समान नागरिक संहिता (UCC) : संवैधानिक संकल्प से सामाजिक समरसता तक

समय की मांग, राष्ट्रीय एकता का आधार और न्यायपूर्ण समाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    24-Jun-2026
Total Views |
ucc

 
डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
 
 
"एक देश, एक संविधान और एक समान न्याय व्यवस्था ही लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा है। जब नागरिकों के अधिकार धर्म, पंथ और संप्रदाय के आधार पर नहीं, बल्कि समान नागरिकता के आधार पर निर्धारित होते हैं, तभी राष्ट्र सशक्त और समरस बनता है।"
 
 
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां विविध धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां, परंपराएं और जीवन पद्धतियां सहस्राब्दियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। यही विविधता भारत की शक्ति भी है और उसकी विशिष्ट पहचान भी। किंतु इस विविधता के बीच संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की थी, जहां प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार, समान अवसर और समान न्याय प्राप्त हो। इसी उद्देश्य से भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के माध्यम से राज्य को समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) लागू करने का निर्देश दिया गया।
 
 
आज स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद यह विषय पुनः राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। विशेष रूप से मध्यप्रदेश सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता के अध्ययन और क्रियान्वयन के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित किए जाने के बाद यह चर्चा और अधिक प्रासंगिक हो गई है। यह केवल एक विधिक सुधार का विषय नहीं है, बल्कि संविधान, सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण, राष्ट्रीय एकता और आधुनिक भारत के निर्माण से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।
 
 
समान नागरिक संहिता का तात्पर्य ऐसे समान नागरिक कानूनों से है जो देश के सभी नागरिकों पर बिना किसी धार्मिक भेदभाव के समान रूप से लागू हों। वर्तमान में भारत में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, गोद लेना, उत्तराधिकार, संपत्ति का बंटवारा और पारिवारिक संबंधों से जुड़े अनेक मामलों में विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) लागू हैं। उदाहरण के लिए हिंदुओं के लिए हिंदू विवाह अधिनियम एवं हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, मुसलमानों के लिए शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानून, ईसाइयों के लिए भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम तथा पारसी समुदाय के लिए पृथक वैवाहिक और पारिवारिक कानून लागू हैं। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य इन सभी अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर एक ऐसा नागरिक कानून लागू करना है जो सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू हो।
 
 
यह समझना आवश्यक है कि UCC का संबंध धार्मिक पूजा-पद्धति, उपासना, धार्मिक अनुष्ठानों या आस्था से नहीं है। इसका संबंध केवल नागरिक जीवन के उन पहलुओं से है जो विवाह, परिवार, संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े हैं। इसलिए इसे धार्मिक हस्तक्षेप के बजाय नागरिक अधिकारों की समान व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए।
 
 
भारत का संविधान केवल शासन का दस्तावेज नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का दर्शन है। संविधान सभा में समान नागरिक संहिता पर विस्तृत चर्चा हुई थी। संविधान निर्माता मानते थे कि भविष्य में भारत को एक समान नागरिक व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहिए। भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. भीमराव आंबेडकर का स्पष्ट मत था कि एक आधुनिक राष्ट्र में नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकार धर्म आधारित भिन्नताओं पर निर्भर नहीं होने चाहिए। उन्होंने माना कि राज्य को सामाजिक सुधार और समानता की दिशा में आगे बढ़ने का अधिकार और दायित्व दोनों हैं। इसी सोच के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 44 में उल्लेख किया गया कि राज्य भारत के समस्त क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
 
 
भारत में व्यक्तिगत कानूनों की वर्तमान व्यवस्था का इतिहास औपनिवेशिक काल से जुड़ा हुआ है। ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने आपराधिक कानूनों को तो एक समान बनाया, लेकिन विवाह और पारिवारिक मामलों में धार्मिक समुदायों के अलग-अलग कानूनों को जारी रखा। स्वतंत्रता के बाद भी यह व्यवस्था काफी हद तक बनी रही। 1955-56 में हिंदू कानूनों में व्यापक सुधार किए गए, लेकिन सभी समुदायों के लिए समान नागरिक कानून नहीं बन पाए। परिणामस्वरूप आज भी भारत में नागरिक जीवन के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्र धर्म आधारित अलग-अलग कानूनों द्वारा संचालित होते हैं।
 
 
समान नागरिक संहिता लागू करने की आवश्यकता सबसे पहले संविधान की मूल भावना को साकार करने के लिए है। भारतीय संविधान समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। जब सभी नागरिक मतदान करने, कर देने और आपराधिक कानूनों का पालन करने में समान हैं, तो विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में अलग-अलग कानूनों का औचित्य स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनता है। UCC संविधान की समानता की भावना को व्यवहारिक रूप देने का माध्यम बन सकता है।
 
 
महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा भी UCC की आवश्यकता का एक महत्वपूर्ण आधार है। भारत में व्यक्तिगत कानूनों के कारण कई बार महिलाओं को विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में असमान परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। समान नागरिक संहिता महिलाओं को समान कानूनी अधिकार प्रदान करने, संपत्ति में समान हिस्सेदारी सुनिश्चित करने, विवाह और तलाक के मामलों में समान सुरक्षा उपलब्ध कराने तथा लैंगिक न्याय को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकती है। वास्तव में महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की दृष्टि से UCC को एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार माना जा रहा है।
 
