डॉ. आनंद सिंह राणा
(इतिहास संकलन समिति, महाकौशल प्रान्त)
"चंदेलों की बेटी थी, गोंडवाने की रानी थी, चंडी थी रणचंडी थी, वह तो दुर्गावती भवानी थी। "
"मृत्यु तो सभी को आती है अधार सिंह, परंतु इतिहास उन्हें ही याद रखता है जो स्वाभिमान के साथ जिये और मरे" -रानी दुर्गावती(आत्मोत्सर्ग के समय अपने सेनापति से कहा था।
ऋग्वेद के देवी सूक्त में मां आदिशक्ति स्वयं कहती हैं,"अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां,अहं रूद्राय धनुरा तनोमि "… अर्थात मैं ही राष्ट्र को बांधने और ऐश्वर्य देने वाली शक्ति हूँ, और मैं ही रुद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूं। हमारे तत्वदर्शी ऋषि मनीषा का उपरोक्त प्रतिपादन वस्तुत: स्त्री शक्ति की अपरिमितता का द्योतक है।यह शोध आलेख उन हिंदू वीरांगनाओं को सादर समर्पित है,जो जीवन के संग्राम में स्व के लिए मां, बेटी, बहन, पत्नी के रुप में देश की रक्षा के लिए अनादि काल से पूर्णाहुति देती आ रही हैं और दे रहीं हैं जिनकी आस्था और समर्पण अटल है और उन्हें विपरीत परिस्थितियाँ भी हरा नहीं सकीं। हिन्दुओं में बेटी का जन्म एक परिवार, एक कुटुम्ब का जन्म है इसलिए मातृशक्ति हिंदुत्व का मूलाधार है।
यह अटल सत्य है कि व्यक्ति का जन्म साधारण ही होता है परंतु मृत्यु सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि मृत्यु के समय ही उसका आकलन होता है। कमजोर और भीरु व्यक्ति की मृत्यु पर इतिहास मौन हो जाता है, श्रद्धांजलि भी नहीं देता है परंतु जब स्व के लिए किसी धीर, वीर और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो इतिहास ऐंसी हुतात्माओं को अमर कर देता है, श्रद्धांजलि अर्पित करता है, नतमस्तक होता है और इन सब में सबसे महत्वपूर्ण मृत्यु है, मातृभूमि के प्रति बलिदान!!! वीरांगना रानी दुर्गावती का बलिदान इस कोटि की उच्चतम पराकाष्ठा है। हिंदू धर्म में एक बेटी का जन्म शक्ति के अवतार के रूप में शिरोधार्य किया जाता है, फिर तो रानी दुर्गावती का जन्म दुर्गा अष्टमी को हुआ था इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया था, कालिंजर किले में राजा कीरत सिंह ने प्रसन्नता पूर्वक उत्सव मनाया और मध्यकाल में वही नन्ही बालिका युवा अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते शास्त्र और शास्त्रों में पारंगत हो गई। अपने पिता कीरत सिंह के साथ साथ कालिंजर किले का प्रबंधन संभाला और युद्ध भी लड़े।
मुस्लिम आक्राताओं के विरुद्ध बुंदेलखंड और गोंडवाना में रक्षात्मक संधि हुई तो आखिर गोंडवाना क़े महान् राजा संग्राम शाह ने अपने पुत्र दलपति शाह क़े लिए रानी दुर्गावती का वधू के रुप में मांग ही लिया। धूमधाम से बुंदेलखंड की वीरांगना रानी दुर्गावती गोंडवाना की बहू बनकर आईं, तब रानी दुर्गावती 18 वर्ष की थी। यह रानी दुर्गावती का प्रारब्ध था या दुर्भाग्य जिसने उनका पीछा किया एक समय ऐसा आया जब होने वाले ससुर, फिर पिता और पति की अकस्मात मृत्यु हो गई। ऐंसी अवस्था में भी वीरांगना ने दुर्भाग्य को पलटते हुए, गोंडवाना साम्राज्य की बागडोर संभाली 5 वर्षीय बालक वीर नारायण सिंह को युवराज घोषित करते हुए वह गोंडवाना की महारानी बनी। वीरांगना ने 16 वर्षों के शासनकाल में गोंडवाना के साम्राज्य को स्वर्ण युग में तब्दील कर दिया।