डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
भारत की सांस्कृतिक चेतना, जनजातीय अस्मिता और राष्ट्रीय एकात्मता का एक ऐतिहासिक अध्याय 24 मई 2026 को उस समय लिखा गया, जब देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित लाल किला में “सांस्कृतिक समागम 2026” के अंतर्गत जनजातीय समाज का अभूतपूर्व महासंगम आयोजित हुआ।
यह आयोजन केवल एक सम्मेलन नहीं था, बल्कि भारत की प्राचीन सभ्यता के मूल संरक्षकों, वनवासियों, जनजातीय समुदायों और लोक संस्कृति के वाहकों के स्वाभिमान, अस्तित्व और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का विराट उद्घोष था।
देश के इतिहास में पहली बार इतने व्यापक स्तर पर जनजातीय समाज एक मंच पर संगठित हुआ। इस महाआयोजन में भारत के 550 से अधिक जनजातीय समूहों ने सहभागिता की तथा लगभग 1.50 लाख से अधिक जनजातीय प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मातृशक्ति, युवाओं और सांस्कृतिक कलाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
यह दृश्य केवल संख्या का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह भारत की उस जीवंत सांस्कृतिक आत्मा का दर्शन था, जो सदियों से जंगलों, पर्वतों, नदियों और लोक परंपराओं में सुरक्षित रही है।
इस ऐतिहासिक आयोजन का संचालन एवं नेतृत्व जनजाति सुरक्षा मंच के तत्वावधान में किया गया, जिसमें वनवासी कल्याण आश्रम सहित अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम में देशभर से आए जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों ने अपने पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, नृत्य, वाद्य यंत्रों और सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से भारत की विविधता में एकता की अनुपम छवि प्रस्तुत की।
जनजातीय चेतना का राष्ट्रीय उदय
लाल किले की प्राचीर ने अनेक ऐतिहासिक क्षण देखे हैं, परंतु यह पहला अवसर था जब भारत का जनजातीय समाज इतनी विराट संख्या में अपनी सांस्कृतिक पहचान और अधिकार चेतना के साथ राष्ट्रीय मंच पर उपस्थित हुआ।
पूर्वोत्तर भारत से लेकर मध्य भारत के वन क्षेत्रों तक, राजस्थान के भील समाज से लेकर झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और अंडमान तक, प्रत्येक क्षेत्र की जनजातीय परंपराएं इस समागम में जीवंत दिखाई दीं।
यह समागम भारत के उस ऐतिहासिक सत्य को पुनः स्थापित करता है कि जनजातीय समाज केवल “विकास” का विषय नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का मूलाधार है।
प्रकृति संरक्षण, जल-जंगल-जमीन के संतुलन, सामूहिक जीवन, लोकज्ञान, आयुर्वेदिक परंपराओं और सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता की जो धारा आज विश्व खोज रहा है, वह भारत के जनजातीय समाज में हजारों वर्षों से विद्यमान रही है।
गृह मंत्री अमित शाह का उद्बोधन : “जनजातीय समाज भारत की आत्मा”
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित अमित शाह ने अपने संबोधन में जनजातीय समाज को भारत की सांस्कृतिक आत्मा बताते हुए कहा कि जनजातीय समुदायों ने भारत की प्रकृति, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को सदियों तक सुरक्षित रखा है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में भी जनजातीय वीरों का योगदान अद्वितीय रहा है, किंतु इतिहास लेखन में उन्हें पर्याप्त स्थान नहीं मिला। अब भारत उनके गौरव को पुनर्स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा, रानी दुर्गावती, टंट्या भील, सिद्धू-कान्हू, अल्लूरी सीताराम राजू और अनेक जनजातीय वीरों का स्मरण करते हुए कहा कि भारत सरकार जनजातीय समाज के सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनजातीय समाज को उसकी जड़ों से काटने वाली शक्तियों के विरुद्ध सांस्कृतिक जागरूकता और संगठन आवश्यक है।
मातृशक्ति की विराट भागीदारी
इस सांस्कृतिक समागम की सबसे प्रेरणादायक विशेषताओं में से एक रही जनजातीय मातृशक्ति की विशाल उपस्थिति।
देश के विभिन्न राज्यों से आई हजारों महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ कार्यक्रम में भाग लिया। उनके लोकनृत्य, पारंपरिक गीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय जनजातीय संस्कृति का वास्तविक संरक्षण महिलाओं के माध्यम से ही संभव हुआ है।
जनजातीय समाज की महिलाएं केवल परिवार की संरक्षक नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा, लोकज्ञान और सामाजिक मूल्यों की संवाहक हैं।
इस आयोजन में उनकी सहभागिता ने यह संदेश दिया कि भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं।
विकास और विरासत” का संतुलन
समागम में उपस्थित विभिन्न वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि जनजातीय समाज के विकास का अर्थ केवल शहरीकरण नहीं होना चाहिए।
वास्तविक विकास वह है जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक और रोजगार के साथ-साथ जनजातीय संस्कृति, भाषा, परंपरा और प्रकृति आधारित जीवन पद्धति का संरक्षण भी सुनिश्चित हो।
वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि वैश्वीकरण और बाज़ारवाद के प्रभाव में अनेक जनजातीय भाषाएं और लोक परंपराएं विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही हैं। ऐसे समय में यह सांस्कृतिक समागम भारत के सांस्कृतिक भविष्य को सुरक्षित करने का एक राष्ट्रीय अभियान बनकर उभरा।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जीवंत स्वरूप
यह आयोजन भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उस स्वरूप को भी सामने लाता है जिसमें विविधता को विभाजन नहीं, बल्कि शक्ति माना जाता है।
भारत की जनजातियां किसी “मुख्यधारा” से अलग नहीं हैं; वे स्वयं भारत की मूलधारा हैं। उनकी परंपराएं, देवी-देवता, प्रकृति पूजा, सामूहिक जीवन और राष्ट्रनिष्ठा भारतीय संस्कृति की आधारशिला हैं।
सांस्कृतिक समागम ने यह स्पष्ट किया कि आधुनिक भारत यदि विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे अपने जनजातीय समाज के ज्ञान, जीवनशैली और सांस्कृतिक मूल्यों को केंद्र में रखना होगा।
राष्ट्रीय एकता का ऐतिहासिक संदेश
लाल किले में आयोजित यह जनजातीय महासंगम आने वाले समय में भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाएगा।
यह आयोजन केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि जनजातीय समाज के आत्मविश्वास, संगठन और राष्ट्रीय सहभागिता की नई शुरुआत थी।
जब 550 से अधिक जनजातीय समूह एक मंच पर “भारत माता की जय” और सांस्कृतिक एकात्मता के उद्घोष के साथ खड़े दिखाई दिए, तब यह स्पष्ट हो गया कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक जड़ों में निहित है।
“सांस्कृतिक समागम 2026” ने यह संदेश दिया कि जनजातीय समाज भारत के अतीत की विरासत ही नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी है।
उनकी संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान है, समाज के प्रति समर्पण है और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा है। यही भारत की सनातन चेतना का वास्तविक स्वरूप है।