रमेश शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
डाॅ विष्णु श्रीधर वाकणकरजी ऐसी महाविभूति थे जिन्हें सदैव अपने कार्य की धुन रहती थी, न समय की परवाह और न साधनों की। उनका पूरा जीवन भारत की पुरातत्वीय धरोहरों की खोज में बीता। उनका लक्ष्य भारत की उन साँस्कृतिक धरोहरों को पुर्नप्रतिष्ठित करना था जो समय की आँधी में ओझल हो गई थीं, अथवा जिन्हें योजनापूर्वक छिपा दिया गया था। इतिहास, सांस्कृतिक धरोहरों और चित्रकारी के प्रति उनकी रुचि बचपन से थी। अपनी शालेय शिक्षा के दौरान भी वे इतिहास के विषयों में विशेष रुचि लेते थे। घटनाएँ पढ़कर या दृश्य देखकर चित्र बनाने का प्रयास करते थे।
छात्र जीवन में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आये तो उनके चिंतन को एक दिशा मिली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गोलवलकर जी भी उनकी प्रतिभा की प्रशंसा करते थे। वे संस्कार भारती के संस्थापकों में से एक थे। उनके हाथ में काम कोई हो, उन्हें जो दायित्व मिला, अथवा वे कहीं यात्रा पर निकले हों तब भी उनका ध्यान अपने नियत कार्य के साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों की ओर जाता था। वे केवल पर्यटक के रूप में उन्हें देखने नहीं जाते थे, अपितु कला को समझने का प्रयास करते थे, उनपर शोध करते थे।
वाकणकर जी अपनी अधिकांश यात्रा में खुरपी, छोटी कुदाल और बोरी भी रखते थे। वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। कयी बार तो लगता था कि पुरातात्विक धरोहरें स्वयं उन्हें अपनी ओर आमंत्रित कर रही हैं। भोपाल के समीप भीमबैठका की खोज इसका उदाहरण है। वे रेल द्वारा कहीं यात्रा कर रहे थे। रेल की खिड़की से अचानक उनकी दृष्टि उस पहाड़ी पर पड़ी और वे उतर पड़े। उन्होंने वहाँ एक एक गुफा और शिलाखंड को बारीकी से देखा। कहीं कहीं खुरपी से कुछ उकेरा, गुफा के एक शिलाखंड पर कुछ देर बैठ गये। मानों प्रकृति से एकाकार हो रहे हों, उसके बाद उन्होंने जो प्रमाण एकत्र किये वे आज पूरे संसार के सामने हैं।
भीम बैठका भोपाल से लगभग चालीस किलोमीटर दूर नर्मदापुरम मार्ग पर स्थित है। विंध्य पर्वतमाला की इस श्रृंखला में 500 से अधिक ऐसे शैलाश्रय हैं जिनपर शैलचित्र अंकित हैं। वाकणकर जी ने इन गुफाओं की खोज 1957 में की थी। उसके बाद कयी अंतराष्ट्रीय पुरातत्ववेत्ता भारत आये, भीम बैठका गये और वहाँ की शिल्पकला देखकर सभी आश्चर्य चकित हुये। वर्ष 2003 में यूनेस्को ने भीम बैठका को विश्व धरोहर घोषित किया। श्रेय वाकणकर जी के कारण ही वन और पर्वत क्षेत्र में खोई इस अद्वितीय धरोहर को अंतराष्ट्रीय पहचान मिली। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। वे एक बार दृश्य देखकर चित्र भी बना लेते थे और उसका विस्तार से वर्णन भी कर देते थे।
ऐसी अद्भुत और विलक्षण प्रतिभा के धनी विष्णु श्रीधर वाकणकरजी का जन्म मध्यप्रदेश के नीमच नगर में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा तो नीमच में ही हुई। उच्च शिक्षा केलिये पहले उज्जैन आये, फिर मुंबई गये। मुम्बई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से ललित कला में डिप्लोमा प्राप्त किया और एम.ए. भी किया। यहाँ उनकी भेंट अंतराष्ट्रीय पुरातत्वविद् फ्रांस के आंद्रे लेरू-गुएरन से हुई। वाकणकर जी ने उनके साथ पुरातत्व और शैल चित्रकला अध्ययन केलिये कयी यात्राएँ कीं। अपने शोध और अनुसंधान के साथ उन्होंने 1973 में पुणे विश्वविद्यालय से पीएचडी की।
