17 जून 1540 : स्वत्व के लिये पूरे जीवन संघर्ष करने वाले महाराणा प्रताप का जन्म

छल, बल और प्रलोभन से भी अकबर जीत न पाया

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    16-Jun-2026
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महाराणा प्रताप
 
 
रमेश शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार 
 
 
चित्तौड़ के महाराणा प्रताप भारत के महानायक हैं, जो मुगल बादशाह अकबर के छल, बल और प्रलोभन से भी विचलित न हुये और अपने स्वत्व रक्षा के लिये पूरे जीवन संघर्ष किया। उन्होंने आमने सामने का युद्ध भी किया और छापामार युद्ध भी। ऐसे महानायक महाराणा प्रताप का जन्म राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रम संवत 1697 (1540 ईस्वी) में हुआ। इस वर्ष तिथि वर्ष 17 जून को पड़ रही है। उनके पिता महाराणा उदयसिंह सुप्रसिद्ध योद्धा राणा सांगा के पुत्र थे। यह वही राणा उदयसिंह हैं बचपन में जिनके प्राणों की रक्षा इतिहास प्रसिद्ध पन्नाधाय ने की थी। राणा प्रताप की माता रानी जयवन्तिबाई कुम्भलगढ़ की राजकुमारी थीं। उनके पिता अखैराज सोनगरा सुप्रसिद्ध सेना नायक थे। यह किला इन दिनों पाली जिले के अंतर्गत आता है ।
 
 
चित्तौड़ पर धोखे से बलवीर ने अधिकार कर लिया था । वह चित्तौड़ के उत्तराधिकारी राणा उदयसिंह को भी मारना चाहता था। लेकिन पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर उदयसिंह को बचाया और कुम्भलगढ़ लेकर चलीं गईं। उदयसिंह यहीं बड़े हुये और उनका विवाह जयवन्तिबाई से हुआ। समय के साथ राणा उदयसिंह ने चित्तौड़ को वापस प्राप्त करने का अभियान छेड़ा। सुरक्षा की दृष्टि से रानी जयवन्तिबाई कुम्भलगढ़ में ही रहीं और वहीं प्रताप को जन्म दिया। प्रताप के बचपन का नाम कीका था। उनका बचपन भील वनवासी समाज के बच्चों के साथ बीता। उन्हीं के साथ युद्ध कला सीखी। उधर राणा उदयसिंह ने चित्तौड़ अपना अधिकार कर लिया। राजनैतिक समीकरणों को सशक्त बनाने केलिये राणा उदयसिंह ने दो विवाह और कर लिये। इस कारण उनका ध्यान रानी जयवन्तिबाई की ओर से कुछ कम हुआ। और प्रताप के लालन पालन का पूरा दायित्व रानी जयवंती बाई ने संभाला। प्रताप उन्हीं के मार्गदर्शन में बड़े हुये ।
 
 
महाराणा प्रताप ने बत्तीस वर्ष की आयु में 1 मार्च 1572 को चित्तौड़ का सिंहासन संभाला । सिहासन संभालते ही अपने राज्य की प्रगति के अनेक कदम उठाये इसमें वनोपज के व्यापार और ग्राम विकास प्रमुख था। किले और बावड़ियों का निर्माण कराया। कुछ समय तो सामान्य बीता पर शाँति और विकास कार्य अधिक न चल सका । बादशाह अकबर ने प्रताप को अपने आधीन करने के अनेक षड्यंत्र किये। पहले मुगल सेना से छोटी बड़ी झड़पें और समझौते का संदेश। लेकिन महाराणा प्रताप अपने शासन की सुरक्षा करते रहे। अंततः ने अकबर ने सैन्य दमन का मार्ग अपनाया। और चित्तौड पर लगातार हमले किये। सबसे भीषण युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी को हुआ था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप के साथ भील सेना के सरदार, पानरवा के ठाकुर राणा पूंजा सोलंकी, ग्वालियर के राजा रामशाह तोमर एवम उनके 3 पुत्र कुंवर शालीवान सिंह, भवानी सिंह, प्रताप सिंह तथा उनका पौत्र बलभद्र सिंह सादड़ी के झाला बीदा, झाला मान सिंह और सरदार गढ़ से भीम सिंह प्रमुख थे । अग्रिम दस्ते में एक मुस्लिम सरदार हकीम खाँ सूरी भी थे ।
 
