डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार
भारत में धार्मिक स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है। प्रत्येक समुदाय को अपने धार्मिक पर्व मनाने, पूजा-पद्धति अपनाने और परंपराओं का पालन करने की स्वतंत्रता है, किंतु जब यही धार्मिक आयोजन हिंसा, उत्पीड़न, धमकी और खून-खराबे का माध्यम बनने लगें, तब समाज और शासन दोनों के लिए गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
भारत में कथित इस्लाम की जिहादी मानसिकता ने पिछले दो वर्षों में बकरीद, मुहर्रम और अन्य मजहबी आयोजनों के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी अनेक घटनाओं को अंजाम दिया हैं, जिनमें हिंदू नागरिकों को निशाना बनाया गया। कहीं हत्या हुई, कहीं हत्या का प्रयास, कहीं चंदा न देने पर मारपीट हुई तो कहीं जुलूसों के नाम पर उत्पात और तोड़फोड़ देखने जैसी घटनाएं सामने आईं।
28 मई 2026 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में हुई सूर्या प्रताप चौहान की निर्मम हत्या ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कुछ कट्टरपंथी तत्व धार्मिक त्योहारों को हिंसा का मंच बना रहे हैं? प्रस्तुत रिपोर्ट 2024 से 2026 के बीच सामने आई ऐसी 12 प्रमुख घटनाओं का दस्तावेज है, जोकि भारत में उन तमाम लोगों की आंखें खोल देनेवाली हैं, जो जिहादी मानसिकता को नकारते आए हैं!
क्या कभी बकरा हलाल होते देखा है?- और फिर चाकुओं से गोदकर हत्या
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में 28 मई 2026 को सामने आई इस हत्या की वारदात ने एक बार फिर देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। बकरीद की शाम गाजियाबाद के खोड़ा क्षेत्र में 17 वर्षीय छात्र सूर्या प्रताप चौहान को उसके पूर्व परिचित मोहम्मद असद ने फोन कर बुलाया। मुलाकात के दौरान असद ने पहले पूछा, “क्या कभी बकरा हलाल होते देखा है?” और इसके बाद उस पर ताबड़तोड़ चाकुओं से हमला कर दिया।
गंभीर रूप से घायल सूर्या को अस्पताल ले जाया गया, जहां अगले दिन उसकी मृत्यु हो गई। मुख्य आरोपी असद बाद में पुलिस मुठभेड़ में घायल हुआ और उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। इसी तरह की घटना बकरीद के दिन उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से 27 मई 2026 को सामने आई, यहां कथित इस्लामिक भीड़ ने हिंदू युवक की जान ले ली।
यहां घटना में सामने आया कि अहिरौला गांव में बाइक घुमाने जैसे मामूली विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। आरोप है कि मुस्लिम युवकों और उनके परिजनों ने हिंदू युवक धनराज मौर्य को घेरकर बेरहमी से पीटा। गंभीर रूप से घायल धनराज को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। घटना के बाद परिजनों और स्थानीय संगठनों ने आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर प्रदर्शन किया, लेकिन मामले में अब भी कई आरोपी फरार बताए जा रहे हैं।
मुहर्रम के दौरान हिंसा की श्रृंखला
बिहार के मोतिहारी से 6 जुलाई 2025 को सामने आई घटना में ताजिया जुलूस में अजय यादव की तलवार से हत्या कर दी गई। दरअसल, मुहर्रम के ताजिया जुलूस के दौरान 22 वर्षीय अजय यादव अपने परिजनों के साथ जुलूस देख रहे थे। इसी दौरान विवाद बढ़ा और आरोप है कि निजामुद्दीन मियां ने तलवार से उनके सिर और गर्दन पर वार कर दिया। अजय की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो गई। पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया।
पश्चिम बंगाल के बीरभूम से सामने आई प्रकरण में 4 जुलाई 2025 को चंदा देने से इनकार किया तो ई-रिक्शा चालक पर हमला बोल दिया गया। इस प्रकरण में सामने आया है कि बेदन घोष नामक हिंदू ई-रिक्शा चालक से मुहर्रम के लिए दोबारा चंदा मांगा गया। उसने बताया कि वह पहले ही चंदा दे चुका है, इसलिए पुनः देने से इनकार कर दिया। इसके बाद कुछ लोगों ने उस पर हमला कर दिया। उसके सिर पर पत्थर मारा गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया और अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
