राजनारायण द्विवेदी
स्तम्भ लेखक
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां धार्मिक स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है। प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था का पालन करने, उसका प्रचार करने और धार्मिक संस्थाओं के संचालन की स्वतंत्रता प्राप्त है। किंतु जब धार्मिक गतिविधियों के साथ विदेशी वित्तपोषण, अंतरराष्ट्रीय मिशनरी नेटवर्क और धन के उपयोग की पारदर्शिता के प्रश्न जुड़ जाते हैं, तब यह विषय केवल धार्मिक न रहकर राष्ट्रीय कानून, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक हित का विषय बन जाता है।
हाल के दिनों में *लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम* (LRPF) द्वारा तमिलनाडु के मदुरै स्थित इवेंजेलिकल चर्च ग्रोथ मिशन (ECGM) के संबंध में प्रवर्तन निदेशालय (ED) को प्रस्तुत की गई शिकायत ने इसी प्रकार के अनेक प्रश्नों को जन्म दिया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि ECGM को अमेरिका स्थित मिशनरी संस्थाओं द टिमोथी इनिशिएटिव (The Timothy Initiative Inc.) और गॉस्पेलिंक इंक. (Gospelink Inc.) से विदेशी धनराशि प्राप्त हुई है। LRPF के शोध के अनुसार इन संस्थाओं के बीच नेतृत्व स्तर पर भी संबंध हैं, जिससे विदेशी धन के प्रवाह और उसके उपयोग की प्रकृति को लेकर जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि ये आरोप और दावे LRPF द्वारा प्रस्तुत शिकायत का हिस्सा हैं। इनकी सत्यता का अंतिम निर्धारण केवल सक्षम सरकारी एजेंसियों की निष्पक्ष जांच के बाद ही संभव होगा। किंतु इस प्रकरण ने एक बार फिर भारत में विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले धार्मिक संगठनों की पारदर्शिता और जवाबदेही पर चर्चा को केंद्र में ला दिया है।
विदेशी अंशदान और FCRA की भूमिका
भारत में विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्थाओं को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 (FCRA) के अंतर्गत पंजीकरण और नियमन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इस कानून का उद्देश्य किसी विशेष धर्म या संस्था को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से प्राप्त धन का उपयोग घोषित उद्देश्यों के अनुरूप और राष्ट्रीय हितों के विपरीत न हो।
किसी भी संस्था को प्राप्त विदेशी अनुदान की जानकारी, उसके उपयोग का विवरण तथा गतिविधियों का लेखा-जोखा सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। यही कारण है कि जब किसी संस्था के वित्तीय स्रोतों या उसके उपयोग को लेकर प्रश्न उठते हैं, तो जांच एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही किसी भी संस्था की विश्वसनीयता का आधार होती है। धार्मिक संस्थाएं भी इससे अलग नहीं हैं। यदि कोई संगठन कानून के अनुसार कार्य कर रहा है, तो जांच उसके लिए अपनी वैधता और पारदर्शिता सिद्ध करने का अवसर बन सकती है।
वैश्विक मिशनरी नेटवर्क की वास्तविकता
आज के दौर में मिशनरी गतिविधियां केवल स्थानीय चर्चों या धार्मिक संगठनों तक सीमित नहीं हैं। अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं विश्वभर में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग, साहित्य, मीडिया तथा प्रचार-प्रसार के माध्यम से कार्य करती हैं।
विशेष रूप से इंजीलवादी (Evangelical) मिशनरी संगठनों की कार्यप्रणाली में वैश्विक नेटवर्किंग एक महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है। अमेरिका और यूरोप में स्थित अनेक संगठन एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में कार्यरत स्थानीय संस्थाओं को वित्तीय और संगठनात्मक सहायता प्रदान करते हैं।
LRPF का दावा है कि डेविड नेल्म्स, जो द टिमोथी इनिशिएटिव के संस्थापक एवं निदेशक हैं, वे गॉस्पेलिंक इंक. के भी निदेशक हैं। यदि यह तथ्य जांच में प्रमाणित होता है, तो यह समझना आवश्यक होगा कि इन संस्थाओं के बीच वित्तीय और प्रशासनिक संबंध किस प्रकार संचालित होते हैं तथा भारत में उनकी गतिविधियों का स्वरूप क्या है।
भारत में मिशनरी गतिविधियों पर बहस