आगे चलकर यही रानी दुर्गावती स्वतंत्रता, स्वाभिमान और शौर्य की देवी केे रुप प्रतिष्ठित हुईं। अब विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना मानी जाती हैं। परंतु यह तो शोध आलेख पढ़ने की पूर्वपीठिका है। आईये जानते हैं विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर गौरवमयी गाथा।
भारत के हृदय स्थल में स्थित त्रिपुरी के महान् कलचुरि वंश का 13 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अवसान हो गया था, फलस्वरूप सीमावर्ती शक्तियां इस क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए लिए लालायित हो रही थीं। अंततः इस संक्रांति काल में एक वीर योद्धा जादोंराय (यदुराय) ने, तिलवाराघाट निवासी एक महान् ब्राह्मण सन्यासी सुरभि पाठक के भगीरथ प्रयास से, त्रिपुरी क्षेत्रांतर्गत, गढ़ा-कटंगा क्षेत्र में गोंड वंश की नींव रखी।कालांतर में यह साम्राज्य महान् गोंडवाना साम्राज्य के नाम से जाना गया।गोंडवाना साम्राज्य का चरमोत्कर्ष का प्रारंभ 48वीं पीढ़ी के महानायक राजा संग्रामशाह (अमानदास) के समय हुआ और इनकी पुत्रवधू वीरांगना रानी दुर्गावती का समय गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग के नाम से जाना जाता है।
गोंडवाना के महान् सम्राट संग्राम शाह ने 52 गढ़ों तक साम्राज्य विस्तार कर लिया था। गोंडवाना साम्राज्य का क्षेत्रफल लगभग इंग्लैंड के क्षेत्रफल जितना हो गया था। विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण दिल्ली के सुल्तान या पड़ौस के कोई अन्य राजा गोंडवाना पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सके।
उत्तर भारत में मुगल शासक हुमायूँ को शेरशाह ने बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध परास्त कर भारत से बाहर खदेड़ दिया और साम्राज्य विस्तार के लिए उद्यत हो गया। शेरशाह की धर्म की आड़ में विस्तारवादी नीति से कालिंजर के महान् शासक कीरत सिंह चिंतित हो गए थे, इसलिए शेरशाह सहित अन्य मुस्लिम आक्राताओं को मुँह तोड़ जवाब देने के लिए गोंडवाना साम्राज्य के महान् राजा संग्रामशाह से मित्रता का प्रस्ताव रखा, जो एक वैवाहिक संबंध के रुप में फलीभूत हुआ।
सन् 1545 में शेरशाह ने कालिंजर पर आक्रमण किया और मारा गया इस युद्ध में राजा कीरतसिंह वीरगति को प्राप्त हुए। जिससे वीरांगना दुर्गावती को धक्का लगा परंतु सन् 1548 में पति दलपतिशाह की आकस्मिक मृत्यु ने वीरांगना पर वज्रपात कर दिया। इस वज्रपात से वीरांगना दुर्गावती विचलित हुईं पर शीघ्र ही उन्होंने साहस के साथ अपने 5 वर्षीय अल्पवयस्क सुपुत्र वीर नारायण की ओर से गोंडवाना साम्राज्य की सत्ता संभाल ली।वीरांगना रानी का काल गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग था।
