आपात काल की विभीषिका और संघ का दृष्टिकोण

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    25-Jun-2026
Total Views |
aapatkal
 
 
डॉ.आनंद सिंह राणा
इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत
 
 
25 जून 1975 कि वह रात केवल लोकतंत्र के इतिहास की एक तारीख नहीं थी,वरन् भारतीय गणराज्य की आत्मा पर पड़ी एक ऐसी भयानक काली रात थी, जो अनादि काल तक भावी पीढ़ीयों में भी कटु स्मृति के रुप में विद्यमान रहेगी। 25 जून सन् 1975 को रात ठीक 11बजकर 45 मिनिट पर भारत पर श्रीमती इंदिरा गाँधी अवैधानिक रुप से आपातकाल थोप दिया गया। आपातकाल के नाम पर तानाशाही स्थापित कर लोकतंत्र और संविधान की हत्या कर दी गई।
 
 
ऐसी भयावह परिस्थितियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर 4 जुलाई 1975 को प्रतिबंध लगा दिया गया। संघ के लिए यह नई बात नहीं थी, इसके पूर्व भी वह प्रतिबंध झेल चुका था। हर बार की तरह इस बार भी संघ ने बिना प्रतिशोध और हिंसा के,विवेक और आत्म संयम के साथ सामना किया। परंतु इस बार उल्लेखनीय बात यह थी कि संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने पुणे की यरवदा जेल से सीधे प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को पत्र लिखा।
 
 
यह केवल पत्र नहीं है वरन् अमूल्य दस्तावेज है जो संघ के सर्व समावेशी दृष्टिकोण पर प्रकाश डालता है। पत्र की शैली आलोचनात्मक है,परंतु अत्यंत मर्यादित है। पत्र का आरंभ सौम्य कटाक्ष के साथ होता है और लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई का प्रतीक बन जाता है। पत्र में इंदिरा गांधी को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनके निर्वाचन को वैध ठहराने को लेकर बधाई दी जाती है, जो वास्तव में इंदिरा गांधी के लिए प्रसन्नता का विषय नहीं है,क्योंकि श्रीमती इंदिरा गांधी सांसद तो रह सकती हैं परंतु किसी भी संसदीय कार्यवाही में भाग नहीं ले सकती हैं और ना ही उस रुप में पारिश्रमिक प्राप्त कर सकती हैं।
 
 
सरसंघचालक बालासाहब देवरस इस पत्र में न केवल संघ पर लगाए गए आरोपों का खंडन करते हैं, वरन् श्रीमती इंदिरा गांधी और कांग्रेस द्वारा प्रकारान्तर से संघ को 'फासीवाद' कहकर बदनाम किये जाने के विरुद्ध ,फासीवाद को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि " वह सत्ता जो समाजवाद का मुखौटा पहनकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलती है, विपक्ष को मिटाने का प्रयास करती है, प्रेस पर सेंसरशिप थोपती है और असहमति को अपराध बना देती है।" इस तरह सरसंघचालक बाला साहब देवरस जी कांग्रेस को फासीवाद का आईना दिखाते हुए उसका पर्याय कौन है? स्पष्ट कर देते हैं।
 
 
पत्र में उन्होंने संघ को मुसलमान और ईसाइयों के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास का भी युक्तिसंगत उत्तर दिया है। बाला साहब देवरस ने पत्र में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लोकनायक जयप्रकाश नारायण को 'सी.आई.ए.एजेंट' और 'देशद्रोही' कहे जाने पर असहमति दर्ज करते हुए,उन्हें सच्चा देशभक्त बताया है।
 
 
यह पत्र विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। यह पत्र संघ की कार्यशैली और चिंतन को स्पष्ट करती है,जहां विरोध का अर्थ अराजकता नहीं वरन् विवेक पूर्ण प्रतिवाद होता है। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि संघ ने कभी आपातकाल का समर्थन नहीं किया था।
 
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में 26 जून 2025 को आपातकाल की 50 वीं बरसी पर अपने उदगार व्यक्त करते हुए कहा था कि "भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा आघात था। यह कार्यक्रम उन घटनाओं की स्मृति मात्र नहीं है जो आधी सदी पूर्व घटी थीं। बल्कि वर्तमान पीढ़ी को यह बताने का माध्यम भी है कि तानाशाही प्रवृत्तियां कितनी खतरनाक होती हैं।"
 
