प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 के भामाशाह : अमर शहीद सेठ अमरचंद बांठिया

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    22-Jun-2026
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आयुष पंडाग्रे
(लेखक पत्रकारिता के विद्यार्थी हैं)
 
 
1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें अनेक क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। इतिहास केवल तलवारों की चमक, रणभूमि के पराक्रम और युद्ध कौशल की कथाओं तक ही सीमित नहीं था। इस इतिहास में ऐसे अनेक राष्ट्रभक्त नायक हुए हैं जिन्होंने बिना हथियार उठाए अपने साहस, त्याग, दूरदर्शिता और राष्ट्रनिष्ठा से स्वाधीनता संग्राम के संघर्ष को नई ऊर्जा प्रदान की। 1857 के स्वाधीनता संग्राम यदि मंगल पांडे, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब पेशवा और कुंवर सिंह जैसे वीर योद्धाओं ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी, तो उसी समय सेठ अमरचंद बांठिया जैसे राष्ट्रसेवियों ने उस संघर्ष को आर्थिक शक्ति प्रदान की।
 
 
सेठ अमरचंद बांठिया का नाम भारतीय इतिहास में "1857 की क्रांति के भामाशाह" के रूप में आदरपूर्वक लिया जाता है।
 
 
प्रसंगवश, 18 जून 2026 को ऐतिहासिक हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण हुए हैं। ऐसे में यह प्रसंग इसलिए भी स्मरण में आता है कि जिस प्रकार मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भामाशाह ने महाराणा प्रताप को अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था, उसी प्रकार सेठ अमरचंद बांठिया ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और 1857 की क्रांति में क्रांतिकारियों के लिए ग्वालियर का राजकोष खोल दिया। वह उस समय उस राजकोष के खजांची (प्रधान कोषाध्यक्ष) थे उन्होंने केवल धन ही नहीं दिया, बल्कि अपने जीवन का भी बलिदान कर दिया। उन्हें इतिहास '1857 की क्रांति का भामाशाह' और 'राजस्थान का मंगल पांडे' कहकर स्मरण करता है।
 
 
जन्मभूमि बीकानेर से कर्मभूमि ग्वालियर
 
 
राजस्थान की राजपूतानी शौर्य भूमि में सेठ अमरचंद बांठिया का जन्म सन् 1793 में राजस्थान के बीकानेर में एक प्रतिष्ठित जैन व्यापारी परिवार में हुआ था। उनके पिता अबीरचंद बांठिया व्यापार करते थे, आर्थिक परिस्थितियों के कारण परिवार को बीकानेर छोड़कर ग्वालियर आना पड़ा। ग्वालियर उस समय व्यापारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था। अमरचंद बांठिया ने अपने परिश्रम, ईमानदारी और आर्थिक प्रबंधन की अद्भुत क्षमता के बल पर शीघ्र ही व्यापार जगत में विशेष प्रतिष्ठा अर्जित कर ली। उनकी साख इतनी मजबूत थी कि ग्वालियर राजघराने ने उन्हें "नगर सेठ" की उपाधि प्रदान की। यह सम्मान केवल आर्थिक समृद्धि के कारण नहीं, बल्कि उनके चरित्र, सामाजिक प्रतिष्ठा और जनविश्वास के कारण मिला था।
आगे चलकर ग्वालियर राज्य के शासक महाराज जयाजीराव सिंधिया ने उन्हें राज्य के प्रसिद्ध "गंगाजली राजकोष" का प्रमुख खजांची नियुक्त किया। यह उस समय का अत्यंत महत्वपूर्ण और विश्वासपूर्ण पद था।
 
 
धर्म, नैतिकता और राष्ट्रभावना का संगम
 
 
अमरचंद बांठिया केवल सफल व्यापारी नहीं थे, बल्कि अत्यंत धार्मिक और सिद्धांतनिष्ठ व्यक्ति भी थे। जैन धर्म के अनुयायी होने के कारण उनके जीवन में सत्य, अहिंसा, सेवा और त्याग का विशेष महत्व था।
 
 
वर्ष 1854 और 1855 में उन्होंने जैन संत बुद्धिविजय जी के प्रवचन सुने। इन प्रवचनों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने समझा कि विदेशी शासन केवल राजनीतिक दासता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक पराधीनता भी है। इसी अवधि में उनके मन में राष्ट्रप्रेम की भावना और अधिक प्रबल हुई।
 
