यूएनएससी में भारत का दो टूक : अस्थायी सीटें नहीं, सत्‍ता संरचना में बदलाव चाहिए

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    18-Jun-2026
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डॉ. मयंंक चतुर्वेदी
 
 
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार की बहुप्रतीक्षित बहस एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। दुनिया की सबसे प्रभावशाली वैश्विक संस्था की निर्णय प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक बनाने की मांग के बीच भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सिर्फ अस्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने से कोई वास्तविक बदलाव नहीं आएगा। भारत ने इसे "विफलता की कगार पर पहुंचा हुआ सुधार" बताते हुए चेतावनी दी है कि यदि स्थायी सदस्यता के विस्तार को नजरअंदाज किया गया, तो सुरक्षा परिषद की वैधता और प्रभावशीलता दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाएंगे।
 
 
दरअसल, संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश के हालिया वक्तव्य ने सुधार प्रक्रिया की खामियों को उजागर करते हुए उन देशों और समूहों को भी कठघरे में खड़ा किया है जो दशकों से यथास्थिति बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं और हर बार स्‍थायी सदस्‍य संख्‍या बढ़ाने का विरोध करते हैं या यह नहीं हो पाए, इसके लिए कूटनीतिक चालें चलते हैं।
 
 
1945 की संरचना, 21वीं सदी की चुनौतियां
 
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में तैयार की गई थी। उस समय की वैश्विक शक्ति-संतुलन व्यवस्था के आधार पर अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस को स्थायी सदस्य बनाया गया और उन्हें वीटो का अधिकार दिया गया, लेकिन पिछले आठ दशकों में दुनिया का राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है।
 
 
भारत का तर्क है कि आज की वैश्विक वास्तविकताओं में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की बढ़ती भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और वैश्विक दक्षिण की प्रमुख आवाज होने के बावजूद भारत का सुरक्षा परिषद में स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं होना मौजूदा व्यवस्था की सबसे बड़ी विसंगतियों में से एक माना जाता है।
 
 
भारत की आपत्ति: अस्थायी सदस्यता बढ़ाने से क्या बदलेगा?
 
अंतर-सरकारी संवाद (आईजीएन) की बैठक में भारत ने स्पष्ट किया कि अस्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव सुधार का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं करता। पी. हरीश ने कहा कि यदि स्थायी सदस्यता का विस्तार नहीं किया गया तो निर्णय लेने की शक्ति आज भी पी5 देशों के हाथों में ही केंद्रित रहेगी। ऐसे में भारत का मानना है कि सुधार का उद्देश्‍य परिषद की सदस्य संख्या बढ़ाने के स्‍थान पर शक्ति-संतुलन को अधिक न्यायसंगत और लोकतांत्रिक बनाना होना चाहिए। यदि नए देशों को केवल अस्थायी सीटें मिलती हैं, तो वे सीमित अवधि के लिए परिषद में मौजूद रहेंगे जबकि निर्णयों पर अंतिम प्रभाव स्थायी सदस्यों का ही बना रहेगा। यही कारण है जो भारत ने कहा है कि स्थायी सदस्यता के बिना कोई भी सुधार अधूरा और अप्रभावी साबित होगा।
 
 
'कॉफी क्लब' बनाम सुधार समर्थक देश
 
सुरक्षा परिषद सुधार की राह में सबसे बड़ा अवरोध इटली के नेतृत्व वाला "यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस" (यूएफसी) समूह माना जाता है, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है। यह समूह नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने का लगातार विरोध करता रहा है। अनौपचारिक रूप से "कॉफी क्लब" कहे जाने वाले इस समूह का तर्क है कि स्थायी सदस्यता बढ़ाने से परिषद और अधिक जटिल हो जाएगी। इसके बजाय यह अस्थायी सीटों की संख्या बढ़ाने की वकालत करता है।
 
 
भारत का आरोप है कि यूएफसी प्रक्रियागत तकनीकों का इस्तेमाल कर सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ने से रोकता रहा है। नई स्थायी सीटों पर चर्चा के लिए औपचारिक वार्ता-पाठ तैयार करने के हर प्रयास को यह समूह बाधित करता रहा है। भारत के अनुसार, यह रुख वास्तव में यथास्थिति बनाए रखने और मौजूदा शक्ति-संतुलन को संरक्षित करने का प्रयास है।
 