रायबरेली में जुलूस के दौरान हिंसा और तोड़फोड़
उत्तर प्रदेश के रायबरेली में 4 जुलाई 2025 के दिन कुढ़ा गांव में बिना अनुमति निकाले गए मुहर्रम जुलूस के दौरान तनाव उत्पन्न हुआ। स्थानीय लोगों द्वारा विरोध किए जाने पर हालात बिगड़ गए। भीड़ ने लाठी-डंडों और अन्य हथियारों से हमला किया तथा संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया।
इसी तरह के एक मामले में उत्तर प्रदेश के सीतापुर में 5 जुलाई 2025 को दुकान के सामने रखी ईंट हिंसा की वजह बन गई। मुहर्रम जुलूस के दौरान ताजिया मार्ग में बाधा बताकर एक हिंदू दुकानदार से ईंट हटाने को कहा गया। दुकानदार के इनकार करने पर उसके साथ मारपीट की गई। स्थानीय लोगों के अनुसार, भीड़ ने लाठी-डंडों का प्रयोग किया। पुलिस के पहुंचने पर हमलावर मौके से भाग गए।
जिहादी पुलिस पर भी हमला करने से नहीं चूके
बिहार में तो ये कथित इस्लामिक जिहादी पुलिस पर भी हमला करने से नहीं चूके। यहां दरभंगा में अधिकारी पर 5 जुलाई 2025 के दिन चाकू से हमला बोल दिया गया। दरअसल, मुहर्रम जुलूस में उपद्रव की सूचना पर पुलिस पहुंची, वह मामले को शांत कराने में जुटी थी, तभी मोहम्मद रब्बानी नामक व्यक्ति ने एएसआई अमित कुमार पर चाकू से वार कर दिया। गंभीर रूप से घायल अधिकारी को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज में 6 जुलाई 2025 भाजपा नेता को घेरकर पीटा गया गया, जबकि उनका कहीं कोई दोष नहीं था, वह तो अपने घर लौट रहे थे। इस प्रकरण में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता शिवभूषण चौबे को मुहर्रम जुलूस के दौरान घेरकर मारपीट की गई, जिसमें कि स्थिति बिगड़ने पर पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। भाजपा नेता का मेडिकल कराया गया। तीन लोगों को हिरासत में लिया गया।
उत्तर प्रदेश से ही एक घटना कुशीनगर से 6 जुलाई 2025 को सामने आई, यहां नारेबाजी को लेकर झड़प और भगदड़ तक हो गई। घटना के बारे में सामने आया है कि टेकुआटार बाजार में मुहर्रम जुलूस के दौरान नारेबाजी को लेकर विवाद शुरू हुआ। देखते ही देखते कहासुनी झड़प में बदल गई। माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि भगदड़ मच गई, जिसमें एक बच्चा घायल हो गया। पुलिस ने बल प्रयोग कर स्थिति नियंत्रित की।
एकादशी पाठ भी बना जिहादियों का शिकार
राजस्थान के धौलपुर में तो एकादशी पाठ करना भी कथित मुसलमानों को सहन नहीं हुआ, 6 जुलाई 2025 को सामने आई इस घटना में पता चला कि मांगरोल कस्बे में एकादशी पाठ चल रहा था, उसी दौरान ताजिया जुलूस में शामिल लोगों ने डीजे की आवाज तेज कर दी। विरोध होने पर तनाव बढ़ा, मारपीट की स्थिति बनने लगी। फिर आखिर में पुलिस ने हस्तक्षेप कर स्थिति को नियंत्रित में लिया।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी से 6 जुलाई 2025 को सामने आए घटनाक्रम में हिंदू घरों में घुसकर मारपीट की गई। यह सब भी मुहर्रम जुलूस के दौरान ही हुआ। बताया जाता है कि पूरा विवाद सफेद पाउडर फेंकने को लेकर शुरू हुआ। विरोध करने पर स्थानीय हिंदू परिवारों के साथ मारपीट किए जाने का आरोप लगा। घटना के बाद गांव में तनाव फैल गया और भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।
इसी तरह से एक घटना बिहार के समस्तीपुर में घटी, 14 जुलाई 2024 को एक हिन्दू परिवार पर तलवारों और लाठियों से हमला कर दिया गया। यह हमला मुहर्रम जुलूस के दौरान कार को रोककर किया गया। हमलावरों ने लाठियों और तलवारों से वाहन पर प्रहार किया। कार के शीशे तोड़ दिए गए और परिवार के सदस्य घायल हो गए। घटना ने क्षेत्र में भारी चिंता और तनाव पैदा कर दिया था।
जिहादी मनोवृति पर भी बुलडोजर जरूरी
