डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार
हजारों वर्षों पहले जब नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालय विश्व को ज्ञान का प्रकाश दे रहे थे, तब इस भूमि की पहचान ‘भारत’ के रूप में थी। वेदों, उपनिषदों, पुराणों और महाकाव्यों में जिस राष्ट्र को ‘भारतवर्ष’ कहा गया, आज उसी नाम को पुनः अकादमिक जीवन के केंद्र में स्थापित करने की पहल शुरू हुई है।
दरअसल, देश के अनेक विश्वविद्यालयों ने अपनी डिग्रियों, अंकसूचियों, प्रमाण-पत्रों, आधिकारिक पत्राचार, निमंत्रण पत्रों और साइनबोर्ड्स से ‘India’ शब्द हटाकर उसकी जगह ‘Bharat’ लिखना आरंभ कर दिया है। इस परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रतीक तब सामने आया जब मध्य प्रदेश में जबलपुर स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने विद्यार्थियों को जो उपाधियां प्रदान कीं, उन पर पहली बार आधिकारिक रूप से ‘India’ नहीं बल्कि ‘Bharat’ अंकित था।
अब आप इसे सिर्फ शब्द परिवर्तन नहीं मानिए, वास्तव में यह परिवर्तन भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के पुनर्प्रतिष्ठापन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
जब राष्ट्रपति ने बांटीं ‘भारत’ लिखी डिग्रियां
21 जून का दिन मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा इतिहास में एक नई पहचान लेकर आया। जबलपुर स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के 36वें दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, राज्यपाल मंगुभाई पटेल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, उच्चशिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार की उपस्थिति में विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक, उपाधियां, प्रशस्ति-पत्र और अंकसूचियां प्रदान की गईं। विशेष बात यह रही कि इन सभी दस्तावेजों पर ‘India’ के स्थान पर ‘Bharat’ लिखा हुआ था।
विश्वविद्यालय ने पहली बार अपनी उपाधियों, अंकसूचियों, स्वर्ण पदकों और प्रमाण-पत्रों पर आधिकारिक रूप से ‘भारत’ शब्द अंकित किया। इसके साथ ही रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय देश का पहला विश्वविद्यालय बन गया जिसने डिग्रियों में इस परिवर्तन को व्यवहारिक रूप से लागू कर दिया।
जनवरी 2025 में लिया गया था ऐतिहासिक निर्णय
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजेश कुमार वर्मा के अनुसार यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने जनवरी 2025 में ही प्रस्ताव पारित कर दिया था कि सभी आधिकारिक दस्तावेजों में ‘India’ के स्थान पर ‘Bharat’ शब्द का प्रयोग किया जाएगा। तब से विश्वविद्यालय अपने पत्राचार और प्रशासनिक संवादों में ‘भारत’ शब्द का उपयोग कर रहा था। हालांकि कोई बड़ा सार्वजनिक आयोजन न होने के कारण यह पहल व्यापक चर्चा में नहीं आ सकी। दीक्षांत समारोह में हजारों विद्यार्थियों को ‘भारत’ अंकित उपाधियां मिलने के बाद यह बदलाव राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया।
‘हम सब भारत के लोग हैं’
कुलपति प्रो. राजेश कुमार वर्मा इस बदलाव को केवल भाषाई परिवर्तन नहीं मानते। उनका कहना है, “भारत का वास्तविक और प्राचीन नाम ‘भारत’ है। संविधान के अनुच्छेद-1 में भी स्पष्ट रूप से लिखा गया है- “इंडिया अर्थात भारत”। ऐसे में विश्वविद्यालय ने अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के अनुरूप ‘भारत’ शब्द को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया। वे तर्क देते हैं कि जब जी-20 जैसे वैश्विक मंच पर ‘भारत’ शब्द का उपयोग सम्मानपूर्वक किया जा सकता है तो देश के भीतर शिक्षा के मंदिरों में उसका उपयोग क्यों नहीं होना चाहिए। इसी सोच के साथ विश्वविद्यालय ने डिग्रियों, मार्कशीट, पत्राचार, निमंत्रण पत्रों और साइनबोर्ड्स तक में यह परिवर्तन लागू कर दिया।
केवल डिग्री नहीं, पूरी व्यवस्था हुई ‘भारतमय’
विश्वविद्यालय प्रशासन एवं कुलगुरु के अनुसार बदलाव केवल प्रमाण-पत्रों तक सीमित नहीं है। दीक्षांत समारोह के आमंत्रण पत्र, प्रचार सामग्री, होर्डिंग्स, प्रशासनिक पत्राचार और विश्वविद्यालय परिसर के अनेक सूचना-पट्टों पर भी ‘India’ के स्थान पर ‘Bharat’ शब्द का उपयोग किया गया। इस प्रकार यह परिवर्तन प्रतीकात्मक न होकर संस्थागत स्तर पर लागू किया गया है। विश्वविद्यालय का दावा है कि देश में पहली बार किसी विश्वविद्यालय ने इतने व्यापक स्तर पर यह बदलाव लागू किया है।
