अदृश्य नशे के जाल में भारत के युवा

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    25-Jun-2026
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आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।
 
 
कुछ दशक पहले तक जब नशे की चर्चा होती थी तो लोगों के मन में शराब, तंबाकू, अफीम, गांजा या अन्य मादक पदार्थों की छवि उभरती थी। नशे को पहचानना आसान था क्योंकि उसके स्पष्ट संकेत दिखाई देते थे। व्यक्ति की चाल बदल जाती थी, व्यवहार असामान्य हो जाता था और उसका स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगता था। लेकिन इक्कीसवीं सदी में एक ऐसा नशा जन्म ले चुका है जो न तो बोतल में मिलता है, न किसी पुड़िया में और न ही उसकी कोई गंध होती है। यह नशा हमारी जेब में रखा रहता है, हमारे हाथों में चमकता है और दिन रात हमारी चेतना पर कब्जा करता रहता है। यह है डिजिटल नशा।
 
 
आज का दृश्य किसी भी परिवार में देखा जा सकता है। घर में सभी सदस्य उपस्थित हैं, लेकिन संवाद अनुपस्थित है। माता पिता अपने मोबाइल में व्यस्त हैं, बच्चे वीडियो गेम या सोशल मीडिया में खोए हुए हैं और परिवार का सामूहिक जीवन धीरे धीरे स्क्रीन की रोशनी में विलीन होता जा रहा है। विडंबना यह है कि तकनीक ने पूरी दुनिया को जोड़ने का दावा किया था, लेकिन उसने कई घरों के भीतर की दूरियां बढ़ा दी हैं।
 
 
डिजिटल लत कोई काल्पनिक समस्या नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2019 में गेमिंग डिसऑर्डर को आधिकारिक रूप से मानसिक स्वास्थ्य विकार के रूप में मान्यता दी। यह निर्णय वर्षों के शोध और चिकित्सा अवलोकनों पर आधारित था। इसका अर्थ था कि अत्यधिक डिजिटल उपयोग केवल एक आदत नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या भी बन सकता है।
 
 
भारत आज दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल समाजों में से एक है। देश में लगभग 69 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। स्मार्टफोन और सस्ते डेटा ने इंटरनेट को गांव गांव तक पहुंचा दिया है। यह परिवर्तन अपने आप में सकारात्मक था क्योंकि इससे शिक्षा, सूचना और संचार के नए अवसर पैदा हुए। लेकिन हर तकनीकी क्रांति अपने साथ कुछ चुनौतियां भी लेकर आती है। डिजिटल विस्तार की यही चुनौती आज डिजिटल लत के रूप में हमारे सामने खड़ी है।
 
 
यह समझना आवश्यक है कि डिजिटल लत कोई दुर्घटना नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, वीडियो गेम और कई डिजिटल एप्लीकेशन उपयोगकर्ता का अधिकतम समय प्राप्त करने के उद्देश्य से तैयार किए जाते हैं। इनका पूरा ढांचा इस प्रकार बनाया जाता है कि व्यक्ति बार बार वापस लौटे। हर नोटिफिकेशन, हर लाइक, हर कमेंट और हर नया वीडियो मस्तिष्क को एक छोटे पुरस्कार का अनुभव कराता है।
 
 
मानव मस्तिष्क में डोपामिन नामक रसायन खुशी और पुरस्कार की अनुभूति से जुड़ा होता है। जब कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर सराहना प्राप्त करता है या किसी गेम में सफलता हासिल करता है, तब डोपामिन का स्राव होता है। यही प्रक्रिया धीरे धीरे आदत और फिर लत का रूप ले सकती है। यही कारण है कि कई लोग हर कुछ मिनट बाद अपना फोन देखने लगते हैं, भले ही वहां कोई आवश्यक सूचना न हो।
 
 
भारत में यह समस्या विशेष रूप से युवाओं के बीच तेजी से बढ़ रही है। बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज के एक अध्ययन में पाया गया कि 14 से 17 वर्ष आयु वर्ग के लगभग एक चौथाई किशोर इंटरनेट की लत के लक्षण प्रदर्शित करते हैं। कोविड महामारी के बाद यह स्थिति और गंभीर हुई है।
 
