माधवराव सप्रे : हिंदी पत्रकारिता के युगनिर्माता

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    20-Jun-2026
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माधव राव सप्रे
 
 
आयुष पंडाग्रे
 लेखक पत्रकारिता के विद्यार्थी हैं 
 
 
19 जून 1871 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया ग्राम में जन्मे माधवराव सप्रे हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपने लेखन, चिंतन और पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्हें हिंदी पत्रकारिता का अग्रदूत तथा छत्तीसगढ़ क्षेत्र में हिंदी पत्रकारिता का प्रवर्तक माना जाता है। उनका पूरा जीवन राष्ट्रसेवा, साहित्य साधना और जनजागरण के लिए समर्पित रहा।
 
 
प्रारंभिक जीवन
 
सप्रे जी पाँच भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके पिता का नाम कोंडोपंत था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बिलासपुर में अपने मंझले भाई बाबूराव के पास रहकर हुई। मिडिल की परीक्षा उन्होंने 1887 में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। फलस्वरूप उन्हें सात रुपए मासिक छात्रवृत्ति मिलने लगी। हाई स्कूल की शिक्षा उन्होंने रायपुर में प्राप्त की, जहाँ श्री नंदलाल दुबे और श्री वामनराव ओक उनके शिक्षक थे। इन्हीं शिक्षकों की प्रेरणा से सप्रे जी को हिंदी में लेखन के लिए प्रोत्साहन मिला।
 
 
उन्होंने 1890 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की और उच्च शिक्षा के लिए जबलपुर चले गए। रॉबर्टसन कॉलेज में उन्होंने एम.ए. में प्रवेश लिया। यही जबलपुर बाद में उनकी कर्मभूमि बना। किंतु जबलपुर की आबोहवा उन्हें अनुकूल नहीं लगी, इसलिए वे अपने मंझले भाई बाबूराव के पास पेंड्रारोड चले गए। कुछ समय तक उन्होंने ठेकेदारी का कार्य किया, किंतु घाटा होने के कारण यह कार्य छोड़ना पड़ा। इसके बाद 1894 में वे ग्वालियर गए। वहाँ विक्टोरिया कॉलेज में कानून की पढ़ाई प्रारंभ की, परंतु उसे अधूरा छोड़कर आत्मनिर्भर बनने की इच्छा से 50 रुपए मासिक वेतन पर पेंड्रारोड के राजकुमार के शिक्षक बन गए।
उन्हें दो बार सरकारी नौकरी के अवसर प्राप्त हुए, किंतु उनका मन साहित्य और समाज सेवा में था। उन पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की विचारधारा का गहरा प्रभाव था।
 
 
हिंदी पत्रकारिता में योगदान
 
 
लेखक, पत्रकार एवं स्वतंत्रता सेनानी माधवराव सप्रे ने उस समय पत्रकारिता को जनसेवा और राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बनाया, जब देश अंग्रेजी शासन के अधीन था। उन्होंने वर्ष 1900 में हिंदी मासिक पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह पत्रिका हिंदी भाषा, साहित्य और राष्ट्रीय विचारों के प्रचार-प्रसार का प्रभावी मंच बनी।
 
 
उनकी पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं था, बल्कि समाज को शिक्षित करना, राष्ट्रीय चेतना जगाना और जनमत का निर्माण करना भी था। उन्होंने स्वदेशी, शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय स्वतंत्रता से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली लेख लिखे। सन 1900 में जब पूरे छत्तीसगढ़ में कोई प्रिंटिंग प्रेस नहीं था, तब उन्होंने बिलासपुर जिले के छोटे से गाँव पेंड्रा से ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। यद्यपि यह पत्रिका केवल तीन वर्षों तक ही चल सकी, किंतु इसने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।
 
