भारत की अखंडता के प्रहरी, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    23-Jun-2026
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श्यामप्रशाद मुखर्जी
 
 
आयुष पंडाग्रे
लेखक पत्रकारिता के विद्यार्थी हैं 
 
 
23 जून भारतीय राजनीति और राष्ट्रजीवन की एक ऐसी तिथि है, जो हमें उस महान व्यक्तित्व की याद दिलाती है जिसने भारत की एकता और अखंडता के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। यह दिन भारतीय जनसंघ के संस्थापक, प्रखर शिक्षाविद्, राष्ट्रवादी चिंतक और दूरदर्शी राजनेता डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है। बंगाल की भूमि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण की भूमि रही हैं। बंगाल की पुण्यभूमि ने रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, रवीन्द्रनाथ टैगोर बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, डॉ. जगदीश चंद्र बसु , जैसे महापुरुषों की जन्म भूमि हैं, इसी गौरवशाली परंपरा में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम भी अग्रणीय है, जिन्होंने राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता को अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। डॉ. मुखर्जी का नाम विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण एकीकरण के संघर्ष से जुड़ा हुआ है।
 
 
उनका उद्घोष था
 
 
"एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे"
 
 
यह उद्घोष जम्मू कश्मीर का एक महत्वपूर्ण नारा बन गया। उन्होंने केवल इस विचार को व्यक्त ही नहीं किया, बल्कि इसके लिए अपना जीवन भी न्यौछावर कर दिया।
 
 
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
 
 
डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता के भवानीपुर में एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी अपने समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद्, न्यायविद् और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति थे। उनकी माता का नाम योगमाया देवी था।
 
 
बचपन से ही वे अत्यंत मेधावी थे। उन्होंने कम आयु में ही शैक्षणिक क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए और बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने, जो उस समय विश्व के सबसे युवा कुलपतियों में से एक थे।
कुलपति के रूप में उन्होंने भारतीय भाषाओं, भारतीय संस्कृति और शिक्षा सुधारों को बढ़ावा दिया। उनकी प्रशासनिक क्षमता और दूरदर्शिता ने उन्हें देशभर में प्रतिष्ठा दिलाई।
 
 
राजनीति में प्रवेश
 
 
डॉ. मुखर्जी ने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश बंगाल विधान परिषद के सदस्य के रूप में किया। उस समय बंगाल की राजनीति मुस्लिम लीग और ब्रिटिश नीतियों से प्रभावित थी। उन्होंने बंगाल में राष्ट्रवादी राजनीति को मजबूत करने का कार्य किया।
1941 में वे बंगाल सरकार में वित्त मंत्री बने। उन्होंने प्रशासनिक दक्षता और राष्ट्रहित के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत में बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनेक इतिहासकार मानते हैं कि यदि उस समय उनका नेतृत्व नहीं होता, तो कोलकाता सहित पश्चिम बंगाल (बंग प्रांत) का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में जा सकता था।
 
 
स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में भूमिका
 
 
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया। अपने कार्यकाल में उन्होंने औद्योगिक विकास को गति देने का प्रयास किया।
 
 
चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स, सिंदरी उर्वरक परियोजना तथा विशाखापट्टनम में औद्योगिक विकास जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे आत्मनिर्भर भारत और औद्योगिक प्रगति के समर्थक थे।
 
 
गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाकर देश में एक नया राजनीतिक षड्यंत्र रचा जाने लगा। सरदार पटेल के देहावसान के पश्चात् कांग्रेस में नेहरू का अधिनायकवाद प्रबल होने लगा। गांधी और पटेल दोनों के ही नहीं रहने के कारण कांग्रेस ‘नेहरूवाद’ की चपेट में आ गई तथा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, लाइसेंस-परमिट-कोटा राज, राष्ट्रीय सुरक्षा पर लापरवाही, कश्मीर आदि पर घुटनाटेक नीति, अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारतीय हितों की अनदेखी आदि अनेक विषय देश में राष्ट्रवादी नागरिकों को उद्विग्न करने लगे। ‘नेहरूवाद’ तथा पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर भारत के चुप रहने से क्षुब्ध होकर 1950 में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इधर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने भी प्रतिबंध के दंश को झेलते हुए महसूस किया कि संघ के राजनीतिक क्षेत्र से सिद्धांततः दूरी बनाये रखने के कारण वे अलग-थलग तो पड़े ही, साथ ही संघ को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा था। ऐसी परिस्थिति में एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल की आवश्यकता देश में महसूस की जाने लगी।
 
 
भारतीय जनसंघ की स्थापना
 
 
राष्ट्रीय राजनीति में वैचारिक विकल्प प्रस्तुत करने के उद्देश्य से भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर, 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी की अध्यक्षता में दिल्ली के राघोमल आर्य कन्या उच्च विद्यालय में हुई। वे जनसंघ के प्रथम अध्यक्ष बने
भारतीय जनसंघ ने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में कश्मीर एवं राष्ट्रीय अखंडता के मुद्दे पर आंदोलन छेड़ा तथा कश्मीर को किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार देने का विरोध किया। नेहरू के अधिनायकवादी रवैये के फलस्वरूप डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी को कश्मीर की जेल में डाल दिया गया, जहां उनकी रहस्यपूर्ण स्थिति में मृत्यु हो गई। एक नई पार्टी को सशक्त बनाने का कार्य पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गया। भारत-चीन युद्ध में भी भारतीय जनसंघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर नेहरू की नीतियों का डटकर विरोध किया। 1967 में पहली बार भारतीय जनसंघ एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नेतृत्व में भारतीय राजनीति पर लम्बे समय से बरकरार कांग्रेस का एकाधिकार टूटा, जिससे कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय हुई।
 