रानी दुर्गावती की कूटनीति विलक्षण थी, जिसकी तुलना काकतीय वंश की वीरांगना रुद्रमा देवी और फ्रांस की जान आफ आर्क को छोड़कर विश्व की अन्य किसी वीरांगना से नहीं की जा सकती है। युद्ध के 9 पारंपरिक युद्ध व्यूहों क्रमशः वज्र व्यूह, क्रौंच व्यूह, अर्धचन्द्र व्यूह, मंडल व्यूह, चक्रशकट व्यूह, मगर व्यूह, औरमी व्यूह, गरुड़ व्यूह, और श्रीन्गातका व्यूह से परिचित थीं। इनमें क्रौंच व्यूह और अर्द्धचंद्र व्यूह में सिद्धहस्त थीं। रानी दुर्गावती दोनों हाथों से तीर और तलवार चलाने में निपुण थीं। गोंडवाना साम्राज्य की सत्ता संभालने के कुछ दिन बाद ही गढ़ों की संख्या 52 से बढ़कर 57 हो गई थी। वीरांगना ने एक बड़ी स्थायी और सुसज्जित सेना तैयार की, जिसमें 20 हजार अश्वारोही एक सहस्र हाथी और प्रचुर संख्या में पदाति थे। तत्कालीन भारत में गोंडवाना साम्राज्य प्रथम साम्राज्य था, जहां महिला सेना का भी दस्ता था और रानी दुर्गावती की बहिन कमलावती और पुरागढ़ की राजकुमारी कमान संभालती थीं।
वीरांगना रानी दुर्गावती के शौर्य, साहस एवं पराक्रम के संबंध में प्रकाश डालते हुए तथाकथित छल समूह के इतिहासकारों ने कुल 4 युद्धों का टूटा-फूटा वर्णन कर इति श्री कर ली है, जबकि वीरांगना ने 16 बड़े युद्ध लड़े। 16 बड़े युद्धों में से 15 युद्धों विजयी रहीं, जिसमें 12 युद्ध मुस्लिम शासकों से लड़े गये, उसमें से भी 6 मुगलों के विरुद्ध लड़े गये। वैंसे प्रचलित है कि छोटे - बड़े सभी युद्धों की बात की जाए तो वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपने जीवनकाल में 52 युद्ध लड़े, जिसमें 51 में उन्होंने विजय प्राप्त की थी।
गोंडवाना की साम्राज्ञी के रुप में सत्ता संभालते ही मांडू के अय्याश शासक बाजबहादुर ने विधवा महिला जानकर गोंडवाना साम्राज्य दो बार आक्रमण किए परंतु रानी दुर्गावती ने दोनों बार जम कर दुर्गति कर डाली और मांडू राजधानी तक खदेड़ा। बाज बहादुर के चाचा फतेह खान को द्वंद्व युद्ध में रानी दुर्गावती में मार डाला। बाजबहादुर जीवन भर शरणागत रहा। आगे मालवा के सूबेदार शुजात की कभी हिम्मत नहीं हुई। शेरखान (शेरशाह) कालिंजर अभियान में मारा गया। कुछ दिनों बाद मुगलों ने पानीपत के द्वितीय युद्ध के उपरांत पुनः सत्ता हथिया ली और अकबर शासक बना। शीघ्र ही येन केन प्रकारेण साम्राज्य विस्तार करना आरंभ कर दिया।