 
सप्रे जी ने लोकमान्य तिलक के मराठी ‘केसरी’ को हिंदी क्षेत्र में ‘हिंदी केसरी’ के रूप में स्थापित किया तथा हिंदी साहित्यकारों और लेखकों को एक सूत्र में पिरोने के उद्देश्य से नागपुर से ‘हिंदी ग्रंथमाला’ का प्रकाशन भी आरंभ किया। उन्होंने ‘कर्मवीर’ के प्रकाशन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 
 
संस्थाओं का निर्माण करना, लोगों को राष्ट्रकार्य के लिए प्रेरित करना और समाज में राष्ट्रीय चेतना का संचार करना सप्रे जी के व्यक्तित्व की विशेषता थी। रायपुर, जबलपुर, नागपुर और पेंड्रा में रहते हुए उन्होंने अनेक लोगों के जीवन को नई दिशा दी। उनकी 26 वर्षों की पत्रकारिता और साहित्य सेवा ने नए मानदंड स्थापित किए।
 
 
हिन्दी क्षेत्र में नवजागरण के पुरोधा माधवराव सप्रे
 
 
भारतीय नवजागरण आंदोलन के कृती-व्रती महानायक माधवराव सप्रे को समग्रता में जनना-समझना हो तो उनके महत् कृतित्‍व का निष्कर्ष यूँ होगा : सप्रे जी हिन्‍दी नवजागरण के पुरोधा थे। सप्रेजी ने ‘भारत की एक राष्‍ट्रीयता’ का शंखनाद किया। उन्होंने अर्थशास्‍त्र की हिन्‍दी शब्‍दावली तैयार की, हिन्‍दी पत्रकारिता को संस्‍कारित किया। सप्रेजी ने हिन्‍दी समालोचना शास्‍त्र का विकास किया, हिन्‍दी निबंध विधा का मानक रचा, शिक्षा के गुण-धर्म की व्‍याख्‍या की और मातृभाषा के माध्‍यम से शिक्षा की महत्‍ता का प्रतिपादन किया, राष्‍ट्रीय कार्यों के निमित्‍त युवा प्रतिभाओं का परिष्‍कार किया। सप्रेजी ने हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन के देहरादून अधिवेशन (1924) के अध्‍यक्षीय आसन से हिन्‍दी को राष्‍ट्रभाषा बनाने का उद्घोष किया।
 
 
जबलपुर को संस्कारधानी बनाने में भी सप्रे जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1920 में उन्होंने वहाँ ‘हिंदी मंदिर’ की स्थापना की, जिसने क्षेत्र की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को नई दिशा प्रदान की। 1921 में रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय तथा जानकी देवी महिला पाठशाला की स्थापना भी उनके उल्लेखनीय कार्यों में शामिल है। ये दोनों संस्थाएँ आज भी संचालित हैं।
 
 
महान् व्यक्तित्व के निर्माण में माधवराव सप्रे की भूमिका
 
 
माधवराव सप्रे केवल पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे युगदृष्टा व्यक्तित्व थे जिन्होंने अपने विचारों, कार्यों और मार्गदर्शन से अनेक प्रतिभाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित किया। उनके संपर्क और सान्निध्य में आकर अनेक साहित्यकार, पत्रकार, समाजसेवी और राजनीतिक कार्यकर्ता राष्ट्रीय चेतना से अनुप्राणित हुए। पंडित रविशंकर शुक्ल, सेठ गोविंददास, गांधीवादी चिंतक सुन्दरलाल शर्मा, द्वारका प्रसाद मिश्र, लक्ष्मीधर वाजपेयी, माखनलाल चतुर्वेदी, लल्ली प्रसाद पाण्डेय तथा मावली प्रसाद श्रीवास्तव जैसे अनेक व्यक्तित्वों को उन्होंने प्रेरित, प्रोत्साहित और मार्गदर्शन प्रदान किया। उनके व्यक्तित्व की ऊष्मा और राष्ट्रनिष्ठ चिंतन ने इन विभूतियों को अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार सप्रे जी स्वयं एक संस्था बन गए, जिनके विचारों और संस्कारों ने एक पूरी पीढ़ी को राष्ट्रनिर्माण के पथ पर अग्रसर रही।
 