 
यह वही संगठन था जिसने आगे चलकर भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया और बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ। डॉ. मुखर्जी का मानना था कि भारत की राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए एक मजबूत राष्ट्रवादी राजनीतिक धारा आवश्यक है।
 
 
आज उसी विचारधारा ने बंगाल की धरती पर ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है। भाजपा की यह जीत इसलिए भी विशेष है क्योंकि पहली बार बंग, बिहार और कलिंग की सांस्कृतिक धारा वाले क्षेत्रों में राष्ट्रवादी विचार की मजबूत राजनीतिक स्थापना हुई है।
 
 
जम्मू कश्मीर और अनुच्छेद 370
 
 
स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर को विशेष संवैधानिक प्रावधान प्राप्त थे। उस समय राज्य का अलग संविधान, अलग झंडा और अलग प्रशासनिक व्यवस्था थी। राज्य में प्रवेश के लिए परमिट प्रणाली भी लागू थी। डॉ. मुखर्जी का मानना था कि यदि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, तो वहाँ अलग व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। उन्होंने संसद और जनसभाओं में लगातार इस विषय को उठाया।
 
 
अगस्त 1952 में जम्मू की एक विशाल सभा में उन्होंने घोषणा की
 
 
"या तो मैं आपको भारतीय संविधान दिलाऊँगा या इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूँगा।"
यहीं से उनके संघर्ष का निर्णायक चरण प्रारंभ हुआ।
 
 
परमिट प्रणाली के विरुद्ध आंदोलन
 
 
1953 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट व्यवस्था को चुनौती देने का निर्णय लिया। उनका तर्क था कि भारत के किसी नागरिक को भारत के ही किसी प्रदेश में जाने के लिए अनुमति पत्र की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
 
 
8 मई 1953 को वे जम्मू-कश्मीर के लिए रवाना हुए। उनके साथ वैद्य गुरुदत्त और अन्य सहयोगी भी थे। 11 मई को राज्य की सीमा में प्रवेश करते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और नजरबंद कर दिया गया। उनकी गिरफ्तारी की खबर पूरे देश में फैल गई। जनसंघ, प्रजा परिषद और अनेक राष्ट्रवादी संगठनों ने इसका विरोध किया।
 
 
रहस्यमय मृत्यु और बलिदान
 
 
लगभग 40 दिनों तक नजरबंदी में रहने के बाद 23 जून 1953 को उनकी मृत्यु की सूचना देश को मिली। उनकी मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई, इसे लेकर लंबे समय तक प्रश्न उठते रहे।
 
 
उनकी माता योगमाया देवी ने कहा था - 
 
 
"मेरे पुत्र की मृत्यु केवल मेरे पुत्र की मृत्यु नहीं, भारत माता के पुत्र की मृत्यु है।"
 
 
डॉ. मुखर्जी की मृत्यु ने पूरे देश को झकझोर दिया। उनके बलिदान ने जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया।
 
 
दूरदर्शी राष्ट्रवादी विचारक डॉ. मुखर्जी
 
 
डॉ. मुखर्जी केवल राजनेता नहीं थे। वे एक विद्वान शिक्षाविद्, कुशल प्रशासक और राष्ट्रवादी चिंतक भी थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति, शिक्षा और राष्ट्रीय एकता को अपने विचारों का केंद्र बनाया। उनका विश्वास था कि भारत की शक्ति उसकी सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय चेतना में निहित है। वे लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हित के बीच संतुलन के पक्षधर थे।
 
 
2019 और उनके संकल्प की प्रतिध्वनि 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त करने और जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान को पूर्ण रूप से लागू करने का निर्णय लिया गया। इस निर्णय के बाद अनेक लोगों ने इसे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के लंबे संघर्ष और संकल्प की ऐतिहासिक परिणति हैं। यद्यपि इतिहास और राजनीति में इस विषय पर विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाने में डॉ. मुखर्जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
 
 
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन राष्ट्रसेवा, वैचारिक दृढ़ता और त्याग का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने शिक्षा, राजनीति, प्रशासन और राष्ट्रीय एकता के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया। उनका बलिदान हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्रहित के लिए संघर्ष केवल सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व भी है। आज जब भारत नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, तब डॉ. मुखर्जी का जीवन और विचार हमें राष्ट्रीय एकात्मता, सांस्कृतिक चेतना और कर्तव्यनिष्ठ राजनीति की प्रेरणा देते हैं।
  
 
आज, उनके बलिदान दिवस पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को याद करना है जिनके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया। भारत की एकता और अखंडता के लिए समर्पित इस महान राष्ट्रनायक को शत-शत नमन।