दीपक कुमार द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
कल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। देश और दुनिया में लाखों लोग योग करेंगे, योगासन करेंगे, सामूहिक कार्यक्रम होंगे, तस्वीरें खिंचेंगी और योग के शारीरिक लाभों पर चर्चा होगी। यह सब अच्छा है, होना भी चाहिए। किंतु मेरे मन में वर्षों से एक प्रश्न उठता रहा है कि क्या हम वास्तव में योग को समझ पाए हैं? क्या योग का अर्थ केवल शरीर को स्वस्थ रखना है? क्या योग का उद्देश्य केवल तनाव कम करना और रोगों से बचना है? या फिर योग उससे कहीं अधिक गहरा, व्यापक और आध्यात्मिक विषय है?
योग की चर्चा करते समय अक्सर हम उसके बाहरी स्वरूप पर रुक जाते हैं, जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा में योग का स्थान अत्यंत व्यापक है। योग का शाब्दिक अर्थ ही है जोड़ना। प्रश्न है कि किसका जोड़ना? भारतीय दर्शन का उत्तर है जीव और ब्रह्म का, आत्मा और परमात्मा का, सीमित और असीम का।
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में कहा है
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।” (योगसूत्र 1.2)
अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। यह परिभाषा बताती है कि योग का संबंध केवल शरीर से नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और अंततः आत्मा से है। योग वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करता है।
आज का मनुष्य ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने के लिए दूर-दूर तक उपग्रह भेज रहा है। अंतरिक्ष की गहराइयों में जीवन और सृष्टि के मूल तत्वों की खोज कर रहा है। विज्ञान की ये उपलब्धियाँ निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं। किंतु भारतीय मनीषा ने हजारों वर्ष पूर्व एक दूसरी दिशा में यात्रा की थी। उसने बाहर नहीं, भीतर की खोज की थी। उसने यह जानने का प्रयास किया था कि मनुष्य कौन है, आत्मा क्या है, जीवन का उद्देश्य क्या है और इस सृष्टि का मूल तत्व क्या है।
उपनिषदों से लेकर गीता और पुराणों तक भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल आग्रह यही रहा है कि मनुष्य स्वयं को जाने। छांदोग्य उपनिषद का प्रसिद्ध महावाक्य है “तत्त्वमसि”, अर्थात् “तू वही है।” बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया “अहं ब्रह्मास्मि”, अर्थात् “मैं ब्रह्म हूँ।” यह कोई दार्शनिक कल्पना मात्र नहीं थी, बल्कि उन ऋषियों का अनुभूत सत्य था जिन्होंने आत्मसाक्षात्कार का मार्ग अपनाया।
समस्या यह है कि आज हम उस अनुभूति की परंपरा से बहुत दूर चले गए हैं। हम भौतिक जगत को ही अंतिम सत्य मानने लगे हैं। हमारी शिक्षा, हमारे विमर्श और हमारे तर्क प्रायः आधिभौतिक जगत तक सीमित रह जाते हैं। जबकि भारतीय दृष्टि में सृष्टि का स्वरूप त्रिस्तरीय माना गया है आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। केवल स्थूल जगत को समझ लेना संपूर्ण सत्य को समझ लेना नहीं है।
कुछ समय पूर्व मैं पुराणों के संदर्भ में एक पुस्तक पढ़ रहा था। उसमें एक महत्वपूर्ण टिप्पणी थी “ज्योतिष के सिद्धान्त तो परिणाम की अपेक्षा से बने हैं; किंतु पुराणकार सर्वज्ञ महर्षियों को सत्य का वर्णन करना था। वे अपनी दिव्यशक्ति से निरपेक्ष सत्य का साक्षात्कार करने में समर्थ थे। अतएव एक अधूरी भ्रान्तिपूर्ण खोज के आधार पर पुराणों के किसी नियम को गलत नहीं ठहराया जा सकता, सो भी ऐसी दशा में जब कि उनके दूसरे वर्णन क्रमशः निर्भ्रान्त सत्य सिद्ध होते जा रहे हैं।”
आगे लिखा है -
“आज जब कि मनुष्य-समाज में ऐसा पुरुष मिलना असम्भव-प्राय हो गया है, जो मन को एकाग्र करके वेद के किसी भी एक मन्त्र का अर्थ-दर्शन कर सके, समाज के लिये वेदार्थ जानने का एकमात्र साधन पुराण ही रह गये हैं। पुराण दिव्य, अपौरुषेय ईश्वरीय ज्ञान के आकर हैं। वे ही हिन्दू-संस्कृति के प्रेरक, पोषक, आधार तथा भंडार हैं।”
इन पंक्तियों से सहमत होना या न होना अलग विषय हो सकता है, किंतु वे एक गंभीर प्रश्न अवश्य उठाती हैं। क्या आज का मनुष्य उतना अंतर्मुखी है कि वह आत्मा और ब्रह्म के विषय में अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त कर सके? क्या उसके भीतर वह एकाग्रता, वह तप और वह साधना बची है जिसके बल पर ऋषियों ने सत्य का साक्षात्कार किया था?
