‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ लोकमाता के संपूर्ण जीवन का जीवंत दस्तावेज है : गिरीश उपाध्याय

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    01-Jun-2026
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अहिल्या जी कार्यक्रम
 
 
भोपाल। लोकमाता पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन, व्यक्तित्व, कृतित्व एवं राष्ट्रदृष्टि को केंद्र में रखकर लिखी गई लघु नाटिका आधारित पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ पर आयोजित परिचर्चा एवं पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को अपने वास्तविक राष्ट्रीय नायकों से परिचित कराने के लिए ऐसे साहित्यिक और नाट्य प्रयास समय की आवश्यकता हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता एवं लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर के चित्र पर पुष्पार्चन तथा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
पुस्तक की लेखिका, निराला सृजन पीठ की निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे ने प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए पुस्तक की रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पुस्तक का शीर्षक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ शक्ति स्वरूपा देवी की आराधना से जुड़े प्रसिद्ध श्लोक “या देवी सर्वभूतेषु...” से प्रेरित है। उनके अनुसार देवी अहिल्याबाई होल्कर का जीवन शक्ति, बुद्धि, विद्या, करुणा, मातृत्व और लोककल्याण के सभी गुणों का अद्वितीय समन्वय था। इसी कारण पुस्तक का नामकरण इस भाव के अनुरूप किया गया।
 

साधना जी  
डॉ. बलवटे ने कहा कि अहिल्याबाई को प्राप्त ‘लोकमाता’ और ‘पुण्यश्लोका’ जैसी उपाधियाँ किसी शासन या सत्ता द्वारा नहीं, बल्कि जनता द्वारा प्रदान की गई थीं। उन्होंने कहा कि सत्ता में रहते हुए भी अपने चरित्र को निष्कलंक, विनम्र और लोकहितकारी बनाए रखना अत्यंत दुर्लभ है। यही कारण है कि भगवान विष्णु, धर्मराज युधिष्ठिर और राजा नल के पश्चात अहिल्याबाई होल्कर को ‘पुण्यश्लोका’ के रूप में स्मरण किया जाता है। उन्होंने बताया कि यह नाटिका मूलतः एक उपन्यास की अवधारणा से विकसित हुई, जिसे बाद में व्यापक जनसंपर्क और मंचीय प्रभाव को ध्यान में रखते हुए नाटक के रूप में रूपांतरित किया गया। 

लोकेन्द्र जी  
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. लोकेंद्र सिंह, सहायक प्राध्यापक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने कहा कि सनातन संस्कृति में मानव धर्म को सर्वोच्च माना गया है और मानवता की स्थापना ही धर्म की स्थापना है। उन्होंने कहा कि देवी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने सम्पूर्ण जीवन को धर्म, न्याय और लोककल्याण के लिए समर्पित किया। वे सम्पूर्ण प्रजा को अपनी संतान के समान मानती थीं, इसलिए उन्हें ‘मालवा की मातोश्री’ कहा गया।
 
 
डॉ. लोकेंद्र सिंह ने कहा कि त्याग, तपस्या, समर्पण, अनुशासन और न्याय मानव धर्म के मूल स्तंभ हैं और अहिल्याबाई का संपूर्ण जीवन इन मूल्यों का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी संक्षिप्त माध्यमों से अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहती है, ऐसे में ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ जैसी पुस्तकें उनके लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध होंगी। उन्होंने कहा कि यह कृति केवल एक नाटक नहीं, बल्कि लोकमाता के विराट जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करती है।
 
 
गिरीश जी  
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने कहा कि किसी भी नाटक का शीर्षक उसकी आत्मा होता है और ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ शीर्षक से बेहतर इस कृति के लिए कुछ और नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास लेखन में अनेक बार आक्रांताओं को महिमामंडित किया गया, जबकि भारतीय जीवन मूल्यों को जीने वाले शासकों और नायकों को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने कहा कि अहिल्याबाई का जीवन लोककल्याण, न्याय, मातृत्व और उत्तरदायी शासन का अनुपम उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि यह कृति  के जीवन की एक संपूर्ण जीवनी की तरह है, जिसमें संघर्ष, प्रशासन, सामाजिक सुधार, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रचेतना के विविध आयाम समाहित हैं। उन्होंने इस नाटक के अधिकाधिक मंचन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि दृश्य माध्यमों के जरिए आज की युवा पीढ़ी तक ऐसे आदर्श चरित्रों को प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सकता है।
 
 

लाजपत जी  
अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष लाजपत आहुजा ने भारतीय परंपरा और पाश्चात्य ‘ट्रेडिशन’ के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा केवल हस्तांतरण नहीं, बल्कि सतत संवर्धन और श्रेष्ठता के साथ आगे बढ़ने की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि डॉ. साधना बलवटे की यह कृति इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है।
उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी में जिज्ञासा प्रबल है और यह समाज का दायित्व है कि उसे सही दिशा में प्रेरित किया जाए। उन्होंने देवी अहिल्याबाई के राष्ट्रव्यापी सांस्कृतिक योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि सोमनाथ, काशी, गया, उज्जैन और देश के अनेक तीर्थस्थलों पर उनके द्वारा कराए गए निर्माण इस तथ्य के सशक्त प्रमाण हैं कि भारत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से सदैव एक रहा है।
आहुजा ने देवी अहिल्याबाई के आर्थिक दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने महेश्वर में वस्त्र उद्योग, बुनकरों के प्रशिक्षण और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए जो कार्य किए, वे अपने समय से बहुत आगे की सोच को प्रदर्शित करते हैं। उन्होंने महेश्वरी और चंदेरी वस्त्र परंपरा के विकास में उनके योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया।
वक्ताओं ने कहा कि पुस्तक में लोकमाता के जीवन के विभिन्न आयामों जैसे स्त्री सेना का गठन, महिला शिक्षा, विधवाओं के अधिकार, कृषि और हस्तशिल्प को प्रोत्साहन, न्यायप्रिय शासन, धार्मिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण तथा राष्ट्रव्यापी लोकसेवा के कार्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। नाटिका की भाषा सरल, सहज और बोधगम्य है, जिससे यह सभी आयु वर्ग के पाठकों एवं दर्शकों के लिए उपयोगी बनती है।
कार्यक्रम का संचालन पत्रकारिता के विद्यार्थी नैवेद्य पुरोहित ने किया तथा आभार प्रदर्शन रोहन गिरि ने किया।