बूढ़ी होने लगेगी। युवा कम होंगे, बुजुर्ग अधिक होंगे, काम करने वाले हाथ घटेंगे और आश्रित लोगों की संख्या बढ़ जाएगी। यही स्थिति आज जापान, दक्षिण कोरिया, इटली, जर्मनी और चीन जैसे देशों में दिखाई दे रही है।
 
 
भारत में एक समय “हम दो हमारे दो” का नारा आधुनिकता का प्रतीक बनाकर चलाया गया। विद्यालयों में “जनसंख्या विस्फोट” पर निबंध लिखवाए जाते थे। समाचार पत्रों में लेख छपते थे कि भारत की सबसे बड़ी समस्या बढ़ती आबादी है। सरकारी दीवारों पर नारे लिखे जाते थे “छोटा परिवार, सुखी परिवार।” कई राज्यों में दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को पंचायत चुनाव लड़ने तक से रोका गया। उस समय यह बताया गया कि यदि जनसंख्या नहीं रुकी तो भारत भूखा मर जाएगा।
 
 
आज वही लोग कह रहे हैं कि जनसंख्या घट रही है और भविष्य में भारत भी जापान बन सकता है। यही पश्चिमी मॉडल की सबसे बड़ी समस्या है। पहले भय पैदा करो, फिर उसी भय के आधार पर समाज को दिशा दो, और जब उसका दुष्परिणाम सामने आए तो नया सिद्धांत लेकर आ जाओ।
 
 
जापान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहाँ दशकों तक लोगों को कम बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित किया गया। परिणाम यह हुआ कि आज जापान में लाखों घर खाली पड़े हैं। गाँव समाप्त हो रहे हैं। युवा विवाह नहीं कर रहे। वहाँ “कोडोकुशी” जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है जहाँ बुजुर्ग अकेले घरों में मर जाते हैं और कई दिनों तक किसी को पता तक नहीं चलता। जापान की सरकार युवाओं को विवाह करने और बच्चे पैदा करने के लिए आर्थिक सहायता दे रही है, लेकिन परिवार व्यवस्था इतनी कमजोर हो चुकी है कि समाज वापस सामान्य स्थिति में नहीं लौट पा रहा।
 
 
चीन ने 1980 में “वन चाइल्ड पॉलिसी” लागू की थी। वहाँ सरकार लोगों पर एक ही बच्चा पैदा करने का दबाव डालती थी। करोड़ों परिवारों ने उसी नीति का पालन किया। आज वही चीन गंभीर संकट में है। चीन की श्रमशक्ति घट रही है। वृद्धजन तेजी से बढ़ रहे हैं। अब चीन की सरकार लोगों से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील कर रही है। यही स्थिति यूरोप की है। इटली और जर्मनी जैसे देशों में मूल जनसंख्या घट रही है। कई देशों में चर्च बंद हो रहे हैं क्योंकि नई पीढ़ी ही नहीं बच रही।
 
 
भारत भी उसी दिशा में बढ़ रहा है, लेकिन यहाँ संकट और अधिक गंभीर है क्योंकि भारत की आत्मा उसकी परिवार व्यवस्था में बसती है। पश्चिम में व्यक्ति केंद्र में है, भारत में परिवार केंद्र में रहा है। पश्चिम कहता है “मेरा जीवन, मेरी इच्छा।” भारत कहता था “परिवार, समाज और वंश की निरंतरता।” यही कारण था कि भारत हजारों वर्षों तक स्थिर सभ्यता बना रहा।
 
 
पहले भारतीय परिवारों में चार-पाँच बच्चे सामान्य बात माने जाते थे। गाँवों में एक कहावत प्रचलित थी “घर में चार बच्चे, सबको लगें अच्छे।” अधिक बच्चे बोझ नहीं बल्कि परिवार की शक्ति माने जाते थे। संयुक्त परिवार में दादा-दादी, चाचा-ताऊ, भाई-बहन सब मिलकर बच्चों का पालन करते थे। परिवार सामाजिक सुरक्षा का केंद्र था। किसी वृद्धाश्रम की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।
 
 
लेकिन पिछले कुछ दशकों में पश्चिमी मॉडल को भारत पर उसी रूप में थोप दिया गया। नारीवाद, व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद को आधुनिकता का प्रतीक बना दिया गया। परिणाम यह हुआ कि विवाह बोझ लगने लगा, मातृत्व करियर का शत्रु बताया जाने लगा और परिवार “पितृसत्तात्मक व्यवस्था” घोषित कर दिया गया।
 
 
आज महानगरों में स्थिति यह है कि लोग विवाह से बच रहे हैं। एक बच्चा पैदा करना भी कठिन मान रहे हैं। कारण केवल मानसिकता नहीं है, आर्थिक व्यवस्था भी है। शिक्षा इतनी महँगी हो चुकी है कि सामान्य वेतन पाने वाला व्यक्ति एक बच्चे का पालन करने में संघर्ष कर रहा है। निजी विद्यालयों की फीस, कोचिंग, चिकित्सा खर्च और महँगी जीवनशैली ने परिवार निर्माण को कठिन बना दिया है।
 