शायद इसी कारण आज हम आध्यात्मिक विषयों को भी केवल भौतिक तर्कों से समझने का प्रयास करते हैं।
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखा। एक युवती से पूछा गया कि भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत कैसे उठा लिया। उसने उत्तर दिया कि यह केवल प्रतीकात्मक कथा है। निस्संदेह भारतीय परंपरा में प्रतीकों का अत्यंत महत्व है। किंतु यह भी सत्य है कि हर बात को केवल प्रतीक कहकर समाप्त कर देना भारतीय दृष्टि नहीं है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को विराट स्वरूप दिखाते हैं
“पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।” (गीता 11.5)
यदि कोई व्यक्ति केवल स्थूल भौतिक जगत को ही सत्य मानेगा, तो उसके लिए विराट स्वरूप, दिव्य दर्शन या योगसिद्धियाँ असंभव प्रतीत होंगी। किंतु भारतीय दर्शन का आग्रह है कि भौतिक जगत ही अंतिम सत्य नहीं है।
शंकराचार्य ने कहा
“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।”
इस वाक्य का अर्थ यह नहीं कि संसार का अस्तित्व ही नहीं है। इसका अर्थ यह है कि परिवर्तनशील जगत अंतिम सत्य नहीं है। अंतिम सत्य ब्रह्म है।
यहीं योग की प्रासंगिकता सामने आती है। योग मनुष्य को उसी अंतिम सत्य की ओर ले जाने का साधन है। भक्ति उसका एक मार्ग है, कर्म दूसरा मार्ग है और ज्ञान तीसरा मार्ग है। गीता में श्रीकृष्ण इन तीनों मार्गों का वर्णन करते हैं। इनमें कोई विरोध नहीं है। तीनों का लक्ष्य एक ही है।
आज योग को प्रायः शारीरिक व्यायाम तक सीमित कर दिया गया है। जबकि भारतीय परंपरा में योग का अंतिम उद्देश्य मोक्ष रहा है। हमारे यहाँ धर्म, अर्थ और काम को भी मोक्ष की दिशा में ले जाने वाले पुरुषार्थ माना गया। हजारों मत, पंथ, संप्रदाय, आगम और निगम विकसित हुए, किंतु अंतिम लक्ष्य एक ही रहा परम तत्व की प्राप्ति।
योग उसी यात्रा का साधन है।
इसलिए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि कितने लोगों ने सूर्य नमस्कार किया या कितने देशों ने योग को अपनाया। उसका महत्व इस बात में है कि क्या हम योग को उसके वास्तविक स्वरूप में समझ पा रहे हैं।
यह भी विचारणीय है कि आज विश्व जिस ज्ञान परंपरा की ओर आकर्षित हो रहा है, उसी परंपरा के प्रति भारत के भीतर उपेक्षा का भाव क्यों दिखाई देता है। पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालय योग, ध्यान और भारतीय दर्शन पर शोध कर रहे हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान योग के अनेक लाभों को स्वीकार कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2014 में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाना भी इस वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। लेकिन भारत में अनेक लोग योग को या तो हास्य-विनोद का विषय बना देते हैं अथवा केवल एक शारीरिक गतिविधि मानकर उसकी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
योग का अर्थ केवल शरीर को लचीला बनाना नहीं है। योग का अर्थ स्वयं को जानना है। अपने भीतर स्थित उस तत्व की खोज करना है जिसके विषय में गीता कहती है
“न जायते म्रियते वा कदाचित्।” (गीता 2.20)
अर्थात् आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है।
यदि भारतीय ज्ञान परंपरा का यह दावा सत्य है कि आत्मा शाश्वत है, यदि कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत केवल कल्पना नहीं बल्कि अस्तित्व का नियम है, यदि ब्रह्म ही अंतिम सत्य है, तो फिर योग केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं रह जाता। वह मनुष्य जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों का उत्तर खोजने की प्रक्रिया बन जाता है।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर शायद हमें यही स्मरण करने की आवश्यकता है कि योग का जन्म केवल शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए नहीं हुआ था। वह आत्मा और परमात्मा के मिलन की विद्या है। वह आत्मान्वेषण का मार्ग है। वह उस सत्य तक पहुँचने का साधन है जिसे भारतीय मनीषा ने युगों पूर्व खोजने का प्रयास किया था।
जब तक योग को केवल व्यायाम माना जाएगा, तब तक उसका एक छोटा हिस्सा ही हमारे सामने रहेगा। किंतु जिस दिन हम योग को आत्मा, ब्रह्म, कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष की व्यापक भारतीय अवधारणा के संदर्भ में समझना प्रारंभ करेंगे, उस दिन योग दिवस केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्स्मरण का अवसर बन जाएगा।
संभव है कि मनुष्य अंतरिक्ष की अनंत दूरियों में ईश्वर को खोजने का प्रयास करता रहे। किंतु भारतीय ऋषियों का अनुभव यही था कि जिस सत्य की खोज बाहर की जा रही है, उसका द्वार भीतर खुलता है। योग उसी द्वार तक पहुँचने का मार्ग है। यही योग की वास्तविक महत्ता है और यही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का सबसे बड़ा संदेश भी।