 
माधवराव सप्रे और उनके शिष्य माखनलाल चतुर्वेदी
 
 
 
माधवराव सप्रे के 'हिन्दी केसरी' ने सन्‌ 1908 में 'राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्कार' विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया। खंडवा के युवा अध्यापक माखनलाल चतुर्वेदी का निबंध प्रथम चुना गया। माधवराव सप्रे मध्यप्रांत में होनहार प्रतिभाओं की पहचान कर उन्हें आगे बढ़ाने, राष्ट्रीय आंदोलन के लिए कार्यकर्ता तैयार करने और पत्रकारिता एवं पत्रकारों को संस्कारित करने वाले मनीषी के रूप में समादृत रहे हैं। सप्रेजी को माखनलाल चतुर्वेदी की लेखनी में अपार संभावनाओं से युक्त पत्रकार-साहित्यकार के दर्शन हुए। उन्होंने माखनलालजी को इस दिशा में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित किया। यद्यपि अपने युग की हिन्दी संसार की इन दो महान हस्तियों का प्रथम सम्मिलन 1911 में हो पाया, तथापि उनके बीच गुरु-शिष्य का नाता तब तक पनप चुका था।
 
 
अप्रैल 1913 में खंडवा के हिन्दीसेवी कालूराम गंगराड़े ने मासिक पत्रिका 'प्रभा' का प्रकाशन आरंभ किया, जिसके संपादन का दायित्व माखनलालजी को सौंपा गया। सितंबर 1913 में उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित हो गए।
 
 
कर्मवीर के व्यवस्थापक माधवराव सप्रे
 
 
सन् 1920-21 का काल भारतीय राजनीति में परिवर्तन का दौर था। महात्मा गांधी राष्ट्रीय नेतृत्व के केंद्र में आ चुके थे। इसी समय ‘कर्मवीर’ पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। उस समय हिंदी के दो पत्र विशेष रूप से लोकप्रिय थे—कानपुर का ‘प्रताप’ और जबलपुर का ‘कर्मवीर’।
 
 
मध्यप्रांत की जनता में राजनीतिक चेतना जागृत करने में ‘कर्मवीर’ और उसके संचालन में सप्रे जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यद्यपि अनेक कारणों से इसका प्रकाशन कुछ समय बाद बंद हो गया, परंतु सप्रे जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने पुनः प्रयास कर खंडवा से ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन आरंभ कराया।
 
 
17 जनवरी 1920 को जबलपुर से ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन आरंभ हुआ। इसके संपादक के रूप में पंडित माखनलाल चतुर्वेदी को नियुक्त किया गया। बाद में 4 अप्रैल 1925 को खंडवा से इसका पुनर्प्रकाशन हुआ। यह पत्रिका स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण धरोहर सिद्ध हुई।
 
 
हिंदी केसरी, छत्तीसगढ़ मित्र और हिंदी ग्रंथमाला
 
 
पत्र-पत्रिका प्रकाशन की इच्छा सप्रे जी के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग थी। उन्होंने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, ‘हिंदी ग्रंथमाला’ और ‘हिंदी केसरी’ के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को नई दिशा दी। 1905 में उन्होंने हिंदी ग्रंथ प्रकाशक मंडल का गठन किया और उत्कृष्ट हिंदी रचनाओं के प्रकाशन का कार्य प्रारंभ किया। इस ग्रंथमाला में उनके स्वदेशी आंदोलन और बहिष्कार संबंधी लेख भी प्रकाशित हुए। इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि अंग्रेज सरकार ने 1909 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया।
 