 
कोविड महामारी के दौरान स्कूल, खेल मैदान और सार्वजनिक गतिविधियां बंद हो गई थीं। शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक संपर्क का लगभग पूरा भार डिजिटल माध्यमों पर आ गया। बच्चों और किशोरों ने कई कई घंटे स्क्रीन के सामने बिताने शुरू कर दिए। यूनिसेफ की रिपोर्टों के अनुसार महामारी के दौरान बच्चों का स्क्रीन समय कई क्षेत्रों में दोगुना हो गया। समस्या यह रही कि महामारी समाप्त होने के बाद भी यह आदत समाप्त नहीं हुई।
 
 
डिजिटल लत केवल तकनीकी समस्या नहीं है। यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्या भी है। आधुनिक जीवन में अकेलापन, प्रतिस्पर्धा, तनाव और भावनात्मक असुरक्षा बढ़ रही है। सोशल मीडिया व्यक्ति को एक कृत्रिम दुनिया प्रदान करता है जहां वह स्वयं का मनचाहा स्वरूप प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन यह आभासी स्वीकृति वास्तविक आत्मविश्वास का स्थान नहीं ले सकती।
 
 
सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की सफलताओं, यात्राओं, उपलब्धियों और आकर्षक जीवनशैली को देखकर अनेक युवाओं में हीनभावना और अवसाद की भावना विकसित होती है। वे स्वयं की तुलना एक ऐसी दुनिया से करने लगते हैं जो अक्सर वास्तविक नहीं होती। परिणामस्वरूप आत्मसम्मान में कमी, चिंता और मानसिक तनाव बढ़ने लगता है।
 
 
डिजिटल लत और पारंपरिक नशों के बीच भी एक गहरा संबंध देखने को मिल रहा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि जो व्यक्ति भावनात्मक अकेलेपन, तनाव या अवसाद से जूझता है, उसके नशे की ओर आकर्षित होने की संभावना बढ़ जाती है। इसी प्रकार नशे की गिरफ्त में आया व्यक्ति वास्तविक जीवन की समस्याओं से बचने के लिए डिजिटल दुनिया में और अधिक डूब सकता है। दोनों एक दूसरे को मजबूत करते हैं।
 
 
किशोरावस्था इस दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील अवधि होती है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि मानव मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स लगभग 25 वर्ष की आयु तक विकसित होता रहता है। यही भाग आत्मनियंत्रण, निर्णय क्षमता और जोखिम के मूल्यांकन के लिए जिम्मेदार होता है। इसलिए किशोरों में किसी भी प्रकार की लत विकसित होने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक होती है।
 
 
डिजिटल युग का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसने कई बार परिवारों के भीतर संवाद को कमजोर कर दिया है। पहले परिवार एक साथ बैठकर भोजन करते थे, चर्चा करते थे और दिन भर के अनुभव साझा करते थे। आज अनेक घरों में भोजन की मेज पर भी मोबाइल फोन उपस्थित रहता है। बातचीत की जगह स्क्रीन ने ले ली है।
 
 
जब परिवार में संवाद कम होता है तो बच्चों और किशोरों के भीतर भावनात्मक रिक्तता उत्पन्न होती है। वे अपनी समस्याएं, आशंकाएं और भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में डिजिटल माध्यम उन्हें एक आसान शरणस्थली प्रदान करते हैं। धीरे धीरे यह शरणस्थली निर्भरता का रूप ले लेती है।
 
 
इस समस्या का समाधान तकनीक का विरोध नहीं है। तकनीक आधुनिक जीवन की आवश्यकता है और उसके अनेक सकारात्मक उपयोग हैं। प्रश्न यह नहीं है कि तकनीक अच्छी है या बुरी। प्रश्न यह है कि उसका उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है।
 
 
समाधान की शुरुआत परिवार से हो सकती है। घरों में स्क्रीन मुक्त समय निर्धारित किया जा सकता है। भोजन के समय मोबाइल फोन से दूरी रखी जा सकती है। बच्चों को खेल, पुस्तक पठन, संगीत, कला और प्रकृति से जोड़ने के प्रयास किए जा सकते हैं। विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता के साथ डिजिटल अनुशासन की शिक्षा भी आवश्यक है।
 
 
सरकारों, शैक्षणिक संस्थानों और प्रौद्योगिकी कंपनियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे डिजिटल उत्पादों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जो उपयोगकर्ता के कल्याण को प्राथमिकता दें। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और जागरूकता बढ़ाना भी आवश्यक है।