 
बहुमत की आवाज दबाने का आरोप
 
भारत ने हाल ही में जारी "एलिमेंट्स पेपर" पर भी गंभीर आपत्ति जताई है। सह-अध्यक्षों द्वारा तैयार इस दस्तावेज का उद्देश्य सदस्य देशों के विचारों का सार प्रस्तुत करना था, लेकिन भारत का आरोप है कि इसमें वैश्विक बहुमत की राय को कमतर करके दिखाया गया है। भारत और जी-4 देशों (भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान) का दावा है कि 122 सदस्य देशों में से 113 देशों ने स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार का समर्थन किया है। यानी लगभग 93 प्रतिशत देशों ने स्पष्ट रूप से व्यापक सुधार की मांग की है।
 
 
इसके बावजूद दस्तावेज में इसे "महत्वपूर्ण समर्थन" बताना भारत को स्वीकार्य नहीं है। भारत का कहना है कि कुछ देशों के विरोध को असंगत रूप से अधिक महत्व दियाजा रहा है, जबकि विशाल बहुमत की राय को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा।
 
 
'पहले सहमति फिर पाठ' की नीति पर सवाल
 
 
भारत ने उस तर्क को भी खारिज किया है जिसके अनुसार सभी मुद्दों पर आम सहमति बनने के बाद ही औपचारिक वार्ता-पाठ तैयार किया जाए। पी. हरीश ने इसे "घोड़े के आगे गाड़ी रखने" जैसा बताया। उनका कहना है कि संयुक्त राष्ट्र की अधिकांश वार्ताएं किसी लिखित पाठ के आधार पर ही आगे बढ़ती हैं। बातचीत का उद्देश्य ही सहमति बनाना होता है। यदि पहले से पूर्ण सहमति की शर्त रख दी जाए, तो कोई भी सुधार प्रक्रिया कभी आगे नहीं बढ़ सकेगी। भारत ने मांग की है कि सह-अध्यक्ष एक औपचारिक नेगोशिएटिंग टेक्स्ट तैयार करें और उसके साथ स्पष्ट समयसीमा तथा लक्ष्य भी निर्धारित किए जाएं, ताकि सुधार प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक लंबित न रहे।
 
 
लोकतंत्र बनाम विशेषाधिकार की बहस
 
 
भारत ने सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र महासभा के बीच मूलभूत अंतर को भी रेखांकित किया है। महासभा में सभी सदस्य देशों को समान अधिकार प्राप्त हैं और वहां संप्रभु समानता का सिद्धांत लागू होता है। लेकिन सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति में हैं। यहां भारत का तर्क है कि आज की दुनिया में ऐसी व्यवस्था लोकतांत्रिक मूल्यों और वैश्विक प्रतिनिधित्व की भावना के अनुरूप नहीं है। यदि संयुक्त राष्ट्र को प्रभावी और विश्वसनीय बनाए रखना है तो सुरक्षा परिषद को भी बदलती वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप ढालना होगा।
 
 
जी-4 की रणनीति और भारत का लक्ष्य
 
 
भारत लंबे समय से ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ मिलकर सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है। जी-4 देशों का तर्क है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के प्रमुख स्तंभ हैं और इसलिए उन्हें स्थायी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। भारत विशेष रूप से यह रेखांकित करता रहा है कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और वैश्विक दक्षिण की आवाज भी परिषद में स्थायी रूप से शामिल होनी चाहिए। इससे परिषद अधिक संतुलित, प्रतिनिधिक और प्रभावी बन सकेगी।
 
 
एक तरह से देखा जाए तो यूएनएससी में भारत जो मांग कर रहा है, वह समय की आवश्‍यकता है। आज के दौर में यह वैश्विक शासन व्यवस्था में व्यापक लोकतंत्रीकरण की मांग का हिस्सा है। भारत का संदेश स्पष्ट है कि दुनिया बदल चुकी है, किंतु सुरक्षा परिषद की संरचना अभी भी 1945 के राजनीतिक नक्शे में अटकी हुई है।ऐसे में भारत समेत अनेक देशों का मानना है कि सुरक्षा परिषद को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप ढालना अब अनिवार्यता बन चुकी है, जिसे हर हाल में पूरा किया जाना ही चाहिए।