डॉ भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
“ने मजसी ने परत मातृभूमीला, सागरा प्राण तळमळला...”
28 मई भारतीय इतिहास का वह गौरवपूर्ण दिवस है, जब भारतभूमि ने एक ऐसे महापुरुष को जन्म दिया, जिसने अपने विचार, संघर्ष, साहित्य और अदम्य राष्ट्रभक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। यह महान विभूति थे विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें सम्पूर्ण राष्ट्र “वीर सावरकर” के नाम से श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है।
वीर सावरकर केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे; वे राष्ट्रचिंतक, इतिहासदृष्टा, साहित्यकार, समाज-सुधारक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रखर दार्शनिक थे। उनका जीवन भारत की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक स्वाभिमान के लिए पूर्ण समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने अपने व्यक्तित्व से यह सिद्ध किया कि राष्ट्रभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि तप, त्याग और संघर्ष की अखंड साधना है।
बाल्यकाल से ही राष्ट्रभक्ति का संस्कार
वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर ग्राम में हुआ। उनके पिता दामोदर पंत सावरकर और माता राधाबाई धार्मिक एवं राष्ट्रप्रेमी संस्कारों से युक्त थे। बालक विनायक पर छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और गुरु गोविंद सिंह जैसे राष्ट्रनायकों के चरित्र का गहरा प्रभाव पड़ा।
बाल्यकाल में ही उन्होंने विदेशी दासता का अपमान अनुभव किया और संकल्प लिया कि भारत को स्वतंत्र कराना ही उनके जीवन का ध्येय होगा। किशोरावस्था में उन्होंने “मित्र मेला” नामक संगठन बनाया, जो आगे चलकर “अभिनव भारत” के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह संगठन युवाओं में क्रांतिकारी चेतना और राष्ट्रभक्ति का संचार करता था।
लंदन में क्रांति की चेतना
उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड गए, किन्तु उनका लक्ष्य केवल अध्ययन नहीं था। लंदन में रहकर उन्होंने भारतीय विद्यार्थियों और क्रांतिकारियों को संगठित किया। वे “इंडिया हाउस” से जुड़े और वहां से अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध वैचारिक और क्रांतिकारी आंदोलन को गति दी।
इसी काल में उन्होंने 1857 के संग्राम पर ऐतिहासिक ग्रंथ “The Indian War of Independence 1857” लिखा। अंग्रेज इसे “सिपाही विद्रोह” कहते थे, किन्तु सावरकर ने इसे भारत का “प्रथम स्वातंत्र्य समर” सिद्ध किया। यह पुस्तक अंग्रेजी सत्ता के लिए इतनी चुनौतीपूर्ण थी कि उसके प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
अद्वितीय साहस : समुद्र में छलांग
1910 में जब उन्हें गिरफ्तार कर भारत लाया जा रहा था, तब फ्रांस के मार्से बंदरगाह पर उन्होंने जहाज से समुद्र में छलांग लगाकर भागने का अभूतपूर्व प्रयास किया। यह घटना उनके अदम्य साहस और स्वतंत्रता के प्रति उत्कट समर्पण का प्रतीक है।
अंग्रेज सरकार उन्हें अत्यंत खतरनाक क्रांतिकारी मानती थी। परिणामस्वरूप उन्हें दो-दो आजीवन कारावास अर्थात 50 वर्ष की सजा सुनाई गई और अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया।
सेल्युलर जेल : अमानवीय यातनाओं का इतिहास
अंडमान की सेल्युलर जेल केवल कारागार नहीं थी; वह भारतीय क्रांतिकारियों के लिए यातना का नरक थी। वीर सावरकर को बैलों की तरह तेल कोल्हू में जोता जाता था। हाथों में हथकड़ियाँ, पैरों में बेड़ियाँ, एकांत कारावास और मानसिक प्रताड़ना, इन सबका उद्देश्य उनके मनोबल को तोड़ना था।
किन्तु सावरकर टूटे नहीं। उन्होंने जेल की दीवारों पर कीलों और पत्थरों से कविताएँ लिखीं। जब कागज-कलम नहीं मिले, तब उन्होंने हजारों पंक्तियाँ स्मरण कर लीं और साथी बंदियों के माध्यम से उन्हें बाहर पहुँचाया।
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ आज भी राष्ट्रप्रेम की ज्वाला प्रज्वलित करती हैं-
“सागर प्राण तळमळला…”
“ने मजसी ने परत मातृभूमीला…”
इन पंक्तियों में मातृभूमि से दूर एक क्रांतिकारी का वेदनापूर्ण हृदय बोलता है।
उनकी एक अन्य प्रेरक पंक्ति थी
“जयोस्तुते श्रीमहामंगले, शिवास्पदे शुभदे।
स्वतंत्रते भगवति, त्वामहं यशोयुतां वंदे॥”
यह कविता स्वतंत्रता को देवी स्वरूप मानकर राष्ट्रसमर्पण की भावना प्रकट करती है।
हिंदुत्व : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दर्शन
वीर सावरकर का “हिंदुत्व” भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा थी। उन्होंने हिंदुत्व को किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं किया, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, साझा इतिहास, परंपरा और मातृभूमि के प्रति समर्पण से जोड़ा।
उनका मानना था कि भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्र है। भारत की आत्मा उसकी सनातन सांस्कृतिक परंपरा में निहित है। वे कहते थे कि जो इस भूमि को अपनी “पितृभूमि” और “पुण्यभूमि” मानता है, वही इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की मूल चेतना से जुड़ सकता है।