 
राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुदृढ़ करने की दृष्टि से भी UCC का विशेष महत्व है। एक राष्ट्र में नागरिकों के लिए अलग-अलग नागरिक कानून होने से कभी-कभी कानूनी और सामाजिक जटिलताएं उत्पन्न होती हैं। समान नागरिक संहिता यह संदेश देती है कि राष्ट्र में नागरिकता सर्वोपरि है और सभी नागरिक कानून की दृष्टि से समान हैं। इससे राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और संवैधानिक राष्ट्रवाद को मजबूती मिल सकती है।
 
 
न्यायिक व्यवस्था को सरल बनाने में भी UCC महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के कारण न्यायालयों को अनेक जटिल विवादों और कानूनी व्याख्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि एक समान नागरिक कानून लागू होता है तो कानूनी अस्पष्टता कम होगी, मुकदमों में कमी आएगी और न्यायिक प्रक्रिया अधिक सरल एवं प्रभावी बन सकेगी।
 
 
आज का भारत तेजी से बदल रहा है। शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, अंतर्धार्मिक विवाहों में वृद्धि और बदलती सामाजिक संरचना ने नागरिक जीवन को नया स्वरूप दिया है। ऐसे में नागरिक कानूनों का आधुनिक, वैज्ञानिक और समान स्वरूप समय की आवश्यकता बन गया है। विकसित भारत की परिकल्पना तभी सार्थक हो सकती है जब सामाजिक न्याय और विधिक समानता भी उसके साथ-साथ आगे बढ़े।
 
 
भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी समय-समय पर समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल देता रहा है। शाहबानो प्रकरण (1985) में न्यायालय ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करते हुए UCC की आवश्यकता का उल्लेख किया था। इसी प्रकार सर्ला मुद्गल प्रकरण (1995) में भी सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में गंभीर विचार की आवश्यकता व्यक्त की थी। न्यायालय का मत रहा है कि समान नागरिक कानून राष्ट्रीय एकता और न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करने में सहायक हो सकते हैं।
 
 
भारत में गोवा राज्य को समान नागरिक संहिता के एक व्यावहारिक उदाहरण के रूप में देखा जाता है। वहां विवाह पंजीकरण, संपत्ति अधिकार और उत्तराधिकार से संबंधित अनेक प्रावधान सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होते हैं। इसलिए गोवा मॉडल को अक्सर UCC के संदर्भ में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
 
 
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता के अध्ययन और सुझावों के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। राज्य सरकार का उद्देश्य विभिन्न समुदायों से संवाद स्थापित करना, सामाजिक एवं कानूनी प्रभावों का अध्ययन करना, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा एक व्यवहारिक और न्यायसंगत मसौदा तैयार करना है। यदि यह प्रयास सफल होता है तो मध्यप्रदेश देश में समान नागरिक संहिता लागू करने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल हो सकता है।
 
 
हालांकि UCC को लेकर कुछ आशंकाएं भी व्यक्त की जाती हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इससे उनकी पारंपरिक धार्मिक या सांस्कृतिक व्यवस्थाओं पर प्रभाव पड़ सकता है। विशेष रूप से जनजातीय समाजों की विशिष्ट परंपराओं और सामाजिक संरचनाओं को लेकर भी चर्चा होती रही है। इसलिए आवश्यक है कि UCC को लागू करते समय संविधान की पांचवीं अनुसूची, जनजातीय अधिकारों और सांस्कृतिक विविधताओं का पूरा सम्मान किया जाए। किसी भी कानून की सफलता उसकी सामाजिक स्वीकार्यता पर निर्भर करती है, इसलिए व्यापक संवाद और सहमति अत्यंत आवश्यक है।
 
 
वास्तव में समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विविधताओं को समाप्त करना नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच समान न्याय स्थापित करना है। यह किसी धर्म, संप्रदाय या संस्कृति के विरुद्ध नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के अधिकारों की समान सुरक्षा का प्रयास है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का आधार नागरिकता होना चाहिए, न कि धार्मिक पहचान।
 
 
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि समान नागरिक संहिता भारत की संवैधानिक यात्रा का वह अध्याय है जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की थी। इसका मूल उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार, समान अवसर और समान न्याय प्रदान करना है। आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, तब कानून की दृष्टि से नागरिकों की समानता का प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। मध्यप्रदेश द्वारा UCC की दिशा में उठाया गया कदम केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि संविधान के अधूरे संकल्प को पूर्ण करने का प्रयास माना जा सकता है।
 
 
जब कानून सबके लिए समान होगा, तब संविधान की आत्मा वास्तव में जन-जन तक पहुंचेगी। समान नागरिक संहिता का लक्ष्य विविधताओं को मिटाना नहीं, बल्कि समानता, न्याय, समरसता और राष्ट्रीय एकता के आधार पर एक सशक्त भारत का निर्माण करना है। यही संविधान का संदेश है, यही आधुनिक भारत की आवश्यकता है और यही भविष्य के विकसित भारत की दिशा भी।