 
इसके साथ-साथ परिवारों को तोड़ने वाले कानूनों और सामाजिक वातावरण ने भी स्थिति को खराब किया। दहेज कानूनों के दुरुपयोग पर सर्वोच्च न्यायालय तक टिप्पणी कर चुका है। वैवाहिक विवाद तेजी से बढ़े हैं। तलाक सामान्य बात बनता जा रहा है। “माय बॉडी माय चॉइस” का नारा अधिकारों की बात करता है, लेकिन कर्तव्य की नहीं। आज समाज में हर व्यक्ति अधिकार चाहता है, लेकिन परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की चर्चा नहीं होती।
 
 
सबसे दुखद बात यह है कि भारतीय समाज की आर्थिक आत्मनिर्भरता भी नष्ट कर दी गई। हमारे यहाँ पीढ़ियों से कौशल आधारित व्यवस्था थी। बढ़ई का बेटा बचपन से बढ़ईगिरी सीखता था। व्यापारी का बेटा व्यापार सीखता था। किसान का पुत्र खेती सीखता था। किराना चलाने वाला परिवार अपने बच्चों को उसी काम का अनुभव देता था। यही वास्तविक स्किल डेवलपमेंट था।
 
 
फिर पश्चिमी और वामपंथी विचारधारा ने इसे “बालश्रम” और “जातिगत उत्पीड़न” बताना शुरू किया। लोगों को कहा गया कि पारंपरिक काम छोड़ो और केवल डिग्री लो। परिणाम यह हुआ कि करोड़ों युवाओं के हाथ में कागज की डिग्रियाँ आ गईं लेकिन कौशल समाप्त हो गया।
 
 
मैंने स्वयं नई शिक्षा नीति 2020 के बाद बी.ए. में वोकेशनल कोर्स लिया। कागजों में बहुत बड़े दावे किए गए कि कौशल सिखाया जाएगा, रोजगार मिलेगा, व्यावहारिक शिक्षा दी जाएगी। लेकिन वास्तविकता यह रही कि पूरे पाठ्यक्रम में केवल औपचारिकता हुई। न कोई वास्तविक प्रशिक्षण मिला, न कोई व्यावहारिक अनुभव। केवल परीक्षा देकर अंक प्राप्त कर लिए। तब मुझे समझ आया कि जो कौशल पहले परिवार और समाज स्वाभाविक रूप से सिखा देता था, आज उसी को सरकारी ढाँचे में “स्किल डेवलपमेंट” नाम देकर दोबारा बेचने का प्रयास किया जा रहा है।
 
 
यही पश्चिमी मॉडल की वास्तविकता है। पहले पारंपरिक व्यवस्था तोड़ो, फिर उसी को नए नाम से वापस लाओ। पहले कहा गया परिवार छोटा करो, अब कहा जा रहा है जन्मदर बढ़ाओ। पहले कहा गया परंपरागत व्यवसाय पिछड़ेपन की निशानी हैं, अब कहा जा रहा है स्किल डेवलपमेंट आवश्यक है।
 
 
इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम हिंदू समाज भुगत रहा है। छोटे व्यापारों और श्रम आधारित कार्यों में धीरे-धीरे हिंदुओं की भागीदारी घटती गई। लोग सरकारी नौकरी और आरक्षण आधारित व्यवस्था पर निर्भर होते गए। आज स्थिति यह है कि युवा कौशल से अधिक प्रमाणपत्रों के पीछे भाग रहा है। सामाजिक असंतोष बढ़ रहा है। आरक्षण आंदोलनों में हिंसा हो रही है। जातीय तनाव बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर समाज को बाँटने का काम हो रहा है।
 
 
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका परिवार था। यदि परिवार टूट गया तो समाज भी टूट जाएगा। पश्चिम की सबसे बड़ी विफलता यही है कि वहाँ व्यक्ति तो बच गया लेकिन परिवार समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप समाज अकेला, मानसिक रूप से बीमार और जनसंख्या संकट से ग्रस्त हो गया।
 
 
सनातन व्यवस्था इसलिए सफल रही क्योंकि उसने जीवन को संतुलन के साथ देखा। यहाँ धर्म केवल पूजा नहीं था, जीवन पद्धति था। यहाँ विवाह केवल अनुबंध नहीं था, संस्कार था। यहाँ संतान केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं थी, वंश और समाज की निरंतरता थी। यहाँ वृद्ध बोझ नहीं थे, परिवार की धुरी थे।
 
 
यदि भारत ने अभी भी चेतावनी नहीं समझी, तो आने वाले कुछ दशकों में भारत भी उसी दिशा में जा सकता है जहाँ आज जापान और यूरोप खड़े हैं घटती युवा आबादी, टूटते परिवार, अकेले बुजुर्ग और सांस्कृतिक रिक्तता।
 
 
भारत को यदि बचाना है तो केवल अर्थव्यवस्था नहीं, परिवार व्यवस्था बचानी होगी। मातृत्व का सम्मान पुनः स्थापित करना होगा। बच्चों को बोझ नहीं, भविष्य की शक्ति मानना होगा। शिक्षा को डिग्री नहीं, कौशल और संस्कार से जोड़ना होगा। अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ केवल यह पढ़ेंगी कि कभी भारत नाम की एक सभ्यता थी, जिसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका परिवार हुआ करता था।