उनका हिंदुत्व आत्मगौरव, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक स्वाभिमान का विचार था।
सामाजिक समरसता के प्रबल समर्थक
वीर सावरकर सामाजिक कुरीतियों और अस्पृश्यता के विरोधी थे। उन्होंने जातिगत भेदभाव को राष्ट्रीय एकता के लिए घातक माना। रत्नागिरी में उन्होंने मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाया और सभी वर्गों के लोगों के लिए मंदिरों के द्वार खुलवाने का प्रयास किया।
उनका स्पष्ट मत था -
“जिस समाज में ऊँच-नीच का भेद रहेगा, वह कभी संगठित और शक्तिशाली राष्ट्र नहीं बन सकता।”
साहित्यकार सावरकर
वीर सावरकर का साहित्य ओज, राष्ट्रप्रेम और चेतना से परिपूर्ण है। उन्होंने कविता, नाटक, इतिहास और वैचारिक साहित्य की अनेक महत्वपूर्ण रचनाएँ दीं। उनकी लेखनी में क्रांति की ज्वाला और राष्ट्रभक्ति की तीव्रता स्पष्ट दिखाई देती है।
उनकी कविताओं में मातृभूमि के प्रति प्रेम, स्वतंत्रता की उत्कंठा और आत्मबल का अद्भुत संगम मिलता है। वे केवल शब्द नहीं लिखते थे, बल्कि अपने रक्त और तप से साहित्य को जीवंत बना देते थे।
उनकी एक प्रसिद्ध भावना थी -
“स्वतंत्रता ही जीवन है, परतंत्रता मृत्यु।”
राष्ट्र उन्हें क्यों स्मरण करता है
वीर सावरकर का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र सर्वोपरि है। उन्होंने व्यक्तिगत सुख, पारिवारिक जीवन और सुविधाओं का त्याग कर मातृभूमि की सेवा को अपना धर्म बनाया। उनके विचारों पर मतभेद हो सकते हैं, किन्तु उनके साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति को नकारा नहीं जा सकता।
आज जब भारत आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय स्वाभिमान की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब वीर सावरकर के विचार और भी प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।
28 मई केवल वीर सावरकर की जयंती नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रचेतना, सांस्कृतिक स्वाभिमान और अदम्य राष्ट्रभक्ति का स्मरण पर्व है। उनका जीवन भारत के युवाओं को यह प्रेरणा देता है कि राष्ट्रनिर्माण त्याग, अनुशासन और आत्मबल से ही संभव है।
उन्होंने अपने संघर्ष से यह सिद्ध किया कि शरीर को कैद किया जा सकता है, किन्तु विचारों को नहीं। सेल्युलर जेल की अंधेरी कोठरी में भी उनका राष्ट्रप्रेम प्रकाश बनकर जलता रहा।
भारत की स्वतंत्रता यात्रा में वीर सावरकर का नाम सदैव तेजस्वी नक्षत्र की भाँति चमकता रहेगा। राष्ट्र उनके प्रति कृतज्ञ है और आने वाली पीढ़ियाँ उनके त्याग, साहित्य और राष्ट्रनिष्ठा से प्रेरणा प्राप्त करती रहेंगी।
आज का भारत विश्वपटल पर एक उभरती हुई शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है। ऐसे समय में वीर सावरकर का जीवन और विचार युवाओं के लिए केवल इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण की प्रेरणा हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन यह संदेश देता है कि कोई भी राष्ट्र केवल आर्थिक समृद्धि से महान नहीं बनता, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, साहस, संगठन और सांस्कृतिक आत्मगौरव से महान बनता है।
विनायक दामोदर सावरकर का मानना था कि युवाशक्ति ही राष्ट्रशक्ति का वास्तविक आधार है। वे चाहते थे कि भारत का युवा मानसिक रूप से स्वतंत्र, आत्मविश्वासी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित हो। उनका स्पष्ट संदेश था कि राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए और व्यक्तिगत हित सदैव राष्ट्रीय हित के अधीन होने चाहिए।
आज जब वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और सांस्कृतिक भ्रम के अनेक संकट समाज के सामने हैं, तब सावरकर का सांस्कृतिक स्वाभिमान और राष्ट्रनिष्ठा का विचार अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देता है। वे हमें अपनी जड़ों, परंपराओं और राष्ट्रीय अस्मिता पर गर्व करना सिखाते हैं। उनका जीवन यह प्रेरणा देता है कि आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखना आवश्यक है।
युवाओं के लिए उनका संदेश था कि केवल अधिकारों की बात न करें, बल्कि राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का भी पालन करें। अनुशासन, संगठन, परिश्रम और आत्मबल से ही सशक्त भारत का निर्माण संभव है।
उनकी ओजस्वी चेतना आज भी मानो युवाओं को पुकारती है -
“देशभक्ति ही ईश्वरभक्ति है, और राष्ट्रसेवा ही जीवन का सर्वोच्च धर्म।”
आज आवश्यकता है कि भारत का युवा वीर सावरकर के जीवन से राष्ट्रप्रेम, आत्मगौरव, सामाजिक समरसता और साहस की प्रेरणा ग्रहण करे। यदि नई पीढ़ी अपने राष्ट्र, संस्कृति और सभ्यता के प्रति जागरूक होगी, तभी भारत विश्व में “विश्वगुरु” के रूप में अपनी प्राचीन गौरवगाथा को पुनः स्थापित कर सकेगा।
वीर सावरकर का जीवन हमें यह संदेश देता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मन में राष्ट्र के प्रति समर्पण और आत्मबल हो, तो इतिहास बदला जा सकता है।