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से शुरू हुई थी पहल
विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजेश कुमार वर्मा का इसके साथ ही कहना यह भी था कि इंदौर स्थित देवी अहिल्या विश्वविद्यालय ने सबसे पहले अपने आधिकारिक पत्राचार में ‘भारत’ शब्द का उपयोग शुरू किया था। बाद में अन्य विश्वविद्यालय भी इस दिशा में आगे बढ़े। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ने इस पहल को एक कदम आगे बढ़ाते हुए डिग्रियों, उपाधियों और प्रमाण-पत्रों में भी ‘भारत’ शब्द अंकित कर दिया, जिससे यह परिवर्तन पहली बार विद्यार्थियों के शैक्षणिक अभिलेखों तक पहुंच गया।
ज्ञान परंपरा से जुड़ी है ‘भारत’ की अवधारणा
इस पहल के समर्थक इसे भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि ‘भारत’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक सभ्यता का परिचायक है। वैदिक साहित्य से लेकर पुराणों और महाभारत तक इस भू-भाग का उल्लेख ‘भारतवर्ष’ के रूप में मिलता है।
‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ से जुड़े विद्वानों के अनुसार ‘भा’ का अर्थ प्रकाश या ज्ञान तथा ‘रत’ का अर्थ उसमें लीन होना है। इस दृष्टि से ‘भारत’ वह भूमि है जो ज्ञान की खोज और प्रकाश की ओर अग्रसर रहने वाली संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है। यही कारण है कि शिक्षा संस्थानों में ‘भारत’ शब्द के प्रयोग को सांस्कृतिक पुनर्जागरण का हिस्सा माना जा रहा है।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई विश्वविद्यालय जुड़े
यह अभियान अब केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अनेक विश्वविद्यालयों ने इस दिशा में प्रस्ताव पारित किए हैं या व्यवहारिक स्तर पर ‘भारत’ शब्द का उपयोग शुरू कर दिया है।
इनमें देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय, जीवाजी विश्वविद्यालय, अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, आईआईटी भिलाई, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय और बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के नाम प्रमुखता से सामने आए हैं।
इसके अतिरिक्त हरियाणा, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों ने भी इस परिवर्तन का समर्थन किया है। बताया जाता है कि देशभर में 17 विश्वविद्यालय अपने नियमित प्रशासनिक कार्यों में ‘भारत’ शब्द का उपयोग कर रहे हैं।
2022 से चल रहा है ‘इंडिया नहीं, भारत’ अभियान
इस बदलाव के पीछे ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ का लंबा अभियान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यास के राष्ट्रीय संयोजक ओम शर्मा का कहना है, “वर्ष 2022 से विश्वविद्यालयों के बीच इस विषय को लेकर संवाद चलाया जा रहा है। न्यास ने ‘इंडिया नहीं, भारत’ अभियान के अंतर्गत दस लाख हस्ताक्षर एकत्र कर राष्ट्रपति को सौंपने का लक्ष्य रखा है। अब तक पांच लाख से अधिक हस्ताक्षर ‘भारत’ नाम के समर्थन में प्राप्त हो चुके हैं।”
ओम शर्मा के अनुसार पहले देवी अहिल्या विश्वविद्यालय ने पत्राचार में ‘भारत’ शब्द का प्रयोग आरंभ किया और उसके बाद देश के विभिन्न राज्यों के अनेक विश्वविद्यालय इस पहल से जुड़े। इंदौर नगर निगम ने भी यह पहल आरंभ की है। उनका कहना है कि डिग्रियों में ‘भारत’ शब्द का उपयोग पहली बार रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ने किया है और इसका श्रेय उसी संस्थान को जाता है।
अब सांसदों-विधायकों तक पहुंचेगा अभियान
न्यास इस अभियान को और व्यापक बनाने की तैयारी में है। संगठन के राष्ट्रीय संयोजक ओम शर्मा के अनुसार, “अब पद्म पुरस्कार प्राप्त व्यक्तियों, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त नागरिकों, सांसदों और विधायकों के बीच भी हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा।” उन्होंने कहा, यदि देश की सभ्यतागत पहचान ‘भारत’ है तो सार्वजनिक जीवन, शिक्षा, प्रशासन और राष्ट्रीय विमर्श में उसी नाम को प्रमुखता मिलनी चाहिए।
ऐसे में कहना यही है कि मध्य प्रदेश के जबलपुर से शुरू हुई यह पहल अब केवल एक विश्वविद्यालय का निर्णय नहीं रह गई है। यह देश की पहचान, उसकी सांस्कृतिक स्मृति और प्राचीन ज्ञान परंपरा से जुड़े उस विमर्श का हिस्सा बन चुकी है, जिसमें भारत की नई पीढ़ी अपनी डिग्रियों और प्रमाण-पत्रों पर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि अपनी हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता की पहचान पढ़ रही है और वह है- ‘भारत’।