दीपक कुमार द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
भारत के सामने आज सबसे बड़ा संकट सीमा पर खड़ा शत्रु नहीं है। उससे कहीं अधिक भयावह संकट वह है जो शिक्षा, मनोविज्ञान, संस्कृति, परिवार व्यवस्था और बाल चेतना के माध्यम से भीतर ही भीतर देश को खोखला करने में लगा हुआ है। यह कार्य किसी एक संस्था या एक देश द्वारा नहीं किया जा रहा, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की नीतियों, वैश्विक वित्तपोषित गैर-सरकारी संगठनों, पश्चिमी विश्वविद्यालयों से निकली वामपंथी वैचारिक संरचनाओं, क्रिटिकल रेस थ्योरी, डीईआईए मॉडल, वैश्विक बाजार शक्तियों और डिजिटल तकनीकी तंत्र के संयुक्त अभियान के रूप में चल रहा है। दुर्भाग्य यह है कि भारत का शिक्षित वर्ग अभी भी इसे “आधुनिक शिक्षा सुधार” समझ रहा है, जबकि वास्तव में यह भारत की सभ्यतागत संरचना को तोड़ने का दीर्घकालिक वैचारिक प्रकल्प है।
इस पूरे अभियान का सबसे बड़ा लक्ष्य है परिवार को समाप्त करना, परंपरा को संदेहास्पद बनाना, धर्म को दमनकारी सिद्ध करना और आने वाली पीढ़ी को उसकी सांस्कृतिक स्मृति से काट देना। आज बच्चों को विद्यालयों, डिजिटल प्लेटफॉर्मों, एआई चैटबॉट्स, मनोवैज्ञानिक कार्यक्रमों और तथाकथित सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा के माध्यम से यह सिखाया जा रहा है कि माता-पिता अंतिम नैतिक प्राधिकारी नहीं हैं। उन्हें बताया जा रहा है कि परिवार “पुराने मूल्यों” का केंद्र है और वास्तविक “मुक्ति” व्यक्तिगत इच्छाओं, पहचान-आधारित राजनीति और संस्थागत विद्रोह में है। यह साधारण परिवर्तन नहीं है। यह वही प्रक्रिया है जिसके माध्यम से पश्चिमी समाजों में पारिवारिक संरचना को तोड़ा गया और अब वही प्रयोग भारत में लागू किया जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र से जुड़े एसईएल और सीएसई जैसे कार्यक्रमों को भारत में जिस प्रकार लागू किया जा रहा है, उस पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए था। परंतु बिना व्यापक सार्वजनिक चर्चा, बिना मनोवैज्ञानिक अध्ययन और बिना अभिभावकों की वास्तविक सहमति के इन्हें शिक्षा व्यवस्था में प्रवेश दिया गया। बच्चों की मानसिक संरचना, भावनात्मक विकास और यौन चेतना के साथ इतने बड़े स्तर पर प्रयोग किए जा रहे हैं, किंतु कोई यह पूछने को तैयार नहीं कि इनके दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे। जो अभिभावक प्रश्न उठाते हैं, उन्हें “रूढ़िवादी”, “अवैज्ञानिक” अथवा “कट्टर” कहकर चुप कराने का प्रयास किया जाता है। यह लोकतांत्रिक विमर्श नहीं, वैचारिक दमन है।
सबसे गंभीर विषय तथाकथित “समग्र यौन शिक्षा” का है। भारत में इसे स्वास्थ्य शिक्षा के नाम पर प्रस्तुत किया जाता है, किंतु वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। यह बच्चों की चेतना को समयपूर्व यौनिकता, पहचान भ्रम और अधिकारवादी मनोविज्ञान की ओर धकेलने का प्रयास है। आज डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल एप्लीकेशन, एआई चैटबॉट्स और प्रशिक्षित “पीयर एजुकेटर्स” बच्चों के मानस में प्रवेश कर चुके हैं। बच्चे अपने माता-पिता से अधिक स्क्रीन पर विश्वास करने लगे हैं। आने वाले समय में एआर, वीआर और एआई आधारित यौन तकनीकों के माध्यम से एक ऐसा समाज निर्मित किया जा रहा है जो वास्तविक मानवीय संबंधों से कटकर आभासी सुख और कृत्रिम उत्तेजना पर निर्भर होगा। यह केवल नैतिक संकट नहीं है; यह मनुष्य की मानसिक स्वतंत्रता पर आक्रमण है।
भारतीय सभ्यता ने कभी काम को अपराध नहीं माना। हिंदू दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों का संतुलन है। किंतु भारतीय दृष्टि में काम भी धर्म के अनुशासन के भीतर था। विद्यार्थी जीवन में ब्रह्मचर्य केवल धार्मिक अवधारणा नहीं थी; वह ऊर्जा, बुद्धि और व्यक्तित्व के संरक्षण की वैज्ञानिक प्रणाली थी। योग, प्राणायाम, ध्यान, संगीत और ललित कलाएं मनुष्य की चेतना को ऊपर उठाने के साधन थे। आज वही भारत अपने बच्चों को उपभोगवादी यौन संस्कृति के हवाले कर रहा है। परिणामस्वरूप एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जो भीतर से अस्थिर, मानसिक रूप से कुंठित, भावनात्मक रूप से अकेली और सांस्कृतिक रूप से रिक्त होगी।
यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि यह सब केवल “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के लिए नहीं किया जा रहा। इसके पीछे वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं के स्पष्ट हित हैं। वैश्विक बाजार को ऐसे मनुष्य चाहिए जो अपनी संस्कृति, परिवार और समुदाय से कटे हों, क्योंकि जड़ों से जुड़ा हुआ व्यक्ति बाजार का पूर्ण उपभोक्ता नहीं बनता। परिवार व्यक्ति को नियंत्रण, अनुशासन, त्याग और उत्तरदायित्व सिखाता है; इसलिए परिवार वैश्विक उपभोक्तावादी मॉडल के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। जब व्यक्ति अकेला पड़ जाता है, तब वह डिजिटल कंपनियों, एआई प्रणालियों, मनोरंजन उद्योग और वैश्विक कॉर्पोरेट संरचनाओं पर निर्भर हो जाता है।
भारत में इस पूरी प्रक्रिया को सामाजिक न्याय, समावेशन और अधिकारों की भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है। क्रिटिकल रेस थ्योरी और डीईआईए जैसे पश्चिमी वैचारिक मॉडल भारतीय समाज पर आरोपित किए जा रहे हैं। बच्चों को बचपन से यह सिखाया जा रहा है कि समाज सहयोग और कर्तव्य पर नहीं, बल्कि स्थायी उत्पीड़न पर आधारित है। उन्हें हर संबंध में संघर्ष दिखाई दे पुरुष बनाम महिला, जाति बनाम जाति, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक, परंपरा बनाम आधुनिकता। यह शिक्षा नहीं, वैचारिक ध्रुवीकरण का प्रशिक्षण है। इससे समाज में स्थायी अस्थिरता उत्पन्न होती है, और अस्थिर समाजों को नियंत्रित करना सदैव सरल होता है।
यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि इन कार्यक्रमों का लक्ष्य मुख्यतः हिंदू समाज क्यों बन रहा है। शिक्षा के अधिकार कानून के अंतर्गत अनेक अल्पसंख्यक संस्थानों को विशेष संरक्षण प्राप्त है, जबकि हिंदू समाज की संस्थाओं पर कठोर नियम लागू किए जाते हैं। परिणाम यह है कि हिंदू बच्चों को इन प्रयोगों का सबसे बड़ा क्षेत्र बना दिया गया है। विडंबना यह है कि जिस सभ्यता ने योग, ध्यान, आयुर्वेद, गुरुकुल और समग्र शिक्षा की अवधारणा विश्व को दी, उसी सभ्यता की शिक्षा प्रणाली आज पश्चिमी मनोवैज्ञानिक मॉडलों की नकल में अपनी आत्मा खो रही है।
चीन का उदाहरण हमारे सामने है। वह वैश्विक नीतियों को अपने राष्ट्रीय और सांस्कृतिक हितों के अनुसार ढालता है। भारत ने टिक-टॉक जैसे चीनी ऐपों पर प्रतिबंध इसलिए लगाया क्योंकि वे युवाओं का डेटा एकत्र कर व्यवहारिक पैटर्न तैयार कर रहे थे। परंतु प्रश्न यह है कि यदि विदेशी डिजिटल मंच और शिक्षा मॉडल बच्चों की चेतना, यौन दृष्टि, सांस्कृतिक सोच और राजनीतिक मनोविज्ञान को नियंत्रित करने लगें, तो क्या वह उससे भी बड़ा खतरा नहीं है? डेटा केवल सूचना नहीं देता; वह मनुष्य के व्यवहार, इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने का साधन बन जाता है।
आज भारत में एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जा रही है जो डिग्रियों से भरी होगी, परंतु मानसिक रूप से निर्बल होगी; जो अधिकारों की भाषा तो बोलेगी, किंतु कर्तव्य नहीं समझेगी; जो तकनीकी रूप से प्रशिक्षित होगी, किंतु सभ्यतागत रूप से रिक्त होगी। यह पीढ़ी वैश्विक कंपनियों के लिए सस्ता श्रमबल तो बन सकती है, परंतु राष्ट्रनिर्माता नहीं। ऐसे लोग आंदोलन करेंगे, नारों में जीएंगे, पहचान आधारित राजनीति में उलझेंगे, डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर क्रोध व्यक्त करेंगे, किंतु समाज निर्माण का धैर्य, अनुशासन और आत्मबल उनमें नहीं होगा।
कोविड-19 काल में पूरी दुनिया ने देखा कि भय और अस्थिरता के वातावरण में समाज कितनी तेजी से नियंत्रण स्वीकार कर लेता है। यही मॉडल भविष्य की वैश्विक राजनीति का आधार बन रहा है। डिजिटल पहचान, बायोमेट्रिक निगरानी, केंद्रीय डिजिटल मुद्राएं और वैचारिक सेंसरशिप उसी दिशा के उपकरण हैं। जब समाज भीतर से टूट जाएगा, परिवार बिखर जाएंगे, बच्चे मानसिक रूप से अकेले हो जाएंगे और संस्कृति उपहास का विषय बन जाएगी, तब नियंत्रण की नई व्यवस्थाओं का विरोध करने वाला कौन बचेगा?
भारत यदि केवल चुनावी जीत, क्रिकेट, बॉलीवुड, प्रतीकात्मक धार्मिक आयोजनों और “विश्वगुरु” जैसे नारों में उलझा रहा, तो वह वास्तविक संकट को देर से समझेगा। किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल जीडीपी, इमारतों और तकनीक से नहीं बनती। उसकी वास्तविक शक्ति उसकी सभ्यतागत जीवंत चेतना, पारिवारिक संरचना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और चरित्रवान पीढ़ी होती है। यदि वही नष्ट हो गई, तो भारत बाहर से चमकता हुआ और भीतर से खोखला राष्ट्र बन जाएगा। यही “भारत को भीतर से नष्ट करना” है, और इस संकट को अब समझना ही नहीं, उसके विरुद्ध वैचारिक प्रतिरोध खड़ा करना भी आवश्यक है।