डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक
"तपते तवे पर बैठकर भी जिसने सत्य का मान रखा,
धर्म और मानवता हेतु जिसने जीवन का बलिदान रखा।
युगों-युगों तक अमर रहेगा उसका त्याग महान,
गुरु अर्जन देव के चरणों में शत-शत श्रद्धा, शत-शत प्रणाम।"
गुरु अर्जन देव जी का संपूर्ण जीवन गुरुवाणी के इन शब्दों में प्रतिबिंबित होता है—
"तेरा किया मीठा लागै, हरि नामु पदारथु नानक मांगै॥"
अर्थात् प्रभु! आपकी हर इच्छा मुझे मधुर लगती है, मैं केवल आपके नाम का ही वरदान मांगता हूँ। माना जाता है कि भीषण यातनाओं के समय भी गुरु अर्जन देव जी के मुख से यही भाव प्रकट हुए थे। यह उनकी अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति, धैर्य और समर्पण का परिचायक है।
19 जून भारतीय इतिहास, सिख परंपरा और सनातन सांस्कृतिक चेतना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस है। यह दिन सिखों के पंचम गुरु, गुरु अर्जन देव जी के शहीदी दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है। उनका बलिदान केवल किसी एक पंथ या समुदाय का इतिहास नहीं है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, मानवाधिकारों, आध्यात्मिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए दिया गया एक अमर संदेश है।
गुरु अर्जन देव जी ने मानवता, समानता और सेवा को जीवन का आधार बनाया। उनकी वाणी में समरसता, शांति और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश मिलता है—
"सुखमनी सुख अमृत प्रभ नाम। भगत जना कै मन बिस्राम॥"
अर्थात् परमात्मा का नाम अमृत स्वरूप सुख का स्रोत है और भक्तों के मन को शांति प्रदान करता है।
सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में भारत मुगल शासन के अधीन था। उस समय धार्मिक असहिष्णुता और दमनकारी नीतियाँ बढ़ रही थीं। ऐसे समय में गुरु अर्जन देव जी ने अन्याय के समक्ष झुकने के बजाय सत्य और धर्म का मार्ग चुना। उन्होंने समाज को संगठित किया, सेवा और समरसता का संदेश दिया तथा प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर की संतान मानने की शिक्षा दी।
गुरु अर्जन देव जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान आदि ग्रंथ का संकलन है। उन्होंने विभिन्न संतों और भक्तों की वाणी को एकत्र कर भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की एकता को सुदृढ़ किया। उनकी वाणी में मानवता और सार्वभौमिक कल्याण की भावना स्पष्ट दिखाई देती है—
"न को बैरी नाही बिगाना, सगल संग हम कउ बन आई॥"
अर्थात् न कोई मेरा शत्रु है और न कोई पराया; सभी के साथ मेरा प्रेम और सौहार्द का संबंध है।
जब मुगल सत्ता ने उनसे अपने सिद्धांतों से समझौता करने का दबाव बनाया, तब उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया। तपते तवे पर बैठाए जाने और गर्म रेत डाले जाने जैसी अमानवीय यातनाओं के बावजूद वे अडिग रहे। उनका बलिदान भारतीय इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की रक्षा के सर्वोच्च उदाहरणों में गिना जाता है।
गुरु अर्जन देव जी का जीवन हमें यह भी सिखाता है—
"मन तू जोत सरूप है, अपना मूल पहचान॥"
अर्थात् हे मनुष्य! तू स्वयं ईश्वर की ज्योति का स्वरूप है, अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान।
आज जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब गुरु अर्जन देव जी का जीवन हमें सत्य, सेवा, समरसता और साहस का मार्ग दिखाता है। उनका संदेश केवल सिख समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
नई पीढ़ी को गुरु अर्जन देव जी के जीवन से यह सीख लेनी चाहिए कि सिद्धांतों पर अडिग रहना, अन्याय का प्रतिरोध करना, समाज की सेवा करना और मानवता को सर्वोपरि मानना ही सच्चा धर्म है।
पंचम पातशाह श्री गुरु अर्जन देव जी के शहीदी दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।
"तेरा किया मीठा लागै..." की भावना और "न को बैरी नाही बिगाना..." का संदेश आज भी भारत की सांस्कृतिक चेतना को दिशा प्रदान करता है तथा हमें एक समरस, न्यायपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से जागृत समाज के निर्माण की प्रेरणा देता है।