रानी दुर्गावती के गोंडवाना साम्राज्य की संपन्नता और समृद्धि की चर्चा कड़ा और मानिकपुर के सूबेदार आसफ खान द्वारा मुगल दरबार में की गई। धूर्त, लंपट और चालाक अकबर लूट और विधवा रानी को कमजोर समझते हुए जबरदस्ती गोंडवाना साम्राज्य हथियाने के उद्देश्य से रानी को आत्मसमर्पण के लिए धमकाया परंतु गोंडवाना की स्वाभिमानी और स्वतंत्रप्रिय वीरांगना रानी दुर्गावती नहीं मानी। अकबर का संदेश था कि स्त्रियों का काम रहंटा कातने का है, तो रानी ने संदेश के साथ एक सोने का पींजन भेजा और कहा कि आपका भी काम रुई धुनकने का है। अकबर तिलमिला गया और उसने आसफ खान को गोंडवाना साम्राज्य की लूट और उसके विनाश के लिए रवाना किया। इसके पूर्व अकबर ने दो गुप्तचरों क्रमशः गोप महापात्र और नरहरि महापात्र को भेजा परंतु वीरांगना ने दोनों को अपनी ओर मिला लिया। उन्होंने अकबर की योजना और आसफ खाँ के आक्रमण के बारे में रानी दुर्गावती को सब कुछ बता दिया।
वीरांगना रानी दुर्गावती सतर्क हो गईं और सिंगौरगढ़ में मोर्चा बंदी कर ली। आसफ खान 6 हजार घुड़सवार सेना 12 हजार पैदल सेना एवं तोपखाने तथा स्थानीय मुगल सरदारों के साथ सिंगोरगढ़ आ धमका। इधर रानी दुर्गावती के साथ, उनके पुत्र वीर नारायण सिंह, अधार सिंह, हाथी सेना के सेनापति अर्जुन सिंह बैस, कुंवर कल्याण सिंह बघेला, चक्रमाण कलचुरि, महारुख ब्राह्मण, वीर शम्स मियानी, मुबारक बिलूच,खान जहान डकीत, महिला दस्ता की कमान रानी दुर्गावती की बहन कमलावती और पुरा गढ़ की राजकुमारी (वीर नारायण की होने वाली पत्नी) संभाली। अविलंब युद्ध आरंभ हो गया। सिंगोरगढ़ का प्रथम युद्ध - आसफ खान ने आत्मसमर्पण के लिए कहा, वीरांगना ने कहा कि किसी शासक के नौकर से इस संदर्भ में बात नहीं की जाती है। वीरांगना ने भयंकरआक्रमण किया, मुगलों के पैर उखड़ गये आसफ खान भाग निकला।
सिंगौरगढ़ का द्वितीय युद्ध - पुन: मुगलों के वही हाल हुए लेकिन मुगलों का तोपखाना पहुंच गया और रानी को खबर लग गयी उन्होंने गढ़ा में मोर्चा जमाया और सिंगोरगढ़ छोड़ दिया।
सिंगौरगढ़ का तृतीय युद्ध - मुगलों का तोपखाना भारी पड़ गया और सिंगोरगढ़ हाथ से निकल गया।
चंडाल भाटा (अघोरी बब्बा) का युद्ध - यह चौथा युद्ध था जिसका उद्देश्य मुगल सेना को पीछे हटाना था ताकि वीरांगना गढ़ा से बरेला के जंगलों की ओर निकल जाए। घमासान युद्ध हुआ और सेनानायक अर्जुन सिंह बैस ने आसफ खाँ को बहुत पीछे तक खदेड़ दिया। वीरांगना ने तोपखाने से निपटने के लिए एक शानदार रणनीति बनायी जिसके अनुसार बरेला (नर्रई) के सकरे और घने जंगलों के मध्य मोर्चा जमाया ताकि तोपों की सीधी मार से बचा जा सके।
गौर नदी का युद्ध - वीरांगना रानी दुर्गावती के जीवन के 15वें और मुगलों से 5वें युद्ध में 22 जून 1564 को स्वतंत्रता,स्वाभिमान और शौर्य की देवी - विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती ने,प्रात:सेनानायक अर्जुन सिंह बैस के शहीद होने का समाचार मिलते ही "अर्द्धचंद्र व्यूह"बनाते हुए "गौर नदी के युद्ध" में आसफ खाँ सहित मुगलों की सेना पर भयंकर आक्रमण किया और पुल तोड़ दिया ताकि तोपखाना नर्रई (बरेला) न पहुँच सके।
