जैव विविधता: जैव विविधता केवल वैज्ञानिक विषय नहीं, भारतीय सभ्यता का जीवन-दर्शन है।

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    22-May-2026
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 जैव विविधता
 
 
अक्षत श्रीवास्तव
पर्यावरणविद् एवं सामाजिक उद्यमी
 
 
विश्व जैव विविधता दिवस के अवसर पर जब हम प्रकृति संरक्षण की वैश्विक चर्चाओं में शामिल होते हैं, तो अक्सर इसे केवल एक वैज्ञानिक चुनौती के रूप में देखा जाता है। प्रजातियों का सूचकांक, पारिस्थितिकी संतुलन और जेनेटिक डेटा निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में जैव विविधता केवल प्रयोगशालाओं का विषय नहीं, बल्कि हमारे हज़ारों वर्षों पुराने जीवन-दर्शन की आत्मा है।
 
 
सह-अस्तित्व की सांस्कृतिक जड़ें
 
 
भारतीय सभ्यता में प्रकृति को कभी भी 'संसाधन' (Resource) नहीं माना गया जिसे केवल उपभोग के लिए इस्तेमाल किया जाए। हमारे ऋषियों ने ईशावास्यमिदं सर्वं का मंत्र दिया, जिसका अर्थ है कि चर-अचर, सूक्ष्म-स्थूल, हर तत्व में ईश्वर का वास है। जहाँ पश्चिमी जगत अब 'इको-सिस्टम' की बात कर रहा है, भारत सदियों से 'वसुधैव कुटुंबकम' के माध्यम से यह संदेश देता आया है कि कीट-पतंगे, पक्षी और वनस्पतियाँ हमारे परिवार का ही हिस्सा हैं।
 
 
माँ नर्मदा : संरक्षण के सजीव मॉडल
 
 
जैव विविधता के इस दर्शन को हम माँ नर्मदा के तटों की परंपरा में प्रत्यक्ष देख सकते हैं। नर्मदा केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा है। इसके तटों पर पनपने वाली जैव विविधता हमें सिखाती है कि जल, जंगल और जीवन एक-दूसरे से कितने गहरे जुड़े हैं। जब हम नर्मदा की अविरल धारा की रक्षा का संकल्प लेते हैं, तो हम अनजाने में ही उन हज़ारों जलीय प्रजातियों और तटवर्ती वनों को जीवनदान देते हैं।
 
 
इसी प्रकार, गौ-सेवा भारतीय जीवन में 'चक्रीय अर्थव्यवस्था' (Circular Economy) का आधार रही है। एक देसी गाय केवल दूध का स्रोत नहीं, बल्कि मिट्टी के सूक्ष्म जीवों को पुनर्जीवित करने वाली धुरी है। गोमय और गोमूत्र के माध्यम से होने वाली खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है, बल्कि रासायनिक खेती के कारण लुप्त हो रही गौरैया और अन्य मित्र कीटों के लिए भी सुरक्षित आवास तैयार करती है। यह 'सेवा-आधारित' मॉडल ही वास्तविक जैव-विविधता संरक्षण है।
 
 
परंपरा और आधुनिकता का सामंजस्य
 
 
आज जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें केवल नीतियों की नहीं, बल्कि दृष्टि बदलने की आवश्यकता है।
 
 
समय की पुकार - जैव विविधता का संरक्षण हमारे लिए कोई एहसान नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रक्रिया है। यदि हम गौरैया के चहचहाने, नर्मदा की लहरों और गौशालाओं की जीवंतता को बचाए रखते हैं, तो हम वास्तव में अपनी सभ्यता को बचा रहे होते हैं। आइए, इस विश्व जैव विविधता दिवस पर हम प्रकृति को 'स्वामी' बनकर नहीं, बल्कि एक विनम्र 'संरक्षक' बनकर देखने का संकल्प लें।