 
13 अप्रैल 1907 को लोकमान्य तिलक की अनुमति से उन्होंने ‘हिंदी केसरी’ का प्रकाशन आरंभ किया। इस पत्र में अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध तीखे लेख प्रकाशित होते थे। परिणामस्वरूप 22 अगस्त 1908 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
 
 
साहित्यिक योगदान
 
 
माधवराव सप्रे हिंदी के प्रारंभिक कथाकारों में गिने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को हिंदी की पहली मौलिक कहानी होने का गौरव प्राप्त है। इस कहानी में मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक संबंधों और नैतिक मूल्यों का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है। सप्रे जी ने मौलिक लेखन के साथ-साथ अनेक महत्वपूर्ण मराठी ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद भी किया। समर्थ रामदास कृत ‘दासबोध’, लोकमान्य तिलक कृत ‘गीतारहस्य’ तथा चिंतामणि विनायक वैद्य कृत ‘महाभारत-मीमांसा’ उनके प्रमुख अनुवाद हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘दत्त भार्गव’, ‘श्रीराम चरित्र’, ‘एकनाथ चरित्र’ और ‘आत्मविद्या’ जैसी कृतियों का भी हिंदी रूपांतरण किया। मराठी भाषी होने के बावजूद उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा को अपना जीवनधर्म बनाया। उनके लेखन में राष्ट्रप्रेम, सामाजिक चेतना और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा अनुराग दिखाई देता है।

 
राष्ट्रीय चेतना के संवाहक
 
 
माधवराव सप्रे का मानना था कि पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक भूमि तैयार की। उनके लेखों में भारतीय संस्कृति, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का स्पष्ट संदेश मिलता है। अंग्रेजी शासन की नीतियों के विरोध में उनके लेखों ने जनमानस को जागृत किया और स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान किया।
 
 
माखनलाल चतुर्वेदी ने 11 सितम्बर 1926 के ‘कर्मवीर’ में लिखा था कि सप्रे जी हिंदी के आधार स्तंभ, राष्ट्रीय चेतना के संवाहक और समाज तथा राजनीति की संस्थाओं को दिशा देने वाले व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपने अस्तित्व को गौण बनाकर समाज और राष्ट्र को सर्वोपरि रखा।

 
सम्मान और विरासत
 
 
हिंदी पत्रकारिता और साहित्य में उनके अमूल्य योगदान को स्मरण करते हुए मध्यप्रदेश में ‘माधवराव सप्रे सम्मान’ प्रदान किया जाता है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा ‘पंडित माधवराव सप्रे राष्ट्रीय रचनात्मकता सम्मान’ भी स्थापित किया गया है।
उनके कुछ स्मरणीय कथन आज भी प्रेरणा देते हैं - 
“मैं महाराष्ट्री हूँ, पर हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदीभाषी को हो सकता है।”
“जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जागृत नहीं होती, वह शिक्षा किसी काम की नहीं है।”
“विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है।”
 
 
ज्ञान तीर्थ सप्रे संग्रहालय, भोपाल
 
 
माधवराव सप्रे की स्मृति में भोपाल में ‘माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान’ की स्थापना की गई। इसके संस्थापक-संयोजक पद्मश्री से सम्मानित विजयदत्त श्रीधर हैं। 19 जून 1984 को इसकी स्थापना का अभियान प्रारंभ हुआ। आज यह संग्रहालय भारतीय पत्रकारिता, साहित्य और शोध का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। यहाँ हजारों समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, संदर्भ ग्रंथ, पांडुलिपियाँ, गजेटियर, रिपोर्ट तथा दुर्लभ दस्तावेज संरक्षित हैं। बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय तथा कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय ने इसे शोध केंद्र के रूप में मान्यता प्रदान की है। संग्रहालय में माइक्रोफिल्मिंग, डिजिटाइजेशन और संरक्षण की आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इसके माध्यम से भारतीय पत्रकारिता के इतिहास को व्यवस्थित रूप से संरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है।
 
