आज के जमाने का गंगा दशहरा

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    25-May-2026
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ganga
 
 
- गिरीश जोशी
 
 
गंगा दशहरा सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र, पुण्यदायी और लोककल्याणकारी पर्व है। यह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। शास्त्रों में इसे माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण दिवस माना जाता है। इसे पाप-क्षालन, आत्मशुद्धि, मोक्ष-साधना और धर्म-स्मरण का दिवस कहा जाता है।
 
 
शास्त्रीय महत्व
“दशहरा” शब्द यहाँ दश + हरा से बना है, यानि दस प्रकार के पापों का हरण करने वाला। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से स्नान, दान, जप और गंगा पूजन करने से मनुष्य के काया, वाचा और मानसिक स्तर पर जाने अनजाने में हुए पाप नष्ट होते हैं।
 
 
माँ गंगा के अवतरण की कथा
प्राचीन काल में राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। उनके यज्ञ का घोड़ा चोरी होकर कपिल मुनि के आश्रम के पास पहुँच गया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े की खोज करते हुए वहाँ पहुँचे और मुनि पर आरोप लगाया।
 
ऋषि के तपोबल से वे सभी भस्म हो गए। उनकी आत्माओं की मुक्ति तब तक संभव न थी, जब तक स्वर्गीय गंगा पृथ्वी पर आकर उनके अस्थि-अवशेषों को स्पर्श न करे।
 
पीढ़ियों बाद राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। पहले ब्रह्मा प्रसन्न हुए और गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वर दिया।
परंतु गंगा का वेग असहनीय था। तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया।
 
भगीरथ के पीछे-पीछे बहती हुई गंगा वहाँ पहुँची जहाँ सगरपुत्रों की राख थी, और उनके स्पर्श से उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ।
गंगा के बारे में शास्त्रों में लिखा हैं -
 
“गंगे तव दर्शनात् मुक्ति:”
अर्थात गंगा के दर्शन मात्र से भी कल्याण होता है।
गंगा दशहरा केवल स्नान का पर्व नहीं, बल्कि तप, करुणा, पितृऋण, दान और आत्मशुद्धि का दिव्य उत्सव है। इसी दिव्य घटना की स्मृति में ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है।
 
 
कथा का आध्यात्मिक अर्थ
यह कथा केवल इतिहास नहीं, गहन प्रतीक है। सगरपुत्र यानी अहंकार और अधर्म, भगीरथ तप अर्थात पुरुषार्थ और संकल्प, गंगा यानि ईश्वरीय कृपा और ज्ञान,शिव की जटा मतलब धैर्य और संयम और सबसे महत्वपूर्ण मोक्ष यानि आत्मा का परमात्मा में मिलन और मोह के बंधन से मुक्ति जिसे मोह का क्षय भी कहा गया हैं।
 
 
इस दिन क्या करें?
ऐसा माना जाता है कि यदि इस दिन गंगा तट पर स्नान हों तो उत्तम, अन्यथा घर में गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए , माँ गंगा का पूजन, “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का न
जप भी करना चाहिए। जलपात्र, वस्त्र, फल, अन्न, पंखा आदि का दान करना चाहिए। ये दिन पितरों का स्मरण का भी दिन है साथ ही पर्यावरण रक्षा और नदी संरक्षण का संकल्प भी इस दिन लेना चाहिए।
 
 
आज के समय में गंगा दशहरा का संदेश
आज गंगा दशहरा हमें केवल पूजा के साथ नदियों, जल स्तोत्रों को स्वच्छ रखने,जल का सम्मान करने,प्रकृति को माता मानने,तप, सेवा और संयम अपनाने और संस्कृति से जुड़ने का स्मरण करवाता है।
गंगा दशहरा वह दिन है जब स्वर्ग से करुणा पृथ्वी पर उतरी। यह पर्व बताता है कि जब भगीरथ जैसे पुरुषार्थी प्रयास करते हैं और शिव जैसी धारण-शक्ति मिलती है, तब जीवन में भी कृपा की गंगा उतरती है।
अतः यह केवल तिथि नहीं, बल्कि शुद्धि, सेवा, संस्कार और मोक्ष का उत्सव है।
 