 
युद्ध स्थल गोगुन्दा के पास हल्दीघाटी में एक संकरा पहाड़ी दर्रा था। महाराणा प्रताप ने लगभग 3,000 घुड़सवारों और 400 भील धनुर्धारियों के बल को मैदान में उतारा। मुगलों का नेतृत्व आमेर के राजा मान सिंह और मुगल सेनापति आसफखाँ ने किया था। यह युद्ध केवल एक दिन चला था । लेकिन यह इतना भीषण था जिसमें दोनों ओर के लगभग सत्रह हजार सैनिकों की मौत हुई थी युद्ध में महाराणा प्रताप भी घायल हो गये । उन्हे झाला मानसिंह ने सुरक्षित निकाला और स्वयं युद्ध की कमान संभाली। इस युद्ध में भी मेवाड़ के महाराणा प्रताप ही विजय हुए थे । अकबर की फौज ने लूटपाट तो बहुत की पर चित्तौड पर अधिकार न कर सकी। केवल तीन माह में ही प्रताप की सेना ने उस मैदानी क्षेत्र पर अपना फिर से अधिकार कर लिया जिसपर अकबर ने अपनी छावनी बना ली थी । इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत बलिदान हुये ।
 
 
युद्ध करते समय मानसिंह के हाथी मरदाना के सूंड में लगी कटार के कारण चेतक घायल हो गया एवम महाराणा प्रताप को लेकर युद्ध से बाहर निकल गया कहा घायल अवस्था में नाले को पार कर बालिचा गांव में चेतक की मृत्यु हुई जहाँ आज चेतक का स्मारक बना हुआ है। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। पर कभी सफल न हो सका । इसके बाद ही भामाशाह ने धन अर्पित करके महाराणा प्रताप की सहायता की।
 
 
राजस्थान के इतिहास दूसरा बड़ा युद्ध 1582 में हुआ । इसे दिवेर का युद्ध कहा जाता है । इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "मेवाड़ का मैराथन" कहा है।
 
 
अकबर राणा प्रताप को अपने आधीन करना चाहता था । जब प्रताप किसी प्रकार न माने तब वह उन्हे जीवित पकड़ना चाहता था। इसके लिये अकबर ने अनेक बार सैन्य अभियान छेड़ा लेकिन हर बार मुगल जीवित महाराणा प्रताप मुगल सैनिकों को मात खानी पड़ी। हल्दीघाटी के युद्ध में भी प्रताप ही जीते थे। हल्दीघाटी में अपनी सेना के पराजित होने के बाद 1576 में स्वयं अकबर विशाल सेना के साथ चित्तौड़ आया पर राणा प्रताप को खोज नहीं पाया, बल्कि महाराणा प्रताप ने अपनी छापामार युद्ध शैली से मुगल सेना की पूरी रसद छीन ली थी जिससे मुगल सेना का भारी विनाश हुआ । अंत में अकबर बांसवाड़ा होकर मालवा चला गया। इसके बाद शाहबाज खान के नेतृत्व में सेना भेजी। उसके बाद अब्दुल रहीम खान-खाना के नेतृत्व में मुगल सेना आई । इस सेना को भी असफलता ही हाथ लगी । इतिहास के विवरण गवाह हैं कि अकबर की सेना ने लगातार नौ वर्षों तक चित्तौड़ पर आक्रमण किये और महाराणा प्रताप की खोज में अरावली पर्वत के आसपास गाँव और वनों में छापे मारे पर कभी सफलता नहीं मिली ।
 
 
महाराणा की सेना में एक राजा, तीन राव, सात रावत, 15000 अश्वरोही, 100 हाथी, 20000 पैदल और 100 वाजित्र थे। इतनी बड़ी सेना को खाद्य सहित सभी व्यवस्थाएँ महाराणा प्रताप करते थे।
 
 
महाराणा प्रताप का पूरा जीवन निरंतर युद्ध करते हुये ही बीता । अंततः 19 जनवरी 1597 में महाराणा प्रताप ने अपना शरीर त्याग दिया ।