इन घटनाओं पर विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार का कहना है कि जघन्य घटनाओं पर पूर्ण विराम के साथ जिहादी मनोवृति पर भी बुलडोजर जरूरी है। क्योंकि नाबालिग हिंदू युवक सूर्य चौहान की ईद पर कुर्बानी के नाम पर की गई निर्मम हत्या सहित हाल के वर्षों में हिंदू समाज को लक्षित कर हुई अनेक हिंसक घटनाएं घटी हैं। ये सभी गाजियाबाद, दिल्ली और उदयपुर जैसी घटनाएँ किसी सामान्य आपराधिक प्रवृत्ति का परिणाम नहीं हैं, बल्कि ऐसी जिहादी कट्टरपंथी मानसिकता की अभिव्यक्ति हैं जो हिंदुओं के प्रति घृणा और हिंसक मनोवृति को दर्शाती हैं।
उन्होंने कहा, “सूर्य चौहान की निर्मम हत्या, दिल्ली के उत्तम नगर में होली के अवसर पर तरुण की हत्या, उदयपुर में विद्यालय परिसर में छात्र देवराज पर हुए प्राणघातक हमले तथा महाराष्ट्र में उमेश कोल्हे की हत्या जैसी घटनाओं में एक समान प्रवृत्ति दिखाई देती है और वह है- धार्मिक पहचान के आधार पर वैमनस्य, असहिष्णुता और हिंसा का नग्न प्रदर्शन।”
यह पूरे समाज के लिए चेतावनी का विषय
वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार कहते हैं कि यदि किसी युवक को केवल इसलिए मार दिया जाए कि वह हिंदू है अथवा दोस्ती के रिश्ते और विद्यालय जैसे पवित्र स्थान में बच्चों के बीच भी कट्टरता और हिंसा प्रवेश कर जाए, तो यह पूरे समाज के लिए चेतावनी का विषय है। ऐसे घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि जिहादी कट्टरपंथी सोच का विष समाज के विभिन्न स्तरों तक पहुँच रहा है।
उन्होंने कहा, अब सभी को समझना होगा कि हिंसा, आतंक और जिहादी कट्टरवाद की अवधारणा का आधुनिक विश्व में कोई स्थान नहीं हो सकता। ऐसी गंभीर घटनाओं को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना भी पर्याप्त नहीं होगा। ये विश्व शांति और सामाजिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा हैं।
अपराधों पर मौन रहने के लिए समाज भी दोषी
आलोक कुमार इन जघन्य घटनाओं पर मौन रहने के लिए समाज को भी दोषी मानते हैं, उन्होंने कहा कि जितने दोषी ऐसे कृत्य करने वाले लोग हैं, उतने ही दोषी वे लोग भी हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हें वैचारिक संरक्षण प्रदान करते हैं, उनके अपराधों पर पर्दा डालते हैं या सुविधानुसार मौन धारण कर लेते हैं।
वे कहते हैं कि समाज को यह प्रश्न पूछना चाहिए कि जब पीड़ित हिंदू समाज का व्यक्ति होता है तब तथाकथित सेक्युलर समूहों, मानवाधिकारवादियों और अनेक राजनीतिक दलों की आवाज क्यों बंद हो जाती है। यह चयनात्मक मौन न सिर्फ नैतिक दिवालियापन है, बल्कि कट्टरपंथ को प्रोत्साहन देने का माध्यम भी बनता है।
क्या यह केवल संयोग है?
इन 12 घटनाओं को अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग परिस्थितियों की घटनाएं कहकर नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन जब बार-बार मजहबी आयोजनों के दौरान हत्या, मारपीट, चंदा वसूली, उत्पात, पुलिस पर हमला और सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं सामने आती हैं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह जाता।
इस संबंध में एडवोकेट आशुतोष कुमार झा ने कहा, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या धार्मिक आयोजनों के नाम पर कानून को चुनौती देने वाले तत्वों के खिलाफ समान कठोरता दिखाई जा रही है? यदि होली के रंग, दीपावली के पटाखे या अन्य हिंदू परंपराएं सार्वजनिक विमर्श में कठोर जांच के दायरे में आ सकती हैं, तो फिर इस्लामिक मजहबी त्योहारों के दौरान होने वाली हिंसा और अराजकता पर भी उतनी ही गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
झा के अनुसार, त्योहार आनंद, शांति और सामाजिक सौहार्द का माध्यम होने चाहिए, भय और हिंसा का नहीं। कानून का शासन तभी मजबूत माना जाएगा, जब अपराधी की पहचान उसके धर्म से नहीं, उसके अपराध से तय होगी और पीड़ित को न्याय उसकी आस्था देखकर नहीं, उसके अधिकार के आधार पर मिलेगा।