पीएचडी में उनके गाइड एच. धी. सांकलियाजी थे। सांकलियाजी भी कला संस्कृति, पुरातात्व और इतिहास के विशेषज्ञ माने जाते थे। पीएचडी के दौरान वाकणकर जी ने 'भारत में प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला' विषय पर शोध प्रबंध लिखा। वे शोध और अनुसंधान कार्य के लिये यात्राएँ स्वयं अपना साधन जुटाकर करते थे। उन्होंने जीवन भर कोई सरकारी सहायता नहीं ली। कयी बार अर्थसंकट भी आया लेकिन अर्थाभाव उनकी अनुसंधान यात्रा में बाधक कभी नही बन पाया। उनका शोध कार्य यथार्थ परख होता था। उनका शोध भारतीय इतिहास में योजनापूर्वक स्थापित किये भ्रामक विमर्श से मुक्त करना होता था।
उन्होंने इतिहास के अनेक संदर्भों का यथार्थ संसार के सामने स्थापित किया। वाकणकर जी पहले भारतीय शोधकर्ता थे जिन्होंने अपने समय के प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ता व्हीलर को भारतीय ज्ञान विज्ञान के यथार्थ से परिचय कराया और प्रमाण सहित मैक्समूलर द्वारा निर्धारित वेद रचना के कालखंड का खंडन किया। वाकणकर जी ने प्रमाणित किया कि वेदों का रचनाकाल कम से कम छै हजार वर्ष पुराना है। इसके लिये वाकणकर जी ने वेदों में वर्णित ज्योतिषीय विवरण की व्याख्या की।
वाकणकर जी ने वेदों में वर्णित सरस्वती नदी को केवल कल्पना नहीं माना। उसकी खोज के लिए उन्होंने लगभग चार हजार कि.मी. की लम्बी यात्रा की और सरस्वती नदी का पूरा यात्रा पथ खोज निकाला। सरस्वती नदी कभी हिमाचल, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात राज्यों में बहती थी। वाकणकरजी ने विभिन्न विश्वविद्यालयों से संबंधित प्रोफेसरों की एक टोली बनाकर सरस्वती नदी के संपूर्ण यात्रा पथ पर पैदल यात्रा की थी। जहाँ रात्रि हो जाये वे वहीं ठहर जाते थे। ऋषियों की भाँति कयी बार खुले में अथवा पेड़ के नीचे भी विश्राम कर लेते थे और भोजन भी मार्ग में पड़ने वाले गांवों से जुटाया। तब उनकी आयु छियासठ वर्ष थी। आयु की सीमा भी उनके कार्य में बाधा न बन सकी।
उन्होंने अपने अनुसंधान में मिले पुरातात्विक प्रमाणों से पश्चिमी इतिहासकारों द्वारा स्थापित आर्य-द्रविड़ सिद्धांत का भी पूरी तरह खंडन किया और संसार को बताया कि आर्य और द्रविड़ दोनों भारतभूमि की ही संतान हैं। आज जो अंतर दिखाई देता है वह क्षेत्रीय विकास क्रम और समय की यात्रा का है। उन्होंने महेश्वर, नवादा टोली, मनोटी, आवारा, इंद्रगढ़, कायथा, मंदसौर, आजादनगर, डांगवाड़ा आदि क्षेत्रों में और भोपाल में भोजपुर, श्यामला हिल्स, सतधारा, मनुआ भान का टोकरा, पिपलानी आदि अनेक स्थानों पर खुदाई की और इस क्षेत्र को वैदिक कालीन सभ्यता का अंग प्रमाणित किया।