 
उन्होंने आगे कहा कि आज की पीढ़ी को समझना होगा कि सन् 1975 में जब आपातकाल लागू हुआ तब किस प्रकार सत्ता के रूप में डूबी मानसिकता ने लोकतंत्र को कुचलना का प्रयास किया संविधान को किनारे रखकर मौलिक अधिकारों का दमन किया। प्रेस की स्वतंत्रता छीन ली गई विपक्ष को जेलों में डाल दिया गया और देश में भय का वातावरण निर्मित हुआ।
 
 
आपातकाल के संदर्भ में हमने पहले भी बताया है। हम बताते रहेंगे,हमारे लिए तो ये पुरानी यादें हैं, लेकिन 'एलुमनी एसोसिएशन' बनाकर आपातकाल की बरसी मनाने का कोई अर्थ नहीं। हमें वर्तमान पीढ़ी को इस बारे में कैसे बताना है इसकी योजना बनानी चाहिए।आज का भारत 1975 के भारत से बहुत आगे है, लेकिन अगर हम भूल गए कि किस प्रकार सत्ता ने लोकतंत्र को रौंदा था,तो यह ठीक नहीं होगा। लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी केवल राजनीतिक दलों की नहीं बल्कि समाज के हर अंग की है।
 
 
सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने स्पष्ट किया कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आपातकाल के दौरान भारत की आत्मा पर हमला हुआ था। लेकिन यह भी सच है कि भारत की जनता ने उस हमले का उत्तर अपने लोकतांत्रिक आचरण से दिया।चुनाव हुए,सत्ता बदली और दुनिया को दिखा दिया गया कि भारत के लोग तानाशाही को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं कर सकते।
 
 
विंस्टन चर्चिल ने कभी कहा था कि भारत लोकतंत्र के योग्य नहीं है, लेकिन हमने दिखाया कि भारतीय नागरिक अवसर आने पर लोकतंत्र के रक्षक बनते हैं, बलिदान देते हैं,और उसे जीवित रखते हैं। इतिहास केवल स्मरण के लिए नहीं होता आपातकाल केवल एक बीता हुआ अध्याय नहीं है। यह एक चेतावनी है। यह हर उस प्रवृत्ति के खिलाफ अलार्म है,जो लोकतंत्र के मूल्यों को कुचलना चाहती है। आज भी वे लोग सक्रिय हैं जिन्होंने देश पर आपातकाल थोपा था। आज भी उन्होंने माफी नहीं मांगी है।आज भी उसे काले अध्याय को न्यायोचित करने के प्रयास हो रहे हैं।
आपातकाल केवल सत्ता का दमन नहीं था,यह विचारों पर हमला था। उस कालखंड में जो संघर्ष हुआ वह केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि वह भारत के आत्म सम्मान का संघर्ष था। यह देश के लोकतंत्र को बचाने का संग्राम था।
 
 
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आपातकाल के दौरान भारत की आत्मा पर हमला हुआ था। लेकिन यह भी सच है कि भारत की जनता ने उस हमले का उत्तर अपने लोकतांत्रिक आचरण से दिया।चुनाव हुए,सत्ता बदली और दुनिया को दिखा दिया गया कि भारत के लोग तानाशाही को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं कर सकते विंस्टन चर्चिल ने कभी कहा था कि भारत लोकतंत्र के योग्य नहीं है। लेकिन हमने दिखाया कि भारतीय नागरिक अवसर आने पर लोकतंत्र के रक्षक बनते हैं बलिदान देते हैं और उसे जीवित रखते हैं। इतिहास केवल स्मरण के लिए नहीं होता आपातकाल केवल एक बीता हुआ अध्याय नहीं है। यह एक चेतावनी है। यह हर उस प्रवृत्ति के खिलाफ अलार्म है,जो लोकतंत्र के मूल्यों को कुचलना चाहती है। आज भी वे लोग सक्रिय हैं जिन्होंने देश पर आपातकाल थोपा था। आज भी उन्होंने माफी नहीं मांगी है।आज भी उसे काले अध्याय को न्यायोचित करने के प्रयास हो रहे हैं।