भारत में मिशनरी गतिविधियों को लेकर बहस कोई नई नहीं है। एक पक्ष का मानना है कि मिशनरी संस्थाएं शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। वहीं दूसरा पक्ष आरोप लगाता है कि कुछ संगठन सेवा और सहायता कार्यक्रमों के माध्यम से धार्मिक प्रभाव विस्तार और मतांतरण को बढ़ावा देते हैं।
यह बहस दशकों से चलती रही है और समय-समय पर विभिन्न राज्यों में इससे जुड़े विवाद सामने आते रहे हैं। इसलिए किसी भी नए मामले को पूर्वाग्रह के आधार पर देखने के बजाय तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
यदि किसी संगठन की गतिविधियां केवल सामाजिक सेवा और वैध धार्मिक प्रचार तक सीमित हैं, तो उन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। लेकिन यदि किसी प्रकार के अवैध वित्तीय लेन-देन, धोखाधड़ी, प्रलोभन या कानून के उल्लंघन के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी जांच और आवश्यक कार्रवाई भी कानून का ही हिस्सा है।
नेतृत्व संबंध और जवाबदेही
LRPF की शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि जोशुआ विजय कुमार, जो ECGM के सचिव हैं, उन्होंने भारत में द टिमोथी इनिशिएटिव की गतिविधियों में महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है। यदि किसी भारतीय संस्था और विदेशी संगठन के बीच गहरे संगठनात्मक संबंध मौजूद हैं, तो उनकी प्रकृति और सीमा को समझना आवश्यक हो जाता है।
यह प्रश्न केवल किसी एक संस्था तक सीमित नहीं है। वैश्विक स्तर पर कार्य करने वाले सभी गैर-सरकारी संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के लिए यह आवश्यक है कि उनके वित्तीय और प्रशासनिक संबंध पूरी तरह पारदर्शी हों। पारदर्शिता से न केवल कानूनी विवादों से बचा जा सकता है, बल्कि समाज का विश्वास भी मजबूत होता है।
राष्ट्रीय हित और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन
भारत जैसे बहुलतावादी समाज में सबसे बड़ी चुनौती धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की है। संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन साथ ही राज्य को यह अधिकार भी देता है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और कानून के शासन को सुनिश्चित करे।
इसी कारण FCRA जैसे कानून बनाए गए हैं, ताकि विदेशी धन के माध्यम से किसी प्रकार का अनुचित प्रभाव, राजनीतिक हस्तक्षेप या सामाजिक असंतुलन उत्पन्न न हो। यह व्यवस्था किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि सभी संस्थाओं पर समान रूप से लागू होती है।
किसी भी जांच का उद्देश्य किसी धार्मिक समुदाय को संदेह के घेरे में खड़ा करना नहीं होना चाहिए। बल्कि उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि सभी संस्थाएं कानून का पालन करें और उनके वित्तीय स्रोत तथा गतिविधियां पूर्णतः पारदर्शी हों।
तमिलनाडु में ECGM, द टिमोथी इनिशिएटिव और गॉस्पेलिंक से जुड़े प्रश्न केवल एक संगठन का मामला नहीं हैं। यह प्रकरण भारत में विदेशी फंडिंग, धार्मिक संस्थाओं की जवाबदेही, मिशनरी नेटवर्क की संरचना और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े व्यापक विमर्श का हिस्सा है।
आवश्यक है कि प्रवर्तन निदेशालय तथा अन्य सक्षम एजेंसियां उपलब्ध तथ्यों की निष्पक्ष, पारदर्शी और पेशेवर जांच करें। यदि आरोप असत्य सिद्ध होते हैं तो संबंधित संस्थाओं की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता मजबूत होगी। वहीं यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
लोकतंत्र में किसी भी संस्था की विश्वसनीयता उसके दावों से नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही से निर्धारित होती है। विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले सभी धार्मिक और सामाजिक संगठनों के लिए भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए। भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन साथ ही यह भी अपेक्षा करता है कि सभी गतिविधियां कानून और राष्ट्रीय हितों की मर्यादा के भीतर संचालित हों। यही संतुलन एक स्वस्थ, पारदर्शी और उत्तरदायी लोकतंत्र की पहचान है।