 
गंगा दशहरा पर दान का महत्व
गंगा दशहरा पर दान करना केवल परंपरा नहीं, बल्कि मनुष्य को दानी, विनम्र, करुणामय और धर्ममय बनाने की साधना है।
वस्तु छोटी हो सकती है, भाव बड़ा होना चाहिए। शास्त्र कहते हैं—
भावप्रधानं हि देवेषु।दान को धर्म का स्तंभ कहा गया है। इस दिन किया गया दान दशगुण फलदायी माना गया है।
 
 
गंगा दशहरा पर दस विशेष दानों का रहस्य
गंगा दशहरा वह पवित्र दिवस है, जिसमें दश पापों के नाश, दश इन्द्रियों की शुद्धि और दश दिशाओं में पुण्य विस्तार का संकेत निहित है। इसी कारण इस दिन दस प्रकार के दान करने की परंपरा कही गई है।
शास्त्रों में दान केवल वस्तु देना नहीं, बल्कि अहंकार का त्याग, करुणा का विस्तार और लोकमंगल का संकल्प है।
 
 
दस प्रकार के दानों के निहित अर्थ
 
1. जलदान 
जल को वेदों में अमृत कहा गया है। ग्रीष्मकाल में प्यासे को जल देना प्राणदान के समान माना गया है।मर्म:जलदान मनुष्य के भीतर की तृष्णा, क्रोध और ताप को भी शांत करने का प्रतीक है।
 
2. घटदान (घड़ा / कलश)
मिट्टी का घड़ा शीतलता, धारण शक्ति और मातृत्व का प्रतीक है।मर्म:घटदान यह सिखाता है कि स्वयं भरकर दूसरों को तृप्त करो, जैसे गंगा सबको जल देती है।
 
3. अन्नदान
धर्मशास्त्रों में कहा गया है—“अन्नदानं परं दानम्”।मर्म: अन्न शरीर ही नहीं, मन और संस्कार को भी पोषित करता है। भूखे को भोजन देना नारायण सेवा है इसलिए इसे परम दान माना गया है।
 
4. फलदान
फल प्रकृति की सहज कृपा है।मर्म:फलदान कर्मफल की स्मृति है जैसा बोओगे वैसा पाओगे। मधुर फल देना मधुर कर्म का प्रतीक है।
 
5. वस्त्रदान
वस्त्र शरीर की मर्यादा और रक्षा करते हैं।मर्म: वस्त्रदान से अभावग्रस्त व्यक्ति की गरिमा की रक्षा होती है। यह दया और सम्मान का दान है।
 
6. छत्रदान (छाता)
गर्मी और वर्षा से रक्षा हेतु छत्रदान प्राचीन काल से श्रेष्ठ माना गया।
मर्म:छत्रदान यह संदेश देता है कि समर्थ व्यक्ति निर्बलों को संरक्षण दे।
 
7. पादुका दान (जूते / चप्पल)
धूप और कठिन मार्ग में चलने वालों हेतु यह दान उपयोगी माना गया है। मर्म:यह जीवनयात्रा में दूसरों के कष्ट कम करने का प्रतीक है।
 
8. पंखा दान
ग्रीष्मकाल में शीतलता देने हेतु पंखा दान अत्यंत पुण्यकारी माना गया। मर्म :यह क्रोध, ताप, क्लेश और मानसिक अशांति को शांत करने का संकेत है।
 
9. दीपदान
दीप अज्ञान के अंधकार को हरता है। मर्म: दीपदान केवल प्रकाश देना नहीं, बल्कि ज्ञान देना है। विद्या, सद्बुद्धि और मार्गदर्शन भी दीपदान है।
 
10. धनदान:
सत्पात्र को धन देना धर्म का अंग है।मर्म:धनदान लोभ के त्याग का अभ्यास है। धन का प्रवाह रुक जाए तो अहंकार बढ़ता है, सेवा में लगे तो पुण्य बढ़ता है।
 
आज के समय में दान कैसे करें?
प्यासे को पानी पिलाना,
भूखे को भोजन देना,
अक्षम विद्यार्थी को पुस्तक देना,
वृक्ष लगाना,
नदी अन्य जल स्त्रोतों की स्वच्छता का अभियान करना,
बुजर्गों की सेवा करना आदि ।
 
आज के जमाने के गंगा दशहरा के दान है। जो सार्थक और परिणामकारी हैं।