भारत की शौर्य यात्रा का सुनहरा पृष्ठ : कारगिल विजय दिवस

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    23-Jun-2026
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कारगिल विजय दिवस
 
 
डॉ नुपूर निखिल देशकर
शिक्षाविद 
 
 
आज की युवा पीढ़ी बहुत भाग्यशाली है क्योंकि उसने भारत की युद्ध की विभीषिकाओं को देखा ही नहीं , उसने जब अपनी आंखें खोली तब सामने एक स्वर्णिम भारत था। जो विकासशील देश से विकसित देश की ओर यात्रा कर रहा है। इस यात्रा के पीछे जो कठिन पड़ाव आए वह क्या थे? इस पीढ़ी को यह जानना अत्यंत आवश्यक है। आज की तरुणाई जिस स्वतंत्रता वातावरण में अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन करते हैं- उसके पीछे बलिदानियों के अमर बलिदान की अनुमति करना आज की आवश्यकता है।
 
 
आखिर 27 वर्ष पूर्व लड़े गए एक युद्ध को आज भी क्यों याद किया जा रहा है? क्या कारगिल विजय दिवस एक सैन्य विजय का स्मरण है, अथवा यह राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, समर्पण और राष्ट्रीय चेतना का जीवंत संदेश ?
 
 
26 जुलाई को मनाया जाने वाला कारगिल विजय दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र की स्वतंत्रता, सुरक्षा और सम्मान स्वतः प्राप्त नहीं होते,इनके लिए अनेक वीर सैनिकों ने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया हैं। वर्ष 1999 में कारगिल की दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं में भारतीय सैनिकों ने अद्भुत साहस और पराक्रम का परिचय देते हुए शत्रु को परास्त किया और भारत की अखंडता की रक्षा की। जब पाकिस्तान समर्थित सैनिकों और घुसपैठियों ने भारतीय सीमा में स्थित रणनीतिक चोटियों पर गुप्त रूप से अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया तब कारगिल युद्ध का प्रारंभ हुआ।
 
 
"ये दिल मांगे मोर" उद्घोष किसी बनावटी शीतल पेय का नहीं कैप्टन विक्रम बत्रा का उद्घोष है। जो आज भी युवाओं में जोश भर देता है। लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय, ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव तथा राइफलमैन संजय कुमार जैसे वीरों की गाथाएँ आने वाली पीढ़ियों को सदैव स्मरण करनी होगी।
 
 
समुद्र तल से 16 से 18 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित इन दुर्गम पहाड़ियों को पुनः प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य था। विपरीत परिस्थितियों, कड़ाके की ठंड और दुश्मन की ऊँची स्थान में रहने के बाद भी भारतीय सैनिकों ने असाधारण साहस का परिचय दिया। कारगिल युद्ध में अनेक वीर जवानों ने अपने प्राणों की आहुति देकर राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा की। इस विजय ने विश्व को भारतीय सेना की शक्ति, रणनीति और अदम्य संकल्प का परिचय कराया।
 
 
यह भाव था -"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" जन्म देने वाली माँ और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। कारगिल के वीरों ने इस आदर्श को अपने जीवन से सिद्ध किया। इस भूमि में जन्म लेने वाली संतति ऋषियों की संतान हैं जो अमृतस्य पुत्रा वयम् के सिद्धांत को लेकर स्वयं को परमात्मा का अंश मानते हुए नश्वर (मरने वाले) शरीर से परे राष्ट्रीय धर्म और स्वधर्म की रक्षा के लिए राष्ट्रीय की वेदी पर अपने प्राणों को आहत कर गए।
 
 
जिस प्रकार कारगिल युद्ध में भारत के रणबांकुरों ने वर्तमान स्थिति के अनुसार अपने राष्ट्र की रक्षा की उसी तरह सजग होकर हमें हमारे राष्ट्र की रक्षा करनी है। आज युद्ध सीमाओं पर नहीं, सूचना, तकनीक, साइबर सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और वैचारिक क्षेत्रों में भी लड़े जा रहे हैं। ऐसे समय में राष्ट्र की सुरक्षा सैनिकों के दायित्वों के साथ, प्रत्येक नागरिक का उत्तरदायित्व है। यदि समाज राष्ट्रीय चेतना से विमुख हो जाए, तो बाहरी चुनौतियों का सामना करना कठिन हो जाता है।
 
 
कारगिल विजय दिवस युवा पीढ़ी को यह भी प्रेरणा देता है कि व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा जाए। आज जब भौतिकवाद, उपभोक्तावाद और सोशल मीडिया की चमक युवाओं को आकर्षित कर रही है, तब कारगिल के वीरों का जीवन त्याग, अनुशासन, साहस और कर्तव्यनिष्ठा के आदर्श प्रस्तुत करता है।
 
 
यह दिवस अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान और भविष्य के लिए एक राष्ट्रीय प्रेरणा है। जो हमें अपने सैनिकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने तथा भारत को सुरक्षित, सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के संकल्प को पुनः दोहराने का अवसर प्रदान करता है।