मुगल सेना तितर बितर हो गई जिसको जहां रास्ता मिला भाग निकला। वीरांगना ने पुन:रात्रि में हमले की योजना बनाई परंतु सरदारों की असहमति के कारण निर्णय बदलना पड़ा। यहीं भारी चूक हो गई, यदि रात्रि में आक्रमण होता तो इतिहास कुछ और ही होता। अंततः वीरांगना ने नर्रई की ओर कूच किया और युद्ध के लिए "क्रौंच व्यूह" रचना तैयार की.।
23 जून 1564 को नर्रई में प्रथम मुठभेड़ हुई, रानी और उनके सहयोगियों ने मुगलों की की दुर्गति कर डाली । मुगल भाग निकली और डरकर बरेला तक भागी।
23 जून सन् 1564 की रात तक तोपखाना गौर नदी पार कर बरेला पहुंच गया। 23 जून की रात को घातक षड्यंत्र हुआ। आसफ खान ने रानी के एक छोटे सामंत बदन सिंह को घूस देकर मिला लिया। उसने रानी की रणनीति का खुलासा कर दिया कि कल युद्ध में रानी मुगलों को घने जंगलों की ओर खींचेगी जहाँ तोपखाना कारगर नहीं होगा और सब मारे जाएंगे।
आसफ खान डर गया उसने उपचार पूछा, तब बदन सिंह ने बताया कि नर्रई नाला सूखा पड़ा है और उसके पास पहाड़ी सरोवर है जिसे यदि तोड़ दिया जाए तो पानी भर जाएगा और रानी नाला पार नहीं कर पाएगी और तोपों की मार सीधा पड़ेगी।उधर रात में रानी को अनहोनी अंदेशा हुआ, उन्होंने सरदारों से रात में ही हमले का प्रस्ताव रखा पर सरदार नहीं माने यदि मान जाते तो इतिहास कुछ और होता।बहरहाल युद्ध अंतिम घड़ी आ ही गयी, वीरांगना ने "क्रौंच व्यूह" रचा, सारस पक्षी के समान सेना जमाई गई। चोंच भाग पर रानी दुर्गावती स्वयं और दाहिने पंख पर युवराज वीरनारायण और बायें पंख पर अधारसिंह खड़े हुए।
24 जून 1564 को प्रातः लगभग 10 बजे मोर्चा खुल गया। घमासान युद्ध प्रारंभ हुआ, पहले हल्ले में मुगलों के पांव उखड़ गए। मुगलों ने 3 बार आक्रमण किये और तीनों बार गोंडों ने जमकर खदेड़ा, इसलिए मुगलों ने तोपखाना से मोर्चा खोल दिया। रानी ने योजना अनुसार जंगलों की ओर बढ़ना शुरू किया परंतु बदन सिंह की योजना अनुसार पहाड़ी सरोवर तोड़ दिया गया। नर्रई में बाढ़ जैसी स्थिति बन गयी। अब रानी घिर गयी थीं, इसी बीच अपरान्ह लगभग 3 बजे वीरनारायण के घायल होने की खबर आई, वीरांगना जरा भी विचलित नहीं हुईं। आंख में तीर लगने के बाद भी युद्ध जारी रखा,।
मुगल सेना के बुरे हाल थे परंतु रानी को एक तीर गर्दन पर लगा रानी ने तीर तोड़ दिया हाथी सरमन के महावत को अधार सिंह पीछे हटने का आदेश दिया परंतु रानी समझ गयी थी कि अब वो नहीं बचेंगी,इसलिए अब वो युद्ध के गोल में समा गयीं और भीषण युद्ध किया जब उनको मूर्छा आने लगी तो उन्होंने अपनी कटार से प्राणोत्सर्ग किया, वहीं सेनापति आधार सिंह के नेतृत्व में कल्याण सिंह बघेला और चक्रमाण कलचुरी ने युद्ध जारी रखा और वीरांगना के पवित्र शरीर को सुरक्षित किया तथा युवराज वीर नारायण सिंह को रणभूमि से सुरक्षित भेज कर अपनी पूर्णाहुति दी। समर भूमि में प्राणोत्सर्ग करते समय रानी दुर्गावती ने अपने सेनापति से कहा था, कि "मृत्यु तो सभी को आती है अधार सिंह, परंतु इतिहास उन्हें ही याद रखता है जो स्वाभिमान के साथ जिये और मरे"।