 
पुरुषोत्तम दास टंडन ने 1924 के हिंदी साहित्य सम्मेलन में कहा था - 
 
सप्रेजी उन थोड़े-से इने गिने मनुष्यों में हैं, जिन्होंने अपना सुख त्याग कर देश हित के लिये अपना जीवन समर्पण किया है। उन गिने हुए देशसेवकों में हैं, जिन्होंने, मातृभाषा दूसरी होते हुए भी, हिन्दी को राष्ट्रभाषा के नाते अपनाया है।.. उनका गीता रहस्य तो बहुतों ने देखा है। वह कितनी ऊँची वस्तु है, प्रायः सब ही पढ़े-लिखे लोग जानते हैं। किन्तु जो उनके जीवन-रहस्य से परिचित हैं वे इतना और अधिक जानते हैं कि सप्रेजी का व्यक्तित्व कितने उच्च आदर्श का है। सप्रेजी का सम्बन्ध राष्ट्रीयता से प्राचीन है। वह 'केसरी' होकर भारत में गरज चुके हैं। उनकी वाणी से कितने ही शत्रुओं के हृदय दहल चुके हैं। सप्रेजी जैसी महान आत्माओं द्वारा उसी प्रकार 'हिन्दी केसरी' फिर गरजेगा और राष्ट्र को आगे बढ़ावेगा।"
 
 
माधवराव सप्रे केवल एक पत्रकार नहीं थे, बल्कि वे राष्ट्रीय चेतना के प्रखर वाहक, साहित्यकार, समाज सुधारक और राष्ट्रनिर्माता भी थे। हिंदी पत्रकारिता को जनजागरण का माध्यम बनाने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। कितने ही महान व्यक्तित्व का निर्माण माधवराव सप्रे ने किया, आज भी उनके विचार पत्रकारों, साहित्यकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सत्य, निष्पक्षता तथा राष्ट्रहित के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देते हैं। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में उनका नाम सदैव आदर, श्रद्धा और गौरव के साथ स्मरण किया जाएगा।
 
 
पंडित माधवराव सप्रे जी ने अपने ओजस्वी लेखन, राष्ट्रवादी चिंतन और सामाजिक सरोकारों के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी तथा स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में जन-जागरण और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 
 
राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति उनकी अटूट निष्ठा, वैचारिक प्रतिबद्धता और समाजोन्मुख दृष्टि आज भी हमें राष्ट्रसेवा एवं जनकल्याण के लिए प्रेरित करती है।

 
राष्ट्रचेतना के पुरोधा का महाप्रयाण
 
 
हिंदी के पहले कहानीकार पं. माधवराव सप्रे का निधन 23 अप्रैल सन् 1926 में हुआ वह अंतिम बार बीमार पड़े, तब किसी को भी कष्ट नहीं दिया, अपनी औषधि स्वयं उठकर पी लेते और चुपचाप पड़े रहते। सप्रे जी के असामयिक निधन से प्रांत की पत्रकारिता को सचमुच बड़ी ठेस लगी और सार्वजनिक जीवन में बहुत काल तक अनिश्चितता छाई रही। सप्रे जी मध्यप्रदेश के प्रथम पत्रकार थे जिन्होंने जनता में राष्ट्रीय भावना को प्रज्वलित किया उनके द्वारा संचालित और संपादित पत्र 'छत्तीसगढ़ मित्र', 'हिंदी केसरी' और 'कर्मवीर' ने हिंदी-जगत में पत्रकारों के पावन कर्त्तव्यों से अवगत किया और कर्त्तव्य पर बलिदान होने की प्रेरणा दी जिसकी प्रतिध्वनि आज भी 'कर्मवीर' के 'उद्देश्य' के रूप में गूँज रही है-
 
 
"कर्म है अपना जीवन-प्राण,
कर्म में बसते हैं भगवान।
कर्म है मातृभूमि का मान,
कर्म पर आओ हों बलिदान॥