शुभानन मधुसूदन खेमरिया
युवा लेखक, स्तंभकार
“विदेशी सत्ता की दासता को ठुकराकर बुंदेली धरा पर स्वाधीनता का नया सूर्य उगाने वाले राष्ट्रनायक”
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने अपने अदम्य साहस, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति से इतिहास की दिशा बदल दी। बुंदेलखंड की पावन धरती पर जन्मे महाराजा छत्रसाल ऐसे ही युगनायक थे, जिन्होंने मुगल साम्राज्य की अपार शक्ति को चुनौती देकर स्वराज्य की स्थापना की और स्वतंत्रता, संस्कृति तथा स्वाभिमान की ज्योति प्रज्वलित की।
4 मई 1649 को वीर बुंदेला सरदार चंपतराय और रानी लाल कुंवारी के घर जन्मे छत्रसाल का बचपन संघर्षों के बीच बीता। माता-पिता का साया प्रारंभिक अवस्था में ही उठ गया, किंतु विपरीत परिस्थितियाँ उनके संकल्प को डिगा नहीं सकीं। युवावस्था में उन्होंने कुछ समय मुगल सेना में सेवा की, परंतु शीघ्र ही उन्हें यह अनुभव हो गया कि पराधीनता में रहकर मातृभूमि और संस्कृति की रक्षा संभव नहीं है।
उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब उनकी भेंट छत्रपति शिवाजी महाराज से हुई। शिवाजी महाराज के ‘हिंदवी स्वराज्य’ के विचार ने उनके अंतर्मन में राष्ट्रभक्ति की प्रबल ज्वाला प्रज्वलित कर दी। प्रेरणा लेकर वे बुंदेलखंड लौटे और मात्र पाँच सवारों तथा पच्चीस सैनिकों के साथ मुगल सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल फूँक दिया।
सीमित संसाधनों के बावजूद छत्रसाल ने अपनी अद्भुत युद्धनीति, संगठन क्षमता और जनसमर्थन के बल पर एक के बाद एक विजय प्राप्त की। उन्होंने स्थानीय जनता, जनजातियों और वीर युवाओं को संगठित कर छापामार युद्ध पद्धति अपनाई तथा मुगल शक्ति को लगातार चुनौती दी। धीरे-धीरे बुंदेलखंड का विशाल भूभाग विदेशी शासन से मुक्त होने लगा और स्वराज्य का ध्वज लहराने लगा।
सन् 1678 में उन्होंने पन्ना को अपनी राजधानी बनाया। उनका शासन केवल राजनीतिक सत्ता तक सीमित नहीं था, बल्कि जनकल्याण, न्याय और समृद्धि पर आधारित था। उनके राज्य में कृषि, व्यापार, संस्कृति और शिक्षा को संरक्षण मिला। उनकी न्यायप्रियता और जनहितैषी शासन के कारण बुंदेलखंड में समृद्धि का नया युग प्रारंभ हुआ। इसी कारण लोकमानस में यह कहावत प्रसिद्ध हुई—
"छत्ता तेरे राज में, धक-धक धरती होय,
जित-जित घोड़ा पग धरे, तित-तित हीरा होय।"
महाराजा छत्रसाल केवल महान योद्धा ही नहीं, बल्कि कला, साहित्य और संस्कृति के संरक्षक भी थे। उनके दरबार में विद्वानों और कवियों को विशेष सम्मान प्राप्त था। महाकवि भूषण ने उनके शौर्य और राष्ट्रभक्ति से प्रभावित होकर ‘छत्रसाल दशक’ जैसी अमर कृति की रचना की। स्वयं छत्रसाल भी साहित्य और अध्यात्म के गहन ज्ञाता थे।
दिसंबर 1731 में यह महान विभूति पंचतत्व में विलीन हो गई, किंतु उनका संघर्ष, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने सिद्ध किया कि यदि संकल्प दृढ़ हो, उद्देश्य पवित्र हो और मातृभूमि के प्रति समर्पण अटूट हो, तो सीमित साधनों से भी इतिहास रचा जा सकता है।
आज जब भारत विश्व मंच पर नई ऊँचाइयों की ओर अग्रसर है, तब महाराजा छत्रसाल का जीवन हमें आत्मविश्वास, राष्ट्रभक्ति और स्वराज्य के आदर्शों का स्मरण कराता है। बुंदेलखंड का यह सूर्य आज भी अपने तेज से आने वाली पीढ़ियों का मार्ग आलोकित कर रहा है।
बुंदेलखंड के इस अमर सपूत, स्वराज्य के महान सेनानी और राष्ट्रगौरव महाराजा छत्रसाल को उनकी पावन जयंती पर शत-शत नमन।