उन्होंने उज्जैन नगर और उसके आसपास पुरातात्विक प्रमाण खोजकर सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल की ऐतिहासिकता प्रमाणित की। उन्होंने सम्राट विक्रमादित्य की सील मुद्रा भी खोजी। इससे विक्रम संवत की ऐतिहासिकता प्रमाणित हो सकी। उन्होंने भाऊनेरवाली, विनायक, जोंद्रा, लखाजौर, दिवेटिया, बांसकुवर और केरितलाई जैसी पहाड़ियों पर हजारों साल पुराने पुरातात्विक स्थल खोजे। उज्जैन जिले में ही कायथा और डांगवाड़ा के उत्खनन में मिले पुरातात्विक प्रमाणों को विश्व स्तरीय मान्यता मिली। इनमें ईसा पूर्व 3500 से ईसा पूर्व 600 वर्षों के एक विकसित मानव सभ्यता के प्रमाण हैं।
इस उत्खनन से मालवा क्षेत्र में खेती करके स्थायी जीवन व्यतीत करने वाले प्रारंभिक कृषि प्रधान और संगठित समाज के प्रमाण मिले। वाकणकर जी ने स्वयं को केवल मध्यप्रदेश और सरस्वती नदी की खोज तक ही सीमित नहीं रखा। उन्होंने पूरे भारत की यात्राएँ कीं। वे कुरुक्षेत्र भी गये और अवध क्षेत्र भी। हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पंजाब और हरियाणा की दुर्गम पहाड़ियों और रेगिस्तानों में भी उनकी यात्राएँ हुईं। घग्गर-हाकरा नदियों के किनारे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अवशेषों को ही नहीं खोजा लगाते हुए उन्होंने प्राचीन सरस्वती नदी के भौगोलिक निशान ही नहीं खोजे अपितु उस कालखंड की विकसित मानव सभ्यता के प्रमाण भी खोजे।
इन विषय पर व्याख्यान देने वे दिल्ली, मुम्बई, भोपाल, आदि भारत के विभिन्न नगरों में गये। और उनके द्वारा खोजे गये साक्ष्यों की प्रदर्शनियाँ भी लगाई गई। अमेरिकी विद्वान आर.आर. ब्रूक्स के सहयोग से इन शिलाचित्रों पर आधारित भारत में पहली पुस्तक प्रकाशित हुई। इस पुस्तक को अंतराष्ट्रीय पहचान मिली और दुनियाँ के अनेक विश्व विद्यालयों में यह पुस्तक नये शोधार्थियों केलिये एक महत्वपूर्ण आधार है। वाकणकर जी ने उज्जैन में वाकणकर इंडोलॉजिकल कल्चरल रिसर्च ट्रस्ट की भी स्थापना की। उनके योगदान को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1975 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया।
उन्होंने भारत के विभिन्न भागों में हज़ारों शैलाश्रयों की खोज की तथा उनका चित्रांकन, विश्लेषण और प्रदर्शन भारत के विभिन्न नगरों में ही नहीं विदेशों में भी किया और स्वयं भी पुरातात्विक विषय पर आयोजित संगोष्ठियों में व्याख्यान केलिये संसार के अनेक देशों की यात्रा की। ऐसे ही एक सम्मेलन में भाग लेने वे सिंगापुर गये थे। वहीं उनका निधन हो गया। यह 3 अप्रैल 1988 की तिथि थी। उनकी स्मृति में मध्य प्रदेश सरकार ने उनकी स्मृति में एक संग्रहालय "वाकणकर शोध संस्थान" की स्थापना की है। यह संस्थान उज्जैन में स्थापित है।
मध्य प्रदेश सरकार अब पुरातात्विक अनुसंधान में उत्कृष्ट कार्य करने वाले शोधार्थी को वाकणकरजी के नाम पर पुरस्कार भी देती है। इसके साथ ही रातापानी टाइगर रिजर्व का नाम बदलकर "डॉ. वाकणकर टाइगर रिजर्व" रखा गया है। निसंदेह उनका व्यक्तित्व बहुत व्यापक और असाधारण था। उनके अनुसंधान ने केवल भारत ही नहीं पूरे संसार के पुरातात्वविदों को अनुसंधान करने की दिशा प्रदान की। अब यह तथ्य प्रमाणित हो गया है कि मानव विकास क्रम केवल उतना ही नहीं है जितना पश्चिम के इतिहासकारों ने स्थापित किया था, बल्कि यह हजारों हजार साल पुराना है।