 
1857 का संग्राम और मध्यभारत का ग्वालियर
 
 
1857 का स्वाधीनता संग्राम धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत में फैल चुका था। मेरठ से प्रारंभ हुई क्रांति दिल्ली, कानपुर, झांसी, कालपी, लखनऊ और ग्वालियर तक पहुंच चुकी थी। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों के विरुद्ध लगातार संघर्ष कर रही थीं। लगातार युद्धों के कारण क्रांतिकारी सेना आर्थिक संकट से जूझ रही थी। सैनिकों को महीनों से वेतन नहीं मिला था। भोजन, हथियार, रसद और अन्य आवश्यक संसाधनों का भी अभाव था। ऐसी स्थिति में सेना का मनोबल गिरना स्वाभाविक था। जून 1858 में जब रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और अन्य क्रांतिकारी ग्वालियर पहुंचे, तब उनके सामने सबसे बड़ी समस्या धन और संसाधनों की थी। यदि शीघ्र आर्थिक सहायता नहीं मिलती, तो संघर्ष कमजोर पड़ सकता था।
 
 
जब सेठ अमरचंद बांठिया बने 1857 के भामाशाह
 
 
यही वह ऐतिहासिक क्षण था जिसने अमरचंद बांठिया को अमर बना दिया। उन्होंने ग्वालियर के गंगाजली राजकोष (ग्वालियर रियासत का ऐतिहासिक और गुप्त शाही खजाना) के द्वार क्रांतिकारियों के लिए खोल दिए। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी निजी संपत्ति भी स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित कर दी। इस धन से सैनिकों को वेतन दिया गया, हथियारों और रसद की व्यवस्था हुई तथा क्रांतिकारी सेना को अत्यंत सहयोग मिला। अमरचंद बांठिया का यह निर्णय केवल आर्थिक सहायता नहीं था। यह अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध खुली चुनौती थी। वे जानते थे कि इस कार्य का परिणाम मृत्यु भी हो सकती है, फिर भी उन्होंने राष्ट्रहित को अपने जीवन से ऊपर रखा।
 
 
रानी लक्ष्मीबाई और क्रांतिकारियों के संघर्ष में निर्णायक योगदान
 
 
इतिहासकार मानते हैं कि ग्वालियर में मिली आर्थिक सहायता ने क्रांतिकारी सेना को महत्वपूर्ण बल प्रदान किया। इससे सैनिकों का मनोबल बढ़ा और वे अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रख सके। यदि उस समय सेठ अमरचंद बांठिया यह साहसिक निर्णय न लेते, तो संभवतः क्रांतिकारी सेना की स्थिति और अधिक कमजोर हो जाती। इसलिए उनका योगदान केवल दान का नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की रणनीतिक सफलता का भी हिस्सा भी था। उनके त्याग ने यह सिद्ध किया कि किसी भी युद्ध में केवल तलवारें ही नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधन भी महत्वपूर्ण होते हैं।
 
 
गिरफ्तारी और अमानवीय यातनाएँ
 
 
अंग्रेजों को शीघ्र ही यह ज्ञात हो गया कि ग्वालियर के राजकोष से क्रांतिकारियों को सहायता देने के पीछे अमरचंद बांठिया का हाथ है। उन्हें राजद्रोही घोषित कर गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद उन पर अमानवीय अत्याचार किए गए। अंग्रेज चाहते थे कि वे अपने कार्य पर पछतावा व्यक्त करें और क्षमा याचना करें, किंतु उन्होंने ऐसा करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। यातनाओं के बावजूद उनका साहस नहीं टूटा। वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। अंग्रेजी शासन उनकी इच्छाशक्ति को पराजित नहीं कर सका।
 
 
पुत्र का बलिदान अडिग राष्ट्रनिष्ठा
 
 
कहा जाता है कि अंग्रेजों ने उन्हें झुकाने के लिए उनके परिवार को भी निशाना बनाया। उनके आठ वर्षीय पुत्र को पकड़ लिया गया और धमकी दी गई कि यदि उन्होंने क्षमा नहीं मांगी, तो उनके पुत्र की हत्या कर दी जाएगी। एक पिता के लिए सबसे कठिन परीक्षा थी, लेकिन अमरचंद बांठिया अपने राष्ट्रधर्म से विचलित नहीं हुए। उन्होंने अन्याय के सामने सिर झुकाने से इनकार कर दिया। उनकी यह दृढ़ता भारतीय इतिहास में त्याग और राष्ट्रनिष्ठा का अनुपम उदाहरण है।
 
 
22 जून 1858 : बलिदान
 
 
अंततः अंग्रेजों ने 22 जून 1858 को उन्हें फांसी देने का निर्णय लिया। जनता में भय उत्पन्न करने के उद्देश्य से फांसी का स्थान ग्वालियर का सर्राफा बाजार चुना गया। अंतिम समय में जब उनकी अंतिम इच्छा पूछी गई, तो उन्होंने नवकार मंत्र का जाप करने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलने के बाद उन्होंने शांत भाव से ईश्वर का स्मरण किया। कहा जाता है कि फांसी के दौरान दो बार रस्सी, डाल टूटने जैसी घटनाएँ हुईं, तीसरे प्रयास में उन्हें नीम के पेड़ पर फांसी दे दी गई। उस स्थान पर आज उनका स्मारक स्थापित है।
 
 
अंग्रेजों ने आतंक फैलाने के लिए उनके शव को कई दिनों तक वहीं लटकाए रखा। लेकिन अंग्रेज यह नहीं समझ पाए कि बलिदान भय नहीं, प्रेरणा पैदा करता है। 18 जून 1858 को ग्वालियर के युद्धक्षेत्र में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुई थीं। उनके बलिदान के मात्र चार दिन बाद, 22 जून को सेठ अमरचंद बांठिया को भी अंग्रेजों ने फाँसी दे दी, इस प्रकार स्वतंत्रता संग्राम के दो महान क्रांतिकारी एक ही सप्ताह में बलिदान हो गए।
 
 
इतिहास में उपेक्षित, लेकिन राष्ट्र स्मृति में अमर
 
 
दुर्भाग्य से स्वतंत्रता संग्राम के अनेकों राष्ट्र नायकों की तरह अमरचंद बांठिया का नाम भी लंबे समय तक इतिहास की मुख्यधारा में वह स्थान नहीं प्राप्त कर सका जिसके वे अधिकारी थे। जब भी 1857 की क्रांति की चर्चा होती है, तो युद्धभूमि के वीरों का उल्लेख प्रमुखता से होता है, किंतु आर्थिक रूप से क्रांति को शक्ति देने वाले इस महान राष्ट्रभक्त का योगदान अपेक्षाकृत कम चर्चित रहा। फिर भी ग्वालियर की जनता आज भी उन्हें श्रद्धा से याद करती है। सर्राफा बाजार स्थित उनके स्मारक पर प्रत्येक वर्ष 22 जून को लोग श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचते हैं।
 
 
सेठ अमरचंद बांठिया की प्रासंगिकता
 
 
आज जब हम स्वतंत्रता के अमृतकाल में प्रवेश कर चुके हैं, तब अमरचंद बांठिया का जीवन हमें अनेक महत्वपूर्ण संदेश देता है। उन्होंने सिखाया कि राष्ट्रसेवा केवल युद्धभूमि में जाकर ही नहीं की जाती। कोई व्यक्ति अपने ज्ञान, संसाधन, संपत्ति, श्रम और नैतिक साहस से भी राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकता है। उनका जीवन बताता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे। उन्होंने यह सिद्ध किया, कि धन का सर्वोच्च उपयोग राष्ट्र और समाज की सेवा में है।
 
 
राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा : सेठ अमरचंद बांठिया
 
 
सेठ अमरचंद बांठिया का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन उज्ज्वल अध्यायों में से एक है, जो त्याग, साहस, कर्तव्य और राष्ट्रनिष्ठा की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने न तो कोई सेना चलाई, न कोई युद्ध जीता, लेकिन अपने अद्वितीय त्याग से स्वतंत्रता के संघर्ष को नई ऊर्जा प्रदान की। रानी लक्ष्मीबाई और क्रांतिकारियों को आर्थिक सहायता देकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता केवल रणभूमि में नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण के बल पर भी प्राप्त की जाती है। 22 जून उनका बलिदान दिवस हमें स्मरण कराता है कि मातृभूमि के लिए दिया गया कोई भी योगदान कभी व्यर्थ नहीं जाता। राष्ट्र ऐसे बलिदानियों का सदैव ऋणी रहता है। आज जब हम स्वतंत्र भारत में साँस ले रहे हैं, तब ऐसे बलिदानियों को स्मरण करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। 1857 की क्रांति के भामाशाह, अमर शहीद सेठ अमरचंद बांठिया को शत-शत नमन, उनका यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र के प्रति सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देता रहेगा।