नियमों की कठोरता बनाम मानवीय संवेदना: परीक्षा प्रबंधन में संतुलन समय की मांग

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    24-Jun-2026
Total Views |
neet
 
 
डॉ. रतन सूर्यवंशी
निदेशक म.प्र. भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय, भोपाल
 
 
शिक्षा और परीक्षाओं का मूल उद्देश्य योग्य प्रतिभाओं को तराशना और उन्हें आगे बढ़ने के समान अवसर देना है। परंतु, हाल ही में मध्य प्रदेश के विदिशा परीक्षा केंद्र पर नीट (NEET-UG) की पुनर्परीक्षा के दौरान घटी घटना ने इस पूरी व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सोचने पर मजबूर कर दिया है।
 
 
महज 2 मिनट की देरी के कारण ग्रामीण परिवेश से आई एक होनहार बेटी को परीक्षा से वंचित होना पड़ा। परीक्षा केंद्र के बाहर अपनी साल भर की तपस्या को आंसुओं में बहते देख बिलखती बेटी और लाचार पिता का वायरल वीडियो अनुशासन और मानवीय संवेदना के बीच के द्वंद्व को उजागर करता है।
 
 
राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की शुचिता, पारदर्शिता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सरकार और परीक्षा एजेंसियों द्वारा किए जाने वाले कड़े सुरक्षा प्रबंध सराहनीय और आवश्यक हैं। पेपर लीक जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए समयबद्धता और सख्त नियमों का पालन अपरिहार्य है। परंतु, इसके साथ ही व्यवस्था की दोहरी नीति पर भी एक यक्ष प्रश्न खड़ा होता है।
 
 
यदि यही तकनीकी सर्वर किसी खराबी के कारण निर्धारित समय से 15-20 मिनट पहले काम करना बंद कर देता, तो निश्चित रूप से छात्रहित में नियमों को लचीला बनाया जाता। ऐसे में एक बेबस छात्रा की महज 2 मिनट की व्यावहारिक मजबूरी के आगे डिजिटल दीवार का इतना अभेद्य हो जाना विचारणीय है।
 
 
नियमों को मानवीय बनाने के साथ-साथ इस दिशा में परीक्षार्थियों और अभिभावकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। नीट जैसी देश की सबसे प्रतिष्ठित और जीवन बदलने वाली परीक्षा के लिए छात्रों को समय का एक बड़ा 'मार्जिन' लेकर घर से निकलना चाहिए। अप्रत्याशित मौसम, ट्रैफिक या वाहन खराब होने जैसी आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए अभिभावकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे केंद्र पर निर्धारित समय से काफी पहले पहुँचें, ताकि अंतिम क्षणों की हड़बड़ी से बचा जा सके।
 
 
इस डिजिटल युग में हमारे पास इस समस्या का एक बेहद आधुनिक और प्रभावी तकनीकी समाधान भी मौजूद है। जिस तरह एयरपोर्ट्स पर उड़ान से पहले 'वेब चेक-इन' की सुविधा होती है, वैसी ही व्यवस्था राष्ट्रीय परीक्षाओं के लिए की जा सकती है। परीक्षा के दिन सुबह छात्र अपने मोबाइल से परीक्षा ऐप पर लॉग-इन करके 'डिजिटल अटेंडेंस' दर्ज कर सकें, जिससे एजेंसी को पहले ही पता चल जाए कि छात्र रास्ते में है। इसके साथ ही, अपरिहार्य परिस्थितियों के लिए 5 से 10 मिनट का 'ग्रेस पीरियड' (रियायती समय) दिया जाना चाहिए, ताकि बायोमेट्रिक प्रणालियों में एक आपातकालीन विंडो के जरिए वैध छात्रों को प्रवेश मिल सके। इस दिशा में सरकार और नीति निर्माताओं को सकारात्मक रूप से कुछ महत्वपूर्ण सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है
 
  
डिजिटल चेक-इन सिस्टम: राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को छात्रों के लिए 'प्री-अराइवल डिजिटल चेक-इन' की सुविधा शुरू करनी चाहिए।
 
 
आपातकालीन रियायत नीति: नियमावली में संशोधन कर 'लास्ट मिनट ग्रेस प्रोटोकॉल' शामिल किया जाए, ताकि तकनीकी सर्वर मानवीय विवेक के आड़े न आए।सहानुभूतिपूर्ण प्रशिक्षण: परीक्षा केंद्रों पर तैनात नोडल अधिकारियों को संकट के समय छात्रों की मदद करने के लिए 'सहानुभूतिपूर्ण मार्गदर्शक' के रूप में प्रशिक्षित किया जाए।अभिभावकों के लिए परामर्श: एडमिट कार्ड के साथ ही अभिभावकों के लिए भी एक मार्गदर्शिका जारी हो, जिसमें समय प्रबंधन और सुरक्षा नियमों के महत्व को स्पष्ट किया गया हो।'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का संकल्प सरकार की प्रशासनिक संवेदनशीलता, आधुनिक सोच और समाज की सजगता के समन्वय से ही सिद्ध होगा। सरकार को इस घटना को एक सकारात्मक अवसर के रूप में लेते हुए परीक्षा सुधारों में मानवीय दृष्टिकोण और आधुनिक तकनीक को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी प्रतिभावान छात्र का सपना व्यवस्था के पत्